जिसे कहा नेशनल करप्ट पार्टी, उसी के नेता को दे दिया पद्म विभूषण!

0
132

पद्म सम्मानों के बारे में जब आप कहीं पढ़ेंगे तो निश्चित ही आपको कुछ बहुत लंबा, बहुत गरिष्ठ, बहुत गौरवान्वित करने वाले तथ्य मिलेंगे. इन पुरस्कारों का इतिहास भी काफी लंबा और शानदार रहा है.

ऐसे लोगों की तादाद लंबी है जो इन सम्मानों के हकदार थे और उनके सम्मानित होने के बहाने प्रतिभा भी सम्मानित होती आई है.

वो लोग भी हैं जिन्होंने इन सम्मानों को पाकर इन सम्मानों की ही गरिमा को बढ़ाया है. उनका कद ही इतना बड़ा था कि उनके नाम से जुड़कर सम्मान का नाम बड़ा हो गया. हालाँकि ऐसा अन्य पुरस्कारों के साथ भी होता है कि कई बार पाने वाले के साथ जुड़कर सम्मान का नाम भी बड़ा हो जाता है.

लेकिन अफ़सोस, ये सम्मान भी राजनीति से अछूते नहीं रहे हैं. हर दौर में ऐसे कारण मिलते रहे हैं कि आम इंसान सोचने पर विवश हो जाए कि ये सम्मान वाकई उस ‘सम्मान’ के हक़दार हैं, जितना हम इन्हें देते हैं.

किसी दौर में नियमों को धता बता किसी व्यक्ति को भारत रत्न बस इसलिए दे दिया जाता है कि उसका नाम चुनावों में वोट दिलवा देगा.

दूरदृष्टि के अभाव का ये आलम होता है कि एक लोकप्रिय खेल के एक लोकप्रिय से खिलाडी को, जिसे खेलप्रेमी थोड़ा सर क्या चढ़ा लेते हैं, देश की सरकार उसमें अपना फायदा देखते हुए उन्हें बस राज्यसभा ही नहीं भेजती है, बल्कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न भी दे देती है.

काश कि ‘सरकार’ समझ पातें कि जो जनता है वो ‘खेलप्रेमी’ नहीं हैं. रन से वोट नहीं मिलती सरकार!

दौर बदलता है. निज़ाम बदलती है. सरकार दूसरी हो जाती है. जाहिर है तरीके भी बदल जाते हैं.

देश के प्रधानमंत्री एक राजनीतिक दल को ‘नेशनल करप्ट पार्टी’ कहते हैं. संयोग से उन्हीं की सरकार उसी पार्टी के नेता को पब्लिक सर्विस के लिए देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दे देती है.

सरकार! जिस बदलाव की बात करके आप आए थे, क्या ये वही है? फिर क्या फर्क रहा आप में और उनमें? आप तब सही थे या अब?

या तो वो नेशनल करप्ट पार्टी के नेता हो सकते या देश को विशिष्ट सेवा देने वाले व्यक्ति, या फिर दोनों को जोड़कर देखें तो ये किसी और विशिष्ठ सेवा को तो नहीं दर्शाती न?

राजनीति में दो सच हो सकते, हकीकत में नहीं होता. बता दीजिए, आप तब सही थे या आज?

कहीं वोट की मजबूरियां होती हैं, कहीं सरकार चलाने की तो कहीं राष्ट्रपति चुनाव जैसे चुनावों की.

तो सरकार! जब आप जनता को दूरदर्शी होकर तत्कालीन हितों को त्यागकर लंबे समय के भले का सोचने को कहते हैं, देश हित की बात करते हैं. और जब खुद पर आता है तो क्यों आपको तत्कालीन हित ही बड़ा लगने लगता है.

ऐसे में जान लीजिए, देश की जनता मोहताज नहीं आपके इन सम्मानों की. वो सब जानती है, सब समझती है. हाँ, सब जानकर-समझकर भी मजबूर है.

गणतंत्र दिवस के दिन इतना नकारत्मक लिखने की उम्मीद आपने नहीं की होगी. लेकिन सच अगर नकारात्मक लगता है तो उससे भाग तो सकते नहीं. हाँ, गणतंत्र दिवस के बहाने हम अपने भीतर झाँक जरूर सकते हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY