नक्सलियों ने ढहाई तेरहवीं शताब्दी की ढोलकल में स्थापित गणेश प्रतिमा

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1300 ईस्वी से दंतेवाड़ा ढोलकल में विराजित रहे है गणपति खुद से कैसे गिर सकते थे? नक्सलियों की इस करतूत ने बस्तर के सबसे प्राचीन धरोहर को नष्ट कर दिया बेहद ही शर्मनाक!

बामियान में बारूदों से जब लपेटा जा रहा था, तब बुद्ध मुस्कुरा रहे थे. नालंदा में जब आक्रांता किताबों की होली जला रहे थे तब किताबें मुस्कुरा रही थीं. और जब बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तब हमारी गंगा-जमुनी तहजीब मुस्कुरा रही थी. ढोलकल से धकेले जाते वक्त गणपति भी जरूर मुस्कुराए होंगे.

ढोलकल के गणपति पहाड़ी से गिरकर नष्ट नहीं हुए, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा ऊंचाई पर, उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूत वादियों में, कला-संस्कृति-इतिहास और प्रकृति से प्रेम करने वालों की विहंगम आत्मा में हमेशा-हमेशा के लिए स्थापित हो गए.

प्रश्न यह है कि गणपति को क्यों धकेला गया? उत्तर भी सबको पता ही है. इसे कुछ और सवालों से जोड़कर देखते हैं. बस्तर के स्कूलों को बारूदों से क्यों उड़ा दिया गया? बस्तर में सड़कों को क्यों खोदा गया? बस्तर में बिजली के टावरों को क्यों उड़ाया गया? इससे किसका नुकसान है और किसका फायदा है? वह फायदा किस तरह का है?

लेकिन ऊपर के सारे सवाल एक जैसे नहीं है. ढोलकल का सवाल बड़ा है. बहुत बड़ा. इस सवाल को समझने के लिए यह समझना होगा कि ढोलकल आखिर है क्या.

ढोलकल बस्तर के आदिम वैभव की पताका है. वह उस भ्रम का खंडन है, जिसे जानबूझकर पूरी दुनिया के जेहन में बोया गया. वह इस बात का प्रतिवाद है कि बस्तर के लोगों की चेतना सदियों से पिछड़ी हुई है. वह बस्तर के ऐतिहासिक पिछड़ेपन की अवधारणा से इनकार भी है.

ढोलकल उस इतिहास का दर्पण है, जो बताता है बस्तर को लूटने-खसोटने के लिए कब-कब आक्रांताओं ने रक्तपात किए. वह हैदराबाद के निजाम और अंग्रेजों द्वारा की गई साजिशों का जीवंत दस्तावेज है. वह बापी राय जैसे बस्तर के ऊर्जावान युवाओं की अनुसंधान क्षमता का प्रमाण है. वह राजीव रंजन का ऐतिहासिक उपन्यास है.

ढोलकल बचेली और बैलाडीला के सिर का मुकुट है. वह दंतेवाड़ा के बदलाव की सकारात्मक दिशा है. ढोलकल माई दंतेश्वरी का आशीर्वाद है. वह बस्तर के लोक में रची बसी परंपरा है. बस्तर के मानवीय मूल्यों, कलाप्रियता, शांतिप्रियता का प्रमाण है.

ढोलकल से धकेले जाते वक्त गणपति भी मुस्कुराए होंगे. जैसे बामियान में बुद्ध.

ढोलकल की प्रतिमा कैसे गिरी, इसको लेकर अलग अलग तरह की थ्योरी सामने आ रही है, एक यह कि एक हेलिकाप्टर इलाके में चक्कर लगाते देखा गया. अब यदि यह सच है तो प्रतिमा या तो हवा के दबाव से गिर गई या फिर उसे हेलिकाप्टर से लिफ्ट करने की कोशिश की गई. यदि हवा के दबाव से गिरी तो सवाल यह कि इतनी सदियों से भयंकर आंधी तूफान में भी कैसे टिकी रही.

अब यदि उसे एयर लिफ्ट करके चुराने की कोशिश हुई तो प्रश्न यह कि क्या चोरों के हेलिकाप्टर की उड़ान और उड़ान के रास्ते पर कोई निगरानी नहीं रही होगी. वह भी इतने संवेदनशील इलाके में और गणतंत्र दिवस के आस-पास. प्रतिमा की लिफ्टिंग मिनटों में तो नहीं हो जाती, तो क्या हेलिकाप्टर के पास इतना वक्त था और क्या पायलट इस कदर बेखौफ था.

एक और थ्योरी (अटकल) यह कि पत्थर पर दरार पड़ गई होगी. अब यदि यह दरार पहाड़ी के पत्थर पर पड़ी हो तो प्रतिमा तभी गिर सकती है, जब पहाड़ी झुक जाए. यदि प्रतिमा पर दरार पड़ गई हो तो हो सकता है कि दरार की पीड़ा सहन न कर पाने की वजह से प्रतिमा ने कूदकर खुदकुशी कर ली हो.

कैसी, कैसी बचकानी अटकलें हैं, हजम नहीं हो रहीं.
– केवल कृष्णा

भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति क्रूरता

कल जब पूरा राष्ट्र गणतंत्र दिवस मना रहा था तब गणतंत्र के हत्यारों ने बस्तर के वनांचल 4000 ft की ऊंचाई पे स्थापित ढोलकल की पहाड़ियों की गणेश प्रतिमा जो 1000 पूर्व से स्थापित थी एवम् पौराणिक ‘ परशुराम – गणेश युद्ध’ के स्थल को साक्षी थी उसे गिरा दिया गया है यह काम जिसने भी किया है हमारे हिन्दू धर्म की आस्था को आघात है …..

यह स्थल वामपंथ प्रभावित क्षेत्र है और यहाँ कुछ दिन पूर्व ही सरकार द्वारा सड़क मार्ग प्रस्तावित किया गया था प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु 8 km की यात्रा कर भगवान गणेश की प्रतिमा के दर्शन करते थे. अपने प्रभाव क्षेत्र में लाल लड़कों को इस तरह की गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं हुई होगी …… इस तरह प्रतिमा को गिरा उसे नष्ट करने का प्रयास औरंगज़ेब और फ़िरोज़ तुगलक की श्रेणी का अपराध है. ये कार्य जिसने भी किया है मैं उसे ‘ बस्तर का बख्तियार ख़िलजी’ कहूँगा …….

– शिवेश मिश्र

फ़ोटो साभार – Rakesh R. Singh

नोट : उपरोक्त खबर फेसबुक से प्राप्त की गयी हैं, हालांकि पुलिस के अनुसार मूर्ति नक्सलियों द्वारा तोड़ा जाने की संभावना बताई गयी है. इस पर व्यापक जांच चल रही है. सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर काफी जन आक्रोश दिखाई दे रहा है. बस्तर के लोगों को सनातन धारा से अलग थलग करना भी उनका छुपा हुआ एजेंडा होने की सम्भावना है. सच्चाई क्या है यह जांच के बाद ही पूरी तरह से स्पष्ट हो सकेगा.

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