सिर्फ पैसा कमाने के लिए होती है इतिहास से छेड़छाड़

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यदि किसी मूर्खानंद को पद्मिनी, आल्हा-उदल मिथ दिखते हैं तो इन मिथकों के निकटतम रिश्तेदार पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द, परिमर्दन देव को भी मिथ ही मानने होंगे?

तब इन्हें हराने वाले – मुहम्मद गौरी, गजनी, इल्तुतमिश, रजिया सुलतान, कुतुबुद्दीन ऐबक, घोर सनकी सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक भी मिथ ही होंगे!

और तब तो जैजाक्भुक्ति के चन्देल राजाओं का समग्र इतिहास मिथ ही होगा. कालिंजर का किला, खजुराहो के विश्व विख्यात मन्दिर, चन्देरी-महोबा के किले, ओरछा के ‘रामराजा’ मिथ ही होंगे!

तब तो बुंदेला वीरसिंह देव, उनका वह बेटा जुझारसिंह जिसने जहांगीर के कहने पर अबुल फजल को कुत्ते की मौत मारा था, मिथ ही होंगे!

यदि ये सब मिथ है, तब जुझारसिंह के अनुज हरदौल बुंदेला भी मिथ ही होंगे. तब बुन्देलखण्ड भी मिथ ही होगा!

तब छत्रसाल, कविवर भूषण, पेशवा बाजीराव और पानीपत का युद्ध ये सब मिथ ही होंगे.

भारत के सच्चे इतिहास को बार-बार मिथ बताने वाला यदि अंग्रेज इतिहासकार है, तो यह उसकी साम्राज्यवादी बाध्यता है. यदि कोई कट्टरपंथी ईसाई या मुस्लिम इतिहासकार यह मिथवाद झाड़ता है तो यह उसकी मजहबी मजबूरी हो सकती है.

यदि कोई विख्यात प्रगतिशील (इसे कुख्यात वामपंथी समझिए!) प्रोफेसर-इतिहासकार इन सबको मिथ कहता है तो मुझे कहना पडेगा कि उसके मन में चोर है. वह भारतीय गंगा जमुनी तहजीब की जड़ों में मठ्ठा डाल रहा है.

यदि संजय लीला भंसाली यथार्थ पर आधारित कलात्मक फिल्म बनाता अथवा शुद्ध मनोरंजनीय फिल्म बनाता, और यदि वह पैसा कमाने की अनलिमिटेड टुच्ची भूख से ग्रस्त नहीं होता तो कर्णी सेना के द्वारा किये गए दबंग प्रतिवाद के खिलाफ सारा देश खड़ा हो जाता. सारा प्रबुद्ध वर्ग भंसाली के अधिकारों की पैरवी करता.

यदि मुझे यकीन होता कि संजय भंसाली ने शाहरुख़ खान, सलमान खान की तरह अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट को जानबूझ कर विवादास्पद नहीं बनाया है, यदि मुझे यकीन होता कि संजय लीला भंसाली ने राजपूतों के इतिहास से रंचमात्र भी छेड़छाड़ नहीं की है, यदि मुझे यकीन होता कि भंसाली ने, राजपूतों की कर्णी सेना को जानबूझकर नहीं उकसाया है, यदि मुझे मालूम होता कि मार-कुटाई की यह घटना फ़िल्मी ‘टोटका’ नहीं है, तो देश के तमाम कलाप्रेमियों की तरह मैं भी उसकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पक्षधर होता.

लेकिन मैं पूरे यकीन से कह सकता हूँ कि कर्णी सेना तो सिर्फ कानूनी तौर पर ही गलत है, किन्तु भंसाली ने पैसा कमाने के लिए अलाउद्दीन को हीरो और अपनी मातृतुल्य रानी ‘पद्मिनी’ को उसकी रखैल साबित करने की कोशिश की है. भंसाली का यह अक्षम्य अपराध है.

आजादी के 70 वर्षों में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने अंडर वर्ल्ड का सहारा लेकर जितना भ्रष्टाचार फैलाया है, जितना सामाजिक प्रदूषण फैलाया है, जितना उन्मुक्त सेक्स परोसा है, जितना नारी देह का व्यापार किया है, वह संसार में अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा.

कई फ़िल्म निर्माताओं, वितरकों और हीरो-हीरोइनों ने अपने देश के साथ विश्वासघात किया है. उत्तर-आधुनिक बाजारीकरण और नव्य उदारीकरण के कुटिल दौर में दिग्गज फिल्मवाले अब नफा कमाने के लिए इतिहास को मिथ बनाने पर तुले हैं, वे भारतीय उदात्त चरित्रों का मजाक उड़ा रहे हैं!

बेशक फिल्म निर्माता यदि सही हैं तो उन्हें डर किस बात का? वे न्यायालय की शरण में क्यों नहीं जाते? वैसे भी न्यायपालिका इन दिनों फिल्म वालों पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है.

शायद भंसाली को सलमान खान की तरह भ्रष्ट व्यवस्था का फायदा उठाना नहीं आता. संजय भंसाली ने इतिहास के जिस खण्डहर में छलांग लगाईं है, वहाँ फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटे ही कांटे हैं.

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