वसंतोत्सव : विद्या और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती से मांगो आशीर्वाद

maa-saraswati vasant panchami

प्राकट्येन सरस्वत्या वसंत पंचमी तिथौ. विद्या जयंती सा तेन लोके सर्वत्र कथ्यते॥

वसंत पंचमी तिथि में भगवती सरस्वती का प्रादुर्भाव होने के कारण संसार में सर्वत्र इसे विद्या जयंती कहा जाता है.

सरस्वती विद्या और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं. भगवती सरस्वती के जन्म दिन पर अनेक अनुग्रहों के लिए कृतज्ञता भरा अभिनंदन करें. उनकी कृपा का वरदान प्राप्त होने की पुण्य तिथि हर्षोल्लास से मनाएं.

माँ सरस्वती के हाथ में पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है. यह व्यक्ति की आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रगति के लिए स्वाध्याय की अनिवार्यता की प्रेरणा देता है. विद्या मनुष्य के व्यक्तित्व के निखार एवं गौरवपूर्ण विकास के लिए है. पुस्तक के पूजन के साथ-साथ ज्ञान वृद्धि की प्रेरणा ग्रहण करने और उसे इस दिशा में कुछ कदम उठाने का साहस करना चाहिए.

स्वाध्याय हमारे दैनिक जीवन का अंग बन जाए, ज्ञान की गरिमा समझने लग जाएं और उसके लिए मन में तीव्र उत्कण्ठा जाग पड़े तो समझना चाहिए कि पूजन की प्रतिक्रिया ने अंत:करण तक प्रवेश पा लिया.

कर कमलों में वीणा धारण करने वाली भगवती वाद्य से प्रेरणा प्रदान करती हैं कि हमारी हृदय रूपी वीणा सदैव झंकृत रहनी चाहिए. हाथ में वीणा का अर्थ संगीत, गायन जैसी भावोत्तेजक प्रक्रिया को अपनी प्रसुप्त सरसता सजग करने के लिए प्रयुक्त करना चाहिए. हम कला प्रेमी बनें, कला पारखी बनें, कला के पुजारी और संरक्षक भी.

माता की तरह उसका सात्विक पोषण पयपान करें. कुछ भावनाओं के जागरण में उसे संजोये. जो अनाचारी कला के साथ व्यभिचार करने के लिए तुले हैं, पशु प्रवृत्ति भड़काने और अश्लीलता पैदा करने के लिए लगे हैं उनका न केवल असहयोग करें बल्कि विरोध, भर्त्सना के अतिरिक्त उन्हें असफल बनाने के लिए भी कोई कसर बाकी न रखें.

मयूर अर्थात् मधुरभाषी. हमें सरस्वती का अनुग्रह पाने के लिए उनका वाहन मयूर बनना ही चाहिए. मीठा, नम्र, विनीत, सज्जनता, शिष्टता और आत्मीयता युक्त संभाषण हर किसी से करना चाहिए. प्रकृति ने मोर को कलात्मक, सुसज्जित बनाया है. हमें भी अपनी अभिरुचि परिष्कृत बनानी चाहिए. हम प्रेमी बनें, सौन्दर्य, सुसज्जता, स्वच्छता का शालीनतायुक्त आकर्षण अपने प्रत्येक उपकरण एवं क्रियाकलाप में बनाए रखें. तभी भगवती सरस्वती हमें अपना पार्षद, वाहन, प्रियपात्र मानेंगी.

माँ सरस्वती की प्रतीक प्रतिमा मूर्ति अथवा तस्वीर के आगे पूजा-अर्चना का सीधा तात्पर्य यह है कि शिक्षा की महत्ता को स्वीकार शिरोधार्य किया जाए. उनको मस्तक झुकाया जाए, अर्थात् मस्तक में उनके लिए स्थान दिया जाए. सरस्वती की कृपा के बिना विश्व का कोई महत्वपूर्ण कार्य सफल नहीं हो सकता.

प्राचीनकाल में जब हमारे देशवासी सच्चे हृदय से सरस्वती की उपासना और पूजा करते थे, तो इस देश को जगद्ïगुरु की पदवी प्राप्त थी. दूर-दूर से लोग यहां सत्य ज्ञान की खोज में आते थे और भारतीय गुरुओं के चरणों में बैठकर विद्या सीखते थे, पर उसके बाद जब यहां के लोगों ने सरस्वती की उपासना छोड़ दी और वे वसंत पर्व को सरस्वती पूजा के बजाय कामदेव की पूजा का त्योहार समझने लगे और उस दिन मदन महोत्सव मानने लगे, तब से विद्या बुद्धि का ह्रास होने लगा और अंत में ऐसा समय भी आया जब यहां के विद्यार्थियों को ही अन्य देशों में जाकर अपने ज्ञान की पूर्ति करनी पड़ी.

ज्ञान की देवी भगवती के इस जन्मदिन पर यह अत्यंत आवश्यक है कि हम पर्व से जुड़ी हुई प्रेरणाओं से जन-जन को जोड़ें. विद्या के इस आदि त्योहार पर हम ज्ञान की ओर बढऩे के लिए नियमित स्वाध्याय के साथ-साथ दूसरों तक शिक्षा का प्रकाश पहुंचाने के लिए संकल्पित हों. विद्या की अधिकाधिक सब जगह अभिवृद्धि देखकर भगवती सरस्वती प्रसन्न होती हैं.

वसंत का त्योहार हमारे लिए फूलों की माला लेकर खड़ा है. यह उन्हीं के गले में पहनाई जाएगी जो लोग उसी दिन से पशुता से मनुष्यता, अज्ञान से ज्ञान, अविवेक से विवेक की ओर बढऩे का दृढ़ संकल्प करते हैं और जिन्होंने तप, त्याग और अध्यवसाय से इन्हें प्राप्त किया है उनका सम्मान करते हैं.

संसार में ज्ञान गंगा को बहाने के लिए भागीरथ जैसी तप-साधना करने की प्रतिज्ञा करते हैं. श्रेष्ठता का सम्मान करने वाला भी श्रेष्ठ होता है. इसीलिए आइए हम इस शुभ अवसर पर उत्तम मार्ग का अनुसरण करें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY