‘भिखारी’ को ‘उन्मादी हिन्दू’ कहने वाले दोगले वामपंथी जानते हैं कब चुप्पी साधनी है, कब होना है मुखर

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एस इरफ़ान हबीब – जो भारत में विज्ञान के इतिहासकार हैं – ने रानी पद्मावती के काव्य-पात्र मात्र होने की बात कही. वामपंथियों को मौक़ा मिल गया; वे वैसे भी इतिहासकार के जानकार कम, अभिनेता अधिक होते हैं. कब चुप्पी साध लेनी है, कब मुखर हो जाना है – इन्हें बखूबी आता है. गौर कीजिये :-

वामपंथी उस समय चुप्पी साध लेते हैं जब साथी कोम्युनिस्ट इतिहासकार डी एन झा अब्नूर-शिलालेख में वर्णित एक राजा के अपना सर काट कर फिर जोड़ देने के चमत्कार को जैनों के सन्दर्भ में हिन्दुओं के विरुद्ध प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत करते हैं.

उन्हें उस समय भी आपत्ति नहीं होती जब डी एन झा दक्ष प्रजापति और शिव के बीच की एक घटना को हिन्दुओं के विरुद्ध अपने कथन के लिए साक्ष्य के तौर पर मान लेते हैं.

वे उस समय भी चुप रहते हैं जब डी एन झा एक हिन्दू द्वारा एक जादुई शब्द के ‘चमत्कार’ के ज़रिये कुछ बौद्ध-भिक्षुओं के मतांतरण की ‘कथा’ को हिन्दुओं के विरुद्ध प्रमाण मानते हैं.

वे तब भी चुप रहते हैं जब डी एन झा नालंदा बौद्ध-विहारों-पुस्तकालयों के विध्वंस को ‘उन्मादी हिन्दुओं’ द्वारा किया हुआ इस आधार पर बता देते हैं कि उन घटनाओं के “पांच सौ वर्षों के बाद” लिखे गए एक तिब्बती-ग्रन्थ में दो ‘भिखारियों द्वारा’ एक चमत्कार से हासिल एक तिलस्मी भस्म के जादू से तमाम पुस्तकालयों और चौरासी विहारों/श्राइन’ को नष्ट करने का वर्णन है.

“भिखारी” को “उन्मादी हिन्दू” अभिव्यक्ति से बदलना इख्तियारुद्दीन द्वारा नालंदा को नष्ट किये जाने के तमाम तत्कालीन इतिवृत्त-प्रमाणों को नज़रअंदाज करना तो अलग मुद्दा है.
आश्चर्य की बात है कि इन वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘प्रमाण’ के तौर पर “कथा”,“कहावतों”, “काव्य-ग्रंथों” के बारम्बार प्रयोग पर भी वामपंथियों को कोई आपत्ति नहीं होती लेकिन हिन्दुओं पर सांस्कृतिक हमले की तरफदारी करने के लिए वे रानी पद्मावती को काव्य-ग्रन्थ का हिस्सा बताते हुए वे सबसे आगे आ जाते हैं. यही वैचारिक दुहरापन वामपंथियों की पहचान है.

रानी पद्मावती –जो नारी-अस्मिता और नारी-स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में सदियों से स्थापित हैं – का साक्ष्य इतिवृत्तों में है या उनसे इतर के ग्रंथों में, ये अहम् है ही नहीं. अहम् है कि वे इन प्रतीकों के तौर पर सदियों से स्थापित हैं.

खैर, यहाँ पर प्रश्न है वामपंथी इतिहासकारों के वैचारिक दोहरेपन का और उनके हाथों लिखे इतिहास के पन्ने पन्ने में हिन्दुओं को लघुकृत करने की उनकी मक्कारी का!

(नोट : ध्यान रहे, ऊपर उल्लिखित हबीब साहब ‘एस इरफ़ान हबीब’ हैं; ये वो विख्यात कोम्युनिस्ट इतिहासकार ‘इरफ़ान हबीब’ नहीं हैं)

(संन्दर्भ : D N Jha’s “Looking for a Hindu Identity” , (2) B N S Yadav’s “Society and Culture in Northern India in the Twelfth Century”, (3) 13th century historian Maulana Minhajiddeen’s “ Tabakat – i Nasiri”, (4), Tibbati Text “Pag Sam Jong Jam” , (5) George Rorich’s “Biography of Dharmaswamin – –Chag la tsa-ba chos-rje-dpal, (6) P B Desai’s “Jainism in South India and some Jaina Epigraph”, (7) P V Kane’s “History of the Dharmshastras, Ancient and Medieval Religious and Civil Law”)

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