काश कि मैं दुनिया की सारी बेटियों का पिता होता

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काश कि कोई लड़की आए
आए और मुझ से लिपट कर
मुझे प्यार से चूम ले
ऐसे जैसे मेरी बेटी स्कूल से लौटते ही
अपना बैग पटक कर, दौड़ कर, मुझ से लिपट कर
मुझे चूम लेती है और आहिस्ता से बोलती है पापा !

मैं झूम-झूम जाता हूं उस के इस अबोध प्यार में
दुनिया के सारे सुख मेरे मन में समा जाते हैं
वह उस का निश्छल चूमना
एक अलौकिक सुख में डुबो देता है

लड़कियों को लड़की की तरह नहीं
बेटी की तरह देखिए
लड़कियां और सुंदर हो जाएंगी
आप की दुनिया और सुंदर हो जाएगी
इस लिए कि बेटियां दुनिया की सब से सुंदर नेमत हैं

इस लिए कि बेटियां मुकम्मल होती हैं
उन में कोई कमी नहीं होती
आप आती -जाती अपरिचित लड़कियों को
एक बार बेटी संबोधित कर के तो देखिए
बेटी की नज़र से देख कर तो देखिए
आप के भीतर हजारों फूल खिल जाएंगे

यह अनायास नहीं है कि
बेटियां अधेड़ हो कर भी
बेटियां बूढ़ी हो कर भी
पिता को मान देती हैं
जैसे जब वह नन्ही लाल चुन्नी की उम्र में मानती थीं
पिता को वैसे ही, उसी ललक से याद करती हैं

हर बेटी का वास्तविक हीरो
उन का पिता ही होता है पति या प्रेमी नहीं
बेटियां पिता को सर्वदा हीरो बनाए रहती हैं
पिता के न रहने पर भी
बेटियां पिता को अपने जीवन में सर्वदा बसाए रखती हैं
अपने हीरो को वह अपनी यादों में कभी मरने नहीं देतीं

काश कि मैं दुनिया की सारी बेटियों का पिता होता
यह मेरा अपना स्वार्थ है
क्यों कि बेटियां अनमोल होती हैं
बेटियां मां का सुख होती हैं
बेटियां फूल की तरह होती हैं
सिर माथे पर रखने के लिए
जिन्हें आप पांव के नीचे नहीं आने दे सकते
छोटी होने के बावजूद , बेटी होने के बावजूद
आप उस के पांव छू कर बेबात ख़ुश हो जाते हैं
किसी बच्चे की तरह

वह लोग अभागे होते हैं
जिन के बेटियां नहीं होतीं
जो बेटियों का सुख नहीं जानते

– दयानंद पाण्डेय

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