मेकिंग ऑफ़ अ कैप्टन : पर्रिकर, माधव या फडनवीस

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एक समय था जब क्रिकेट में हमारी दिलचस्पी का आलम ये था कि चाहे वो टेस्ट-मैच हो या वन-डे… चाहे दुनिया के किसी कोने में मैच हो रहा हो… चाहे भारत के साथ हो रहा हो या नहीं… स्कोर जानने की उत्सुकता हर वक्त बनी रहती थी. और यदि भारत भी खेल रहा हो तो उत्सुकता दुगुनी रहती थी.

तब टीवी पर सारे मैच नहीं आते थे, एकमात्र सहारा रेडियो ही था. लगभग सभी दोस्तों के पास पॉकेट ट्रान्ज़िस्टर होता ही था. कुछ दोस्त तो बाकायदा डायरी मेंटेन करते थे. मैच की तारीख, मैच का वेन्यू, देशों के नाम जिनके बीच मैच है… खिलाड़ियों के क्रमानुसार नाम आदि.

मैच खत्म होने पर किसने कितने रन बनाए… विकेट किसने लिए, आदि उनके नामों के आगे लिखा जाता था.

शाम को जब भी हम इकठ्ठे होते तो घंटों तक इसी बात की चर्चा होती कि कौन कैसा खेला? क्यों आउट हुआ? इस खिलाड़ी को इस मैच में इस नंबर पर आना चाहिए था… यदि ऐसे खेलता तो आउट नहीं होता.

हम भारतीय कोच और सेलेक्टर्स के फैसलों पर तो सवाल उठाते ही, साथ ही दूसरे देशों के बोर्ड या सेलेक्टर्स द्वारा लिए गए निर्णयों पर भी चर्चा करते थे.

मैच तो साल भर कहीं न कहीं होता ही रहता और हमारा समय भी इसी उधेड़बुन और चर्चा में निकलता रहता था.

उस वक्त हम सबसे ज्यादा किसी टीम से प्रभावित थे तो वो थी, टीम ऑस्ट्रेलिया और उसका बोर्ड.

एलेन बॉर्डर, जेफरी मार्श, डेविड बून के समय से ही हम ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड के क्रियाकलाप पर नजर रखते थे.

इसी बीच आस्ट्रेलियाई बोर्ड ने अपनी कार्यशैली में एक बड़ा ही महत्वपूर्ण परिवर्तन किया… खासकर कैप्टेन के चुनाव में.

इस परिवर्तन ने उस टीम को दुनिया की सबसे मजबूत टीम बनाने में बड़़ा योगदान दिया. स्टीव वॉ एवं रिकी पोंटिंग की कप्तानी में टीम उस शिखर को छुआ, जो इतिहास बना.

अब ये महत्वपूर्ण परिवर्तन क्या था?

तो महत्वपूर्ण परिवर्तन था… अगले होने वाले कैप्टन को समय से काफी पहले चिन्हित करना, खिलाड़ी को अघोषित तौर पर ये बताना कि अगले कैप्टन तुम ही बनोगे. अब यह युवा अपने को उसी रंग में ढालना शुरू कर देता था.

उस समय टीम के अन्य सीनियर्स को भी ये बात पता होती इसलिए टीम में कप्तानी के लिए कोई खींचतान नहीं होती थी.

यहाँ तक कि मैच के दौरान कमेंटेटर भी ये बात सरेआम कहते कि यह युवा खिलाड़ी ही ऑस्ट्रेलियन टीम की कैप्टेंसी करेगा.

इसी परिवर्तन का नतीजा था कि युवा रिकी पोंटिंग को बहुत पहले ही कैप्टन के रूप में चिह्नित कर लिया गया था जब टीम स्टीव वॉ के नेतृत्व में काफी अच्छा खेल रही थी.

बाद में रिकी पोंटिंग ने कप्तानी संभाली और अपने देश के लिए दो वर्ल्ड कप जीते. टीम को चोटी पर पहुँचाया.

जब पोंटिंग टीम को लगातार सफलता दिलाए जा रहे थे तभी ये तय हो गया था कि अगला कैप्टन युवा माइकल क्लार्क बनेंगे.

बाद में क्लार्क ने भी ऑस्ट्रेलियाई टीम को ऐसा नेतृत्व दिया कि अपने देश के लिए वर्ल्ड कप जीता.

बाद में स्टीव स्मिथ के साथ भी यही कहानी दुहराई गई जो वर्तमान में कैप्टन हैं.

कहने का मतलब यह है कि कैप्टन को समय रहते तैयार किया गया था. उस युवा को पता था कि उसे क्या जिम्मेदारी मिलने वाली है… कैसे हैंडल करना है… कब क्या निर्णय लेना चाहिए? इसका नतीजा सबके सामने है.

अब कुछ बात करते हैं देश की राजनीति पर.

तो आज हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी हैं. यानी कि बीजेपी के कैप्टन. राजनीति की पिच पर बहुत अच्छी बैटिंग कर रहे हैं… जिस तरह से वो गेंद की लाईन में आकर गेंद को सीमारेखा से बाहर भेज रहे हैं… या कभी कभी स्विंग करती गेंदो को छोड़ रहे हैं… लगता है कि वो लंबी पारी खेलेंगे.

