आखिर नोटबंदी पर यूँ ही नहीं तड़पी थीं ममता

0
281

मोदी सरकार के विमुद्रीकरण का सबसे बड़ा विरोध ममता बनर्जी ने किया. ममता ने मोदी सरकार पर हर तरह का हमला किया, हर तरह के आरोप लगाए जिसमें केजरीवाल भी साथ में थे.

वहीं बंगाल में सांप्रदायिक घटनाएं भी बढ़ रही हैं. मुस्लिम समुदाय की कट्टरता, उग्र प्रदर्शन अपने शबाब पर हैं.

ये सभी बातें जगजाहिर हैं. लेकिन कुछ और भी बातें हैं जो हो रही हैं लेकिन आम जनता की निगाह में नहीं हैं.

ममता, केजरीवाल, कांग्रेस, वामपंथी सभी का एक कॉमन आरोप है कि मोदी सरकार अम्बानी-अडानी की सरकार है. किसानों और मजदूरो की दुश्मन हैं. नोटबंदी से सबसे ज्यादा किसान और मजदूर प्रभावित हुए हैं, बर्बाद हुए हैं.

बंगाल में 35 साल वामपंथ का शासन रहा. उसके बाद पिछले 7 साल से ममता शासन में हैं. लेकिन कभी किसानों और मजदूरों की प्रगति, उनके अच्छे जीवन स्तर के बारे में कुछ सुना नहीं.

बल्कि ये जानकर और आश्चर्य होता है कि मोदी सरकार और ममता सरकार में इन्हीं मजदूरों को लेकर पिछले एक-डेढ़ साल से लगातार तनातनी चल रही है.

बंगाल में असम की तरह चाय बागान हैं, दार्जिलिंग में, जहाँ की चाय बेहद प्रसिद्ध है. और यहाँ लाखों, करीब 4 लाख मजदूर बेहद विषम परिस्थितियों में इन चाय बागानों में काम करते हैं.

एक साल पहले इन मजदूरों को सिर्फ 90 रूपये प्रति दिन की मजदूरी मिलती थी. इन मजदूरों में पुरुष और महिलाएं दोनों होते हैं. महिला मजदूरों की दैनिक मजदूरी इससे भी कम थी.

मोदी सरकार के लगातार हस्तक्षेप, दबाव के बाद भी ममता ने दैनिक न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि नहीं की.

इसके बाद मजबूर होकर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीताराजन ने इन मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी को केंद्रीय सहायता के रूप में 250 रूपये किया.

90 रूपये रोजाना के हिसाब से करीब 2700 रूपये प्रतिमाह. जिसमें एक परिवार का पोषण होना है. सोचने की बात है.

जब मोदी सरकार विमुद्रीकरण लायी तो स्वाभाविक रूप से सबसे ज्यादा प्रभावित भी यही मजदूर होते.

केंद्र सरकार ने एक अनूठी पहल की. चाय बागानों को आदेश दिया गया कि वो सारी मजदूरी सरकार के पास जमा कराएं और सरकारी अधिकारी इन मजदूरों को नकद मजदूरी देंगे.

वजह ये थी कि अत्यंत पिछड़े इलाके में कुछ ही बैंक थे. कुछ ही एटीएम थे और मजदूरो की संख्या लाखों में थी.

ममता ने इस पर सख्त एतराज जताया. इसे राज्य के अधिकारों का उल्लंघन करार दिया. करीब 15 दिनों तक उन्होंने मजदूरी बंटने नहीं दी.

इसके बाद विमुद्रीकरण के अगले चरण में मोदी सरकार ने सभी कंपनियों को आदेश दिया कि इस बार वेतन चेक से दिया जाना है. ये आदेश पूरे देश के लिए था और इसमें चाय बागान भी आते थे.

लेकिन समस्या ये थी कि इन लाखों मजदूरों के पास कोई अकाउंट नहीं था. रिजर्व बैंक ने सम्बंधित बैंको को आदेश दिया कि वृहद स्तर पर कैम्प लगाकर इन मजदूरों के अकाउंट खोले जाएँ.

चाय बागान मालिकों की हताशा का अंदाज लगाया जा सकता है. कितने ही लोग मजदूरो की कम संख्या दिखाते होंगे.

सस्ती मजदूरी, वो भी दैनिक, कोई सुख सुविधा नहीं. और अब बैंक अकाउंट का मतलब, कि आने वाले दिनों में ये सब चोरी बंद.

चाय के बागान छोटे-बड़े किसान नहीं चलाते. न ही सरकार चाय का न्यूनतम सपोर्ट कीमत घोषित करती है. दार्जिलिंग क्वालिटी की चाय हजारों रूपये किलो के भाव बिकती है.

समझने की बात है कि कितना मुनाफा होता होगा और कितना मजदूरों को जाता होगा. ममता आखिर नोटबंदी पर यूँ ही नहीं तड़पी थीं. आखिर बिना खाये-खिलाये बंगाल में धंधा कैसे चलता होगा.

मोदी सरकार यही काले धन को बंद कर रही है. उसे आम जनता, मजदूरों तक पहुंचा रही है.

बस दिक्कत ये है कि मोदी सरकार बदनाम किया गया है. उसे अमीरों की, सूट-बूट की सरकार कहा जाता है.

और जो असल में मजदूरों-किसानों के दुश्मन हैं वो अपना नकाब पहने रहते हैं. उनकी मदद ये बौद्धिक आतंकवादी करते हैं जो अखबारों, और फेसबुक पर लिखते हैं, टीवी चैनलो में प्राइम टाइम में आकर मोदी सरकार को कोसते हैं.

अगर सिर्फ इन्हीं लोगों की बातें सुनेंगे तो एक दिन इनके गुलाम बनकर रह जायेंगे. अपनी ही सरकार से हाथ धो बैठेंगे. जानिए असलियत को… अपनी सरकार को सपोर्ट कीजिये. झूठ का मुंह काला कीजिये.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY