रानी पद्मावती को हम भूल भी जाएं तो देश के मंदिरों की दीवारें तो गवाही देंगी न!

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रानी पद्मावती के बलिदान को वर्णित करता काशी विश्वनाथ मंदिर की दीवार पर बना चित्र

रानी पद्मिनी (पद्मावती) से लोगों की धार्मिक भावनाएं तो निश्चित ही जुडी हुई हैं. लेकिन धार्मिक भावनाओं का क्या! छोड़िये, आप धर्म में नहीं मानते तो हम इसको दरकिनार कर देते हैं. हालाँकि हम दरकिनार भले कर दें उसे, लेकिन उन्हें मानने वाले लाखों लोग शायद ही कर पाएं.

हम भूल भी जाएं तो देश के मंदिरों की दीवारें तो गवाही देंगी न? या हम भूलने के मुगालते में उसे भी दरकिनार कर देंगे? खैर छोड़िए, धर्म को विषय नहीं ही मानते हैं. बात इतिहास की है तो इतिहास तथ्यात्मक होनी चाहिए.

इतिहास में रानी पद्मिनी (पद्मावती) का जिक्र आता है तो कहानी यही होती है कि राजस्थान की ये रानी, अलाउद्दीन खिलजी, जो विदेशी आक्रान्ता था, से बचने के लिए अपनी हज़ारों साथियों के साथ जीते जी अग्नि में कूद गईं.

जी, जौहर कर लिया. अब आप मानते हैं कि आत्महत्या कायरता होती है. लेकिन हाल में आपने कुछ आत्महत्याओं को खूब ग्लोरीफाई किया था. याद है न?

तो देश, धर्म की रक्षा के लिए, अपनी और साथी महिलाओं की इज्जत की रक्षा के लिए किया गया जौहर तो निश्चित ही पूजनीय होना चाहिए न?

हम तो गांधी-सुभाष को भी पूजते हैं. फिर तो रानी पद्म को भी पूजेंगे ही! वीरांगना थीं वो! प्राण दे दिए पर झुकी नहीं.

आप आज की पीढ़ी में नारी सशक्तिकरण और महिला अधिकारों की बात करते हैं. वो तब ऐसा जौहर दिखा के गईं हैं. इस वजह से तो उनका सम्मान और भी बढ़ जाता है.

एक वर्ग रानी को काल्पनिक मानने वालों का भी है. चलिए आपके कहे अनुसार उन्हें काल्पनिक भी मान लेते हैं. लेकिन इससे उस चरित्र की इज्जत कम हो जाती है क्या, जो मर गई लेकिन इज्जत से समझौता नहीं किया.

आप आर्ट और कला की बात करने वाले हैं. आप कला में इंसानों का जीवंत रूप देखते हैं. ऐसे में किसी काल्पनिक किरदार में एक बड़ा वर्ग अगर अपना सम्मान देखता है, नारियों का सम्मान देखता है, तो कलाविद, कलाप्रेमी होने के नाते आपको तो खुश होना चाहिए!

फिर हम तो उस देश से हैं जो एक के बाद एक आतंकी हमला झेलता है, लेकिन कभी आतंक को किसी मजहब से, किसी सम्प्रदाय से नहीं जोड़ता जिससे हमारे लोगो की भावना आहत न हो जाए.

हम हिंदुस्तानी हैं, हम भावुक लोग होते हैं. जो देश अपने अल्पसंख्यकों की भावनाओं की भी इतनी इज्जत करता है, वहां बहुसंख्यकों की भावनाओं को आहत करने की कोई कैसे सोच सकता है.

प्रतीक ही सही लेकिन उससे एक बड़े वर्ग की भावनाएं जुडी हैं. वो भावनाएं सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि उनके अतीत से जुड़े सम्मान की भी है. आप उसको छेड़ें. सहिष्णु भारत ऐसा शायद ही होने दे!

फिर तो संजय लीला भंसाली का इतिहास ही रहा है इतिहास से खिलवाड़ करने का. ऐसे में उनसे कोई स्क्रिप्ट दिखाने जैसी कोई मांग कर ही दे तो वो गलत तो नहीं है. आखिर कला के नाम पर कुछ भी परोसने की छूट तो कोई समाज नहीं दे सकता!

वैसे विरोध का जो तरीका करणी सेना ने अपनाया वो किसी भी स्थिति में उचित नहीं है. उसकी जितनी निंदा की जाए कम है.

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