इनसे इनके लेवल पे जाकर क्या ख़ाक लड़ेंगे हम…

कई कॉमरेड फिल्म राइटर, एक्टर, ऐक्ट्रेस, और निर्देशकों को जानता हूँ जिन्हें इनके संघर्ष के दिनों में अज्ञात जगहों से पैसे मिलते थे(हैं), ताकि वे बाकायदा अय्याशी करते हुए इंडस्ट्री में जगह बना सकें.

मैंने कुछ विश्वस्त मित्रों से इस बारे में जब जानना चाहा तो उनका यही कहना था कि फलाना दोस्तों से उधार ले-ले कर काम चलाता है… बेचारा…

कमाल देखिये, मेरी जानकारी में ऐसे कइयों को 5-5 सालों से कोई ढंग का काम नहीं मिला, पर इनकी अय्याशियों को देखकर हैरान हो जाता हूँ.

ये घर से भी इतने तगड़े नहीं कि बाप हर महीने बीसों हज़ार भेज कर इन्हें मुम्बई जैसे शहर में रखकर स्ट्रगल करवा सके.

फिर भी दारू और नॉनवेज तो हर रात चलता ही है, साथ ही इनकी रातें भी रंगीन होती रहतीं हैं, बस बदले में ये उनके लिए ऐसी फिल्में लिखते हैं, उनके लिए फेसबुक और ट्विटर पे सेकुलरई का तामा झामा खींचते हैं.

सब आँखों देखा और अनुभव किया बता रहा हूँ. मेरे दोस्त ग़लत नहीं हैं… उन्हें जितना दिखता है, वे उतना ही जानते और बताते हैं पर उन्हें क्या मालूम कि इनके वे दोस्त कौन लोग हैं?

हे कॉमरेड, ऐसे एकाध-दो दोस्त हमारे भी बनवा दो ताकि हम भी नौकरी छोड़ अपनी किस्मत आज़मा लूँ… अरे ठीक-ठाक एक्टिंग कर लेता हूँ… अल्लाह कसम , बड़ी दुआएं दूँगा, और जब बड़ा अभिनेता बन जाऊँ तो सूद समेत वापस ले लेना… भई, क्या दिक्कत है?

आप समझ रहे हैं ना? हिन्दू सेंटीमेंट्स, हमारे आराध्य और आदर्शों की खिल्ली उड़ाने के लिए हमारे विरोधियों के पास क्या-क्या तैयारियाँ हैं?

वे पैसे से सबल हैं, उनके लिए मीडिया में लोग बैठे हैं जो रात-दिन उनके लिए बौद्धिक कवच तैयार रखते हैं, उनके लिए ट्वीट और बहसें करते हैं… उनके लिए जुगाड़ और सेटिंग के लिए मेहनत करते हैं…

और हम क्या कर रहे हैं… महज़ 2 थप्पड़ मार कर चौतरफ़ा घिरे हुए ही हैं ना? यदि फेसबुक और ट्विटर पे ठीक-ठाक फैन फॉलोइंग वाले राष्ट्रवादियों के एकाउंट्स छोड़ दें तो एक भी ढंग का वर्ग है क्या, जो इस स्तर पर हमारा कायदे से प्रतिनिधित्व भी कर पा रहा हो… तो इनसे इनके लेवल पे जाकर क्या ख़ाक लड़ेंगे हम…

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