काबिल से पिटा रईस

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‘रईस’ हमेशा से अय्याश और फटीचर थे. असल में रईस शब्द निकला था रियासत से… मध्यकाल में हिन्दुओ को ‘रियाया’ कहा जाता था. जिनसे बड़ी रकम जजिया ‘रैय्यत’ के रूप में वसूली जाती थी.

जिन इलाकों को कब्जे में लेकर वहां के पूजा स्थल तबाह कर दिए जाते थे, वे रियासतें थीं. छोटे-छोटे तमाम ऐसे गुंडई वाले इलाके बने थे. वहां ‘जजिया’ वसूला जाता था यानी हिंदू बने रहने की कीमत.

वहां कोई न कोई खूंख्वार और डकैत टाइप का व्यक्ति भी भेज दिया जाता था. जो व्यवस्था के नाम कानून-रहित कब्जेदारी रखता था. अब समझ गए न ‘रईस’ क्या था.

मुफ्तखोरी और गुंडई के चलते वह इतनी ऐय्याशी करते थे कि धीरे-धीरे रईस शब्द अमीरी का पर्याय बन गया. वामी-सामी बड़े चालाकी से गुलामी के ‘प्रतीक’ शब्दों को एक्सेप्ट करवाते हैं.

उनका छिपा-मजहबी उद्देश्य साफ़-साफ़ तब ज्यादा दिखने लगता है जब वे ‘गुलामी’ और नकारात्मक चीजों को तार्किकता के जामे में पेश करने की असफल कोशिश करते हैं. यह दोगलापन तब उभर कर और सामने आ जाता है जब वे इसे ‘सेकुलर’ क्रिएशन कहते हैं.

आप मुस्लिम निदेशकों, ऐक्टरों, निर्माताओं वाली फ़िल्में थोड़ा ध्यान और दिमाग से देखिये. ऐसे हजारो ‘टारगेट’ दिख जायेंगे जो बड़े तरीके से हमारे जीवन में घुसाये जाते हैं.

नाम में ही बहुत कुछ रखा है. गाने, सूफियानापन, उर्दू शब्द, जीवन शैली, व्यवहार, उसमे काम करने वाले लोग, कहानी, पात्र, हिंदू जीवन-पद्धति-संस्कारों से नफरत और प्रस्तुतिकरण. ‘वे’ बाकायदा कोशिश करके एक ‘टेस्ट’ विकसित करने की कोशिश में लगे रहते हैं.

फ़िलहाल!

यह भी साबित हो गया. पूरे देश से टीम की खबर है कि रईस की हालत खराब है. आज का तो और बुरा हाल है… टोटा पड़ा है. सामान्य दर्शक केवल ‘काबिल’ पर भरोसा कर रहे हैं. हां, भाई-लोगों का रूख जरूर उधर है.

समस्या यह है कि हकलाने के अलावा उस फिल्म में भी कुछ नही है. वैसे भी वास्तविकता है कि ऋतिक रोशन का दैहिक सौष्ठव… सिक्स पैक्स रीयल है. पिछले साल यह बात खुल कर सामने आ गई कि ‘हकला’ पैक्स पहन कर आता है. वह रीयल नही है.

‘रईसों’ की रियासत ‘दंगल’ के साथ ही मिट गई.

भाई लोग कितना चलायेंगे. ‘पंचर’ से आगे भी तो सोचना है. भीड़ बढाने में ‘भाई’ दब गया. उससे जनता में भी क्लियर हो गया कि ‘रईसी’ का सारा खेल मजहबी था.

अब रईसों का केवल केवल ‘फ़ोफा’ ही बचा है. फ़ोफा तो जानते है न?

अरे वही जो पुराने ‘रईस’ मिटने के बाद दुनिया भर में झाड़ते थे. कुछ थोड़ा बहुत जुगाड़-पानी के लिए. तरह-तरह के प्रदर्शन करते. जिससे लगे कि अभी कुछ दम है. मीडियाटिक प्रोपोगंडा कितना ठहरेगा भला!

अंत में यह पक्की बात जान लीजिये कि किसी ‘काबिल’ के आगे कोई गुंडा ‘रईस’ नहीं टिकता है. शिवाय की तरह यह भी टॉप-गेयर में है.

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