अपने-अपने शरद पवार को पावर में लाने वोट देने में हिचकेगी नहीं जनता

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जब से भारत सरकार द्वारा इस वर्ष दिए गए पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई है, तब से हर तरफ इसकी चर्चा हो रही है. इस वर्ष के यह पुरस्कार पिछले पुरस्कारों से बहुत अलग है, यह पहली बार हुआ है कि भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों के लिए जन से उन लोगो को ढूंढ निकाला है, जो मिडिया और प्रभावशाली वर्गों की चकाचौंध से दूर अपने काम से समाज के उत्थान में लगे हुए थे.

निश्चित रूप से ऐसे कर्मठ चरित्रों को हमारे सामने लाने और उन्हें पुरस्कृत करने के लिए, प्रधानमंत्री नरेंद मोदी साधुवाद के पात्र है.

यह कितना विरोधभास है कि पद्म पुरस्कारों की सूची में जहाँ प्रधानमंत्री को अनाम भारतीयों को सम्मान देने के लिए प्रशंसा मिल रही है, वहीं इसी सूची में एक ऐसा नाम भी है, जिसको लेकर नरेंद्र मोदी जी उपहास और कटाक्ष के पात्र भी बन रहे है.

क्या मखमल की दुशाला में टाट का पैबन्द बना यह नाम, हम भारतीयों के ऊपर कटाक्ष है? मेरे ख्याल से शायद ऐसा ही है, क्योंकि मोदी जी और आज की दुनिया को मेरे देखने का दृष्टिकोण है.

मैं हमेशा की तरह अपनी बात को समझाने के लिए इतिहास में दर्ज एक कहानी सुनाता हूँ, जो मोदी, भारत के वासियों और उस टाट के पैबन्द पर बहुत कुछ कह जाता है.

यह कहानी, मेक्सिको के अर्ट्यूरो दुराज़ो की है. दुराज़ो, मेक्सिको में कस्टम विभाग में एक पुलिस अधिकारी था, जिसे 1976 में, उसके बचपन के दोस्त, जोसे लोपेज़ पोर्टिल्लो ने मेक्सिको का राष्ट्रपति बनने के बाद 1976 में मेक्सिको का पुलिस प्रमुख बना दिया था.

अपने पुलिस प्रमुख काल में दुराज़ो ने रिश्वत, तस्करी, अपहरण, और हर काले-सफेद धंधे से धन उगाही करने का एक तंत्र स्थापित किया और अपना एक काला साम्राज्य खड़ा कर लिया. पूरे मेक्सिको में दुराज़ो के विरोध में थोड़ी-बहुत सुगबुगाहट हुयी लेकिन आम जनता आँखे मूंदे, उस सबसे उदासीन थी.

लोराज़ो का साम्राज्य बिना रोक-टोक के फलता-फूलता रहा लेकिन 1982 में जब लोपेज़ पोर्टिल्लो के बाद, मिगुएल दे ला मेड्रिड मेक्सिको के राष्ट्रपति बने तब, दुराज़ो मैक्सिको छोड़ कर चला गया.

इसी बीच दुराज़ो के एक बॉडीगार्ड जोसे गोंजालेज का लिखा उपन्यास बाजार में आया जिसमे उसने अर्ट्यूरो दुराज़ो के पुलिस प्रमुख काल में उसके द्वारा किये गए कारनामों का खुलासा कर दिया.

इसके बाद से, दे ला मेड्रिड की सरकार ने, दुराज़ो को अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का पूरा केंद्र बना दिया. मेक्सिको ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर दुराज़ो की खोज चालू की और अंततोगत्वा उसे वापिस मेक्सिको लाने में वह कामयाब हुए जहाँ उस पर मुकदमा चला और बाद में 11 वर्ष की सज़ा हुयी.

जब दुराज़ो मेक्सिको से भागा तो उसकी जिन संपत्तियों का सरकार को पता चला वह उन्होंने जब्त कर ली. उसमें सबसे कुख्यात रूप से चर्चित संपत्ति, मेक्सिको सिटी के एल अजुस्को इलाके में वह मकान था, जिसमे वह खुद रहता था.

इस रोमन मूर्तियों से सजे हुए विशाल मकान में न्यूयॉर्क स्टाइल डिस्को, कुत्तों की दौड़ का रेसिंग ट्रैक, 23 कारों के लिए गैराज, एक आर्टिफीशियल झील और फायरिंग रेंज था.

क्या मेक्सिको की राजधानी में, उसके 1000 डॉलर की तनखाह पाने वाला पुलिस अधिकारी महलनुमा मकान में रह रहा था और किसी को भनक नही थी?

क्या एक पुलिस प्रमुख ने भ्रष्टाचार को सीढ़ी बना कर अपना काला साम्राज्य खड़ा किया और जनता को पता ही नहीं था?

सब को सब पता था लेकिन बस सब उदासीन थे, कुछ डर से, कुछ अपने स्वार्थ के लिए और कुछ इसलिए क्योंकि दुनिया ऐसे ही है, यह सब चलता है. दुराज़ो बनते ही इसी लिए है क्योंकि जनता ही उन्हें बनाती है.

मालूम है इस उदासीनता और जनता को उसका ही चेहरा दिखाने के लिए दे ला मेड्रिड ने क्या किया? मेड्रिड की सरकार ने, दुराज़ो के मकान को जब्त कर, ‘नेशनल करप्शन म्यूज़ियम’, घोषित कर दिया और मेक्सिको की जनता के लिए सार्वजनिक कर दिया.

मेरे लिए शरद पवार को पद्म पुरस्कार, भारतीय जनता का ‘नेशनल करप्शन म्यूज़ियम’ है. आज मिले इस पुरस्कार पर जहाँ शरद पवार का मज़ाक, अब तक उनका विरोध करने वाले उड़ा रहे है, वहीं इस पुरस्कार को देने वाली सरकार का मज़ाक, इन लोगो के साथ, वो भी उड़ा रहे है जिन्होंने शरद पवार जैसे राजनीतिज्ञ को पिछले 50 वर्षों से फलने-फूलने दिया और उनके स्थापित तंत्रों में फले फूले हैं.

यही हम भारतीयों का दोहरा चरित्र है. जल्द फिर चुनाव होने वाले है और यही मोदी की सरकार का मज़ाक उड़ाने वाली जनता, अपने-अपने शरद पवार को पावर में लाने के लिए वोट देने में हिचकेगी नहीं.

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