छद्म नारीवाद : अनुभूति और वास्तविकता का फर्क

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लिस्बेथा ओल्स्डॉटर (Lisbetha Olsdotter) स्वीडिश थी. वो घर से अपने पति और बच्चों को छोड़ कर भाग गई. थोड़े ही समय बाद उनकी मुलाकात एक सिपाही की विधवा सारा से हुई जिसने उन्हें पुरुष का भेष बना कर एक दूसरी विधवा मारिया को प्रेम जाल में फंसाने की सलाह दी.

सन 1678 में वो जॉन पर्सन नाम के एक ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी के घर में नौकर थी. उन्होंने मैट्स एर्स्सोंन नाम भी रख लिया था. वहां से वो एक नाविक और समुद्री व्यापार करने वाले एरिक पर्सन अर्नेल्ली के पास काम करने गई. एरिक को भी पता था कि वो औरत है.

अब एरिक पर्सन अर्नेल्ली की मदद से वो औरत होने के बावजूद फ़ौज में भर्ती हो गई. मदद और चुप्पी के लिए उन्होंने अपनी तनख्वाह में से एरिक अर्नेल्ली को पैसे भी दिए. वो हर मिलिट्री ड्रिल में होती और फौजी की सारी जिम्मेदारियां भी निभाती.

चर्च की सारी परंपरागत जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने कर्सटिन अर्सडॉटर से शादी भी कर डाली! अब जो भेद खुलना था वो जब कर्सटिन पर खुला तो वो औरत की औरत से ही शादी से सदमे में आ गई. कर्सटिन ने फ़ौरन लिस्बेथा के औरत होने की कहानी अधिकारीयों को बता दी.

लिस्बेथा पर मुकदमा चलना शुरू हुआ. पहला आरोप था पति और बच्चों को छोड़कर भागने का.

दूसरा आरोप था पुरुषों के कपड़े पहनने का, जो कि बाइबिल के हिसाब से मना है, यानि उन पर पुरुष होने का सेक्युलर फ्रॉड (secular fraud) का आरोप.

तीसरा आरोप था बहुविवाह, क्योंकि एक पति के होते हुए उन्होंने शादी की.

चौथा समलैंगिकता का था, क्योंकि विवाह के पवित्र रिश्ते को उन्होंने समलैंगिक विवाह कर के अपवित्र कर दिया था.

पांचवा चोरी का आरोप, क्योंकि उन्होंने औरत होकर भी सेना की तनख्वाह ली थी.

छठा धोखाधड़ी का, क्योंकि उन्होंने सेना का पेशा चुना था और चर्च के हिसाब से औरत होने के कारण वो सैनिक की जिम्मेदारी तो निभा ही नहीं सकती थी.

लिस्बेथा को सन 1655 से चर्च के धार्मिक नियमों को तोड़ने के आरोपों में सजा दी गई.

लिस्बेथा पर जानते बूझते अपने लिंग को “क्षत-विक्षत” करने का आरोप सिद्ध हुआ. उनपर अधिकारियों और अपने “साथ के इसाई समुदाय” के साथ पुरुष होने का धोखा देने का आरोप सिद्ध हुआ.

ऐसा करके उन्होंने चर्च के हिसाब से “ईश्वर और उसके नैसर्गिक आदेश” का उल्लंघन किया था. जिस से उन्होंने शादी की थी, उस कर्सटिन को अपराध में शामिल नहीं, बल्कि अपराध का शिकार माना गया.

अक्टूबर में शुरू हुए मुक़दमे का नतीजा थोड़े ही दिन बाद नवम्बर 1679 की सजा में बदला. उनका सर काट लिया गया था.

इस दौर में कई महिलाओं को पुरुष वेश धारण करने या सेना में शामिल होने की सजा चर्च के कानूनों ने सुनाई थी. डच, फ्रेंच, पुर्तगाली सबकी सेनाओं में ऐसे रिकॉर्ड हैं.

याद दिलाते चलें, कि इस दौर में भारत में रानी चेनम्मा, मुगलों के विरुद्ध लड़ रही थी. इसी दौर में रानी अबक्का पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ रही थी. इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई की पांच हज़ार महिलाओं की सैन्य टुकड़ी थी.

बाकी तथाकथित नारीवादियों के हिसाब से हिन्दुओं में नारी को पैर की जूती और पश्चिम में आजादी की अवधारणा भी समझिये. काहे कि परसेप्शन (perception) और रियलिटी (reality) का फर्क तो हैय्ये है.

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