सांप का प्रायश्चित, हथिनी की समझाइश और मेंढकों का शिकार

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पंचतंत्र की एक कथा है.

एक समय की बात है. एक सांप बहुत बूढ़ा हो गया था. वह शिकार के योग्य नहीं रहा अतः दुर्बल हो गया.

एक दिन जब वह जंगल से गुजरा तो एक हथिनी को देखा जो “सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय” चिंघाड़ रही थी.

दुर्बल सांप ने हथिनी से कहा, “हे हस्तिनी! मेरी रक्षा करो… आवश्यकता पड़ने पर मैं भी आपके काम आऊंगा.”

हस्तिनी तैयार हो गई. उसने सांप से पूछा कि मुझे क्या करना है? सांप ने उसे मेंढकों को समझाने का निवेदन किया.

हथिनी मेंढकों के पास पहुंची और उन्हें समझाने लगी कि उन्होंने (सांप ने) जीवन भर बहुत हिंसा की है, लेकिन अब उनका मन ग्लानि से भर गया है. उन्हें अपने द्वारा की गई हिंसा पर बहुत अफसोस है और अब वह प्रायश्चित करना चाहते है. आप इनकी बात सुनो.

मेंढक पहले तो डरे… फिर धीरे-धीरे उसके पास आने लगे और पूछने लगे कि आप प्रायश्चित कैसे करेंगे?

तो सांप बोला, “देखो भाई, मैंने जीवन भर मेंढ़कों को बहुत परेशान किया. अब मैं उनका मनोरंजन कर के अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहता हूँ. मैं चाहता हूं कि मैं तुम लोगों को अपनी पीठ पर बैठा के पूरा जंगल घुमाऊ, इस तरह से तुम्हारा मनोरंजन कर के मुझे कुछ शांति मिलेगी.

मेंढकों ने सांप से कहा, “भाई तुम तो हमें खा जाओगे… हम तुम्हारा कैसे विश्वास करें?

सांप बोला, “ऐसा नहीं है भाई, अब मैं बूढ़ा हो चला हूं और सच में प्रायश्चित करना चाहता हूं, तुम लोग बिना डर के मुझ पर सवारी करो. तुम्हारे परिवार में जो कोई अपनी आयु से मृत्यु को प्राप्त होगा या किसी दुर्घटना में मारा जाएगा, मैं केवल उसी के शरीर का भक्षण कर जिंदा रह लूंगा.

मेंढकों ने कहा कि हम आपको विचार करके बताएंगे. मेंढकों ने विचार किया कि यह हमारा शत्रु है लेकिन अब बूढ़ा हो चुका है, अतः सांप की पीठ पर सवारी करने मैं कोई खतरा नहीं है. यह एक अद्भुत आनंद होगा.

सांप, मेंढकों को अपनी पीठ पर बैठा कर पूरा जंगल घुमाने लगा. मेंढक इस दिव्य अनुभव का आनंद उठाने लगे. सांप उन मेंढकों को बारी-बारी से जंगल का भ्रमण कराने लगा. मेंढक बहुत खुश थे. स्वयं को सांप की सवारी कर धन्य मानने लगे.

अब सांप धीरे-धीरे अंधेरे का फायदा उठा कर उन्हें एक-एक कर खाने लगा. कुछ मेंढकों को शक हुआ और वे सांप से दूर रहने लगे लेकिन अन्य मेंढकों को सांप पर सवारी करता देख कर वे भी सवारी के लिए उत्सुक होने लगे. धीरे-धीरे करके सांप सभी मेंढको को खा गया.

इस कथा का निष्कर्ष यह है कि, “हे लघु भारत अर्थात उत्तर प्रदेश के पवित्र निवासियों! आप सांप की सवारी का लालच मत पालो. मौका मिलते ही वह आपको खाये बिना मानेगा नहीं. “खाकी नेवला” ही सबसे बेहतर विकल्प है आप लोगों के लिए, और हां हथिनी के बहकावे मैं बिल्कुल मत आइएगा.”

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