पर एक समय ऐसा भी आएगा जब इन्हें राजनीति से संन्यास लेना होगा. तब आवश्यकता होगी एक नए कैप्टन की… यानी अगले प्रधानमंत्री की.

तो भावी प्रधानमंत्री के चुनाव की जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक बोर्ड के हाथों में है. यह बोर्ड भी अब अपनी कार्यशैली में बदलाव लाता दिख रहा है.

वैसे तो इस राजनीतिक टीम में कई धुरंधर खिलाड़ी हैं… जिनके बीच में नंबर दो, नंबर तीन या चार के पोजिशन के लिए रस्साकशी चल रही है…

हालाँकि ये बातें बाहर नहीं आती पर मोदी के उत्तराधिकारी बनने के लिए कई लोग प्रयासरत निश्चित तौर पर होंगे.

परंतु इस पर संघ भी बराबर नजर रखे हुए है. और इसका नजारा भी दिखाई पड़ा.

पाँच राज्यों में जहाँ इस वक्त चुनाव होने वाले हैं उसमें गोवा भी एक राज्य है.

इस बीच नितिन गडकरी का बयान आता है कि गोवा में यदि बीजेपी जीतती है तो वहाँ मुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को गोवा भेजा जा सकता है.

अब चूँकि पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह हैं तो बगैर उनकी अनुमति के गडकरी तो ये बयान दे नहीं सकते हैं. यानी कि शाह और गडकरी इन्हें केन्द्र से हटाकर राज्य में भेजना चाहते हैं.

मनोहर पर्रिकर के सामने भी ये बातें लाई गई कि चूँकि गोवा की राजनीति में उनकी दिलचस्पी है इसलिए पार्टी के हित में उन्हें गोवा जाना चाहिए.

मनोहर पर्रिकर ने यह कहकर अपनी अनिच्छा ज़ाहिर कर दी कि ‘वैसे तो गुजरात की राजनीति में तो मोदी और अमित शाह की भी दिलचस्पी है, इसका मतलब ये तो नहीं कि वे केंद्रीय राजनीति को छोड़ दें?’

वैसे मनोहर पर्रिकर दिल्ली में ही रहना चाहते हैं. दिलचस्पी होनी तो अच्छी बात है. हाँ, यदि गोवा में बीजेपी सत्ता में नहीं आई तो इसका ठीकरा मनोहर पर्रिकर पर जरूर फूटेगा.

सनद रहे कि मनोहर पर्रिकर ने अपनी योग्यता बखूबी साबित की हुई है. गोवा में बीजेपी की सरकार इन्हीं की बदौलत बनी थी.

भारतीय इतिहास के सबसे काबिल रक्षामंत्री साबित हुए हैं. एक स्वयंसेवक हैं, देश के लिए समर्पित हैं. मोदी की तरह इनकी स्वच्छ छवि है, कम बोलते हैं पर सोचकर बोलते हैं. साधारण दिखते हैं पर व्यक्तित्व असाधारण है.

आरएसएस ने स्पष्ट कह दिया है कि पर्रिकर को केंद्रीय कैबिनेट में यानी दिल्ली में ही रखा जाएगा. संघ मनोहर पर्रिकर को नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में देख रहा है.

अब भले ही कोई अपने को दो, तीन या चार नंबर माने या दिखाने का प्रयास करे… मेकिंग ऑफ़ ए कैप्टन का काम चालू है.

वहीं एक अन्य आंकलन के मुताबिक – 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत की स्थिति में मोदी के हाथ में ही कमान रहेगी.

हालांकि 2024 के लिये संघ की पहली पसंद राम माधव है. भविष्य की तैयारी के लिए माधव को 2019 की केबिनेट में जगह दी जायेगी.

इस आंकलन के पर्रिकर की उम्र मोदी से महज़ 4 साल कम है. जबकि संघ एक युवा नेता चाहता है जो लगातार दो कार्यकाल संभाल सके.

वहीं, एक तीसरा नाम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस का भी है. अन्य सभी गुणों के अतिरिक्त इनका मराठी होना अन्य नामों पर भारी पड़ सकता है.

उल्लेखनीय है कि संघ की स्थापना के बाद से ही इस पर मराठा वर्चस्व रहा है. नब्बे साल से अधिक समय से स्थापित संघ में महज़ दो सर संघचालक ही गैर मराठी हुए हैं – कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन और प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया.

इतनी कम उम्र में राजकीय दृष्टि से महाराष्ट्र जैसे दुरूह प्रदेश का नेतृत्व करना निश्चित ही फडनवीस के पक्ष में जाता है. जबकि माधव को कोई इसका कोई अनुभव ही नहीं और पर्रिकर ने गोवा जैसे छोटे राज्य का नेतृत्व किया है.

फिलहाल भले ही स्थितियां पर्रिकर के पक्ष में दिखें पर अगर प्रधानमंत्री चयन में संघ की चली तो फैसला माधव और देवेन्द्र फडनवीस के बीच में ही होने की अधिक संभावना है.

(साथ में सनोज कुमार पारीक  और मां जीवन शैफाली)

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