श्रम करके उपभोग करो, हे लघु भारत अर्थात उत्तर प्रदेश के वासियों

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मकर संक्रांति को तिलों की क्रांति कहें तो भी अतिशयोक्ति न होगी. व्यंजन ही व्यंजन, भोग में, दान में, धर्म में और काम में. तिल भी उन कुछ चुनिंदा द्रव्यों में से है जो चारों पुरुषार्थ का दाता है.

पञ्चतंत्र मे एक कथा है. एक गरीब गृहिणी के घर संक्रांति के एक दिन पूर्व ब्राह्मण देव अतिथि रूप में पधारे. प्रसन्न गृहिणी ने सपरिवार उनका यथायोग्य स्वागत किया.

उन्हें आराम के लिए आसन देकर दंपति अपने कक्ष में परामर्श हेतु गए और विचार करने लगे कि दान-पुण्य के महान दिवस के ठीक पहले पधारे ब्राह्मण देव को दान के लिए क्या प्रस्तुत करे.

निर्णय हुआ कि सवा सेर उत्तम तिल जो घर में है, ये उन्हें भोजन के पश्चात् दक्षिणा स्वरुप प्रस्तुत किये जाए.

गृहिणी ने विचार किया कि अँधेरी कोठरी में पड़े तिल कुछ नम हो गए होंगे, अतः उन्हें भगवान सूर्य की कृपा (धूप) दिखा दी जाये. उसने एक स्वच्छ वस्त्र पर तिल सुखा दिये और भोजन की व्यवस्था मे लग गई.

दुर्भाग्य से एक श्वान (कुत्ता) आ गया और उसने उन तिलों पर मूत्र विसर्जन कर दिया. गृहिणी ने जब देखा तो श्वान को भगाया लेकिन तब तक तिल दूषित हो चुके थे.

अब चिंतित गृहिणी समस्या से ग्रस्त इस संकट के भेदन का मार्ग सोचने लगी. उसने तिलों को उसी वस्त्र में समेटा और गाँव में निकल पड़ी.

‘बिना बीने हुए तिलों के बदले साफ़ तिल ले लो.
बिना बीने हुए तिलों के बदले साफ़ तिल ले लो.’

एक सेठानी ने आवाज लगाई – ‘सुनो क्या कह रही हो, क्या सौदा लाई हो?’

‘बिना बीने हुए तिलों के बदले उतने ही साफ़ तिल ले लो.’

‘अच्छा! मेरे पास तुला है, एक पलड़े में साफ़ तिल लूंगी और दूसरे से बिना बीने हुए तिल दूंगी. एक तौला भी अधिक ना दूंगी. बोलो सहमत हो?’

‘आप दयावान है सेठानी -जैसा आप उचित समझे’ कहते हुए गृहिणी ने गठरी खोली और तिल फैलाये.

तभी सेठजी भी आ गए, बोले- ‘क्या सौदा कर रही हो सेठानी?’

सेठानी ने सगर्व सब बता दिया, बोली- ‘साफ़ करने की मेहनत बची.’

सेठजी बोले, ‘अरी भागवान! अपने साफ़ तिलों के बदले कोई ख़राब तिल नहीं लेता.’

ये कहते हुए सेठजी तिलों का परीक्षण करने लगे और बोले, ‘नहीं चाहिए देवी, बिलकुल नहीं. आप कही और ले जाएं.’

‘सुनो भाग्यवान! कोई भी कभी भी अपने साफ़ तिल, ख़राब तिलों से नहीं बदलता. उन तिलों को श्वान के मूत्र ने दूषित किया हुआ था. हमारे लिए अनुपयोगी थे. लालच मत करो देवी.’

तो हे लघु भारत उत्तर प्रदेश के वासियों, मुफ़्त का मोह त्यागो. श्वान के मूत्र से अभिषिक्त तिलों के बदले अपने उत्तम तिलों का सौदा ना करो, बल्कि उन्हें कंकरों से वंचित करने का श्रम करके उनका स्वयं उपभोग करो.

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