दक्षिण पूर्व एशिया को सांस्कृतिक रूप से केवल एक धरोहर बाँधती है ‘हिंदुत्व’

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विश्वास कीजिए गणतंत्र दिवस परेड में बलोचिस्तान की झाँकी दिखाई जा सकती है. मैं बताता हूँ कैसे.

आपने दक्षिण एशिया में सार्क आसियान जैसे संगठन बनाये हैं न! ये सब किस दिन काम आयेंगे? 90 मिनट की परेड में क्या एक झाँकी सार्क देशों की नहीं निकल सकती?

जब कभी ढाका को दिखाइये तो उसमें ढाकेश्वरी माँ का मन्दिर दिखा दीजिये. नेपाल की झाँकी में बाबा पशुपतिनाथ को बइठा दीजिये.

पाकिस्तान को हम अपना पानी दे सकते हैं तो क्या हिंगलाज भवानी का मन्दिर पाकिस्तान की झाँकी में नहीं दिखा सकते?

जब गूगल डूडल बना सकता है, बुर्ज खलीफा तिरंगे में रंग सकता है तो सार्क देशों में से निकटतम पड़ोसी की एक झाँकी क्यों नहीं निकल सकती?

कोई आपत्ति करे तो कह दीजिये कि भाई हम तो पड़ोसियों से अच्छे सम्बंध चाहते हैं इसलिए सोचा कि हमारे गणतंत्र के साथ उनके यहाँ भी सुख शांति आये.

श्रीलंका और चीन दिखाना हो तो हनुमान जी और बुद्ध पहले से आपके पास हइये हैं.

फॉरेन पॉलिसी निर्धारित करने वालों को यह समझना पड़ेगा कि दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया को सांस्कृतिक रूप से केवल एक धरोहर बाँधती है और वह है-‘हिंदुत्व’.

हिंदुओं का सबसे बड़ा मन्दिर अंकोर वाट भारत की धरती पर नहीं बल्कि कम्बोडिया में है. तो आप ये कैसे मान लेते हैं कि हिंदुत्व केवल India that is Bharat का एजेंडा है?

इस्लाम और ईसाईयत ने अपने मत-मजहब को वैश्विक विस्तार दिया है. हम हिंदुत्व को ग्लोबल बनाने का कार्य कम से कम पड़ोसी देशों से तो प्रारंभ कर ही सकते हैं.

नेहरुविअन लेगेसी का कोढ़ यही है कि आपको ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ नहीं पढ़ाई जाती जिसमें यह निहित है कि हम पड़ोसी देशों से इस प्रकार के सम्बंध रखें जिससे हमारी आंतरिक सुरक्षा प्रभावित न हो.

उल्टा जवाहरलाल ने 1961 में ‘राष्ट्रीय एकता’ का पाठ पढ़ाने के लिए National Integration Council बना डाली. यह अजीब मजाक था.

सांस्कृतिक रूप से तो हम एक थे ही. आवश्यकता थी उन तत्वों से राष्ट्र की सुरक्षा करना जो विभाजन के कारक बने.

जातिगत विभाजन की खाई अंग्रेजों ने बढ़ाई और मज़हबी उन्माद से तो आज समूचा विश्व त्रस्त है.

हमें ‘राष्ट्रीय हित’, ‘राष्ट्रीय शक्ति’, और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के सिद्धांत न बता कर छद्म सेक्युलरई की घुट्टी जबरी पिलाई गयी.

राष्ट्रीय पर्व मनाने के तौर तरीके अब थोड़े बहुत बदलने भी चाहिये. नेहरुविअन विरासत के जर्जर ढांचों का टूटना ही देशहित में है. इसीलिए मैंने बाल दिवस 15 अक्टूबर को महर्षि कलाम के जन्मदिवस पर मनाने का आग्रह किया था.

एक बात और जोड़ना चाहता हूँ. जब तक राजपथ पर प्रदर्शित रक्षा प्रणाली का प्रत्येक अस्त्र और उपकरण स्वदेशी नहीं होगा तब तक सही अर्थों में गणतंत्र दिवस नहीं मनाया जा सकेगा.

भारत सरकार को चाहिये कि डीआरडीओ और इसरो के वैज्ञानिकों को स्पष्ट निर्देश और संसाधन उपलब्ध कराये जाएँ ताकि वे गणतंत्र दिवस स्कूल के बच्चों के साथ मनाएं.

डीआरडीओ में हज़ारों वैज्ञानिक काम करते हैं. यदि एक वैज्ञानिक एक स्कूल में जाकर इंटरमीडिएट के बच्चों को रक्षा प्रणाली के वैज्ञानिक सिद्धांत समझाये बताये तो सोचिये कितने सारे बच्चे प्रेरित होंगे.

उदाहरण के लिए साल भर पहले इसरो ने सियाचेन में तैनात भारतीय सेना के जवानों के लिए सिलिका एरोजेल नामक बहुत ही हल्के पदार्थ से बर्फ में रहने लायक फैब्रिक का निर्माण किया था. इस फैब्रिक से ऐसी वर्दी बनाई जा सकती है जिससे सैनिक के शरीर की ऊष्मा बाहर नहीं निकलेगी.

सिलिका एरोजेल ऊष्मा का ऐसा कुचालक है कि यदि इसे आग और फ़ूल के मध्य रख दिया जाये तो फूल नहीं जलेगा. यह समाचार मुझे अखबार से मिला था. वैसे तो ये काम डीआरडीओ का है लेकिन इसरो के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर ने बनाया था.

प्रश्न ये है कि ऐसी खबरें यदा कदा समाचार पत्र या मैगज़ीन से ही प्राप्त होती हैं जो बच्चे नहीं पढ़ते. यदि डीआरडीओ और इसरो के वैज्ञानिक गणतंत्र दिवस पर स्कूलों में जाएँ और कम से कम एक घण्टे का लेक्चर दें तो एक दिन में कितने सारे छात्र लाभान्वित होंगे.

ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक स्कूल में नहीं जाते. इलाहाबाद स्थित National Academy of Sciences (India) के वैज्ञानिक अकादमी के खर्च पर मात्र स्कूलों द्वारा एक औपचारिक अनुरोध पर लेक्चर देने जाते हैं.

स्कूल को मात्र इतना करना होता है कि एक रिक्वेस्ट लेटर अकादेमी को भेजना होता है. कोई माँ के पेट से ब्रह्मोस मिसाइल की तकनीक पढ़ के पैदा नहीं होता. आज के बच्चे ही कल के वैज्ञानिक बनेंगे न!

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