कम से कम बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों जितने अधिकार तो दीजिए!

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Sanjay Lila Bhansali's movie on Rani Padmavati
चित्तौड़गढ़ में रानी पद्मावती के जौहर कुंड पर शीश नवाते प्रख्यात लेखक व विचारक पुष्कर अवस्थी

कल पढ़ने में आया कि करणी सेना ने पहले प्रोडक्शन हाउस को चिट्ठी लिखी, फिर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, फिर सूचना प्रसारण मंत्रालय से गुहार लगायी, और सुनने में आया है कि कहीं से कोई राहत नहीं मिली.

क्या एक धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यक समूहों के साथ बहुसंख्यक समूह को बराबर का दर्जा मिलना भी गुनाह है? कोई मूलनिवासी वाली बहस तो यहाँ कर ही नहीं रहा.

अल्पसंख्यक समूहों का अपना इतिहास, अपनी परंपरा बचाने के लिए सैकड़ों संगठन मोमबत्ती लेकर बाहर आ जाते हैं, कोर्ट बीच रात में खुल जाते हैं, सरकारें अध्यादेश ला देती हैं, कानून बदल देती हैं, पर बहुसंख्यक समाज को उसका इतिहास बचाने का संविधान सम्मत अधिकार भी क्यों लोगों को extremism लगता है?

ऊपर जो विषय लिखा वो एक सामान्य नागरिक की तरह सोचा और लिखा, पर थोड़ा वामपंथ का साहित्य उठायें और पढ़ें तो हमें पता चलेगा कि “पद्मावती” भंसाली के लिए अचानक कोई विषय नहीं बन गईं.

पद्मावती ऐतिहासिक रूप से हर उस वामपंथी सोच के व्यक्ति की आखों में कचरा रही है जिसे भारत के पुरुषप्रधान समाज और उसमे मौजूद शोषित होती अबला औरत जैसी धारणाओं को हिन्दू धर्म की अधिकृत सोच सिद्ध करने में एक विकृत आनंद की अनुभूति होती हैं!

और रानी पद्मावती और उनके जैसी 16000 वीरांगनाओं की शौर्यगाथा उनके इस प्रोपेगेंडा को तहस नहस करती दिखती हैं.

और ये बौद्धिक आतंकवाद आज से शुरू नहीं हुआ, अभी तो सिर्फ उसका विरोध शुरू हुआ है. ये आतंकवाद तो हमारे बचपन से चल रहा है जब से हमें हर रविवार the sword of tipu sultan दिखाया गया और ये नहीं बताया गया कि उस तलवार पर आखिर लिखा क्या था?

ये आतंकवाद तब से चल रहा है जब से इतिहास की किताबों में शिवाजी और महाराणा प्रताप को एक-एक पैराग्राफ में समेटा गया, जब भरतनाट्यम को सेक्युलर ढांचे में ढालने की कोशिश हुई, “आर्यन द्रविड़ियन डिवाइड” का झूठ फ़ैलाने की कोशिश हुई, और ये उदाहरण इतने हैं कि सुनाने बैठें तो पूरी रात निकल जाए!

इसलिए हे बॉलीवुड के महान रचनाकारों, ये रचनात्मकता का ढोल पीटना बंद कीजिये क्योंकि पहले हॉलीवुड से, फिर टॉलीवुड से कहानियां चुराने के बाद आपका ये एजेंडा भरा इतिहास को तोड़-मरोड़ कर विवाद पैदा कर पैसा कमाने का आइडिया अब जनता समझने लगी है.

इसलिए हे बिग बिंदी ब्रिगेड के कर्णधारों, बात-बात में हिन्दू आतंकवाद जुबान पर लाने से पहले एक बार ये सोच लेना कि कभी आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठ गयी और ये सच हो गया तो क्या होगा.

इसलिए हे धर्मनिरपेक्ष सरकारों, करणी सेना जैसी कुकुरमुत्ते की तरह उगी सेनाएं बनने से रोकना है तो इस देश के बहुसंख्यक समाज के इतिहास और उसकी परम्पराओं को भी उतना ही “प्रोटेक्शन” दीजिये जितना आप बाकि समूहों को देते हैं, ना ज्यादा, ना कम, जितना संविधान ने दिया उतना ही.

तब तक Alternate View वालों को Alternate तरीके से जवाब दिया जाता रहेगा!

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