ब्रिटेन में हो तो हो, हमारे यहाँ तो खतरे में आ जाएगा सेकुलरिज़्म

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ग्रेवयार्ड शिफ्ट… रोज़मर्रा की भाषा में इस शब्द का प्रयोग फैक्ट्रियों, जहाज़ों के वॉच टावर्स आदि के कर्मचारियों की शिफ्ट या पाली बदलने के लिये किया जाता है.

वैसे कहा जाता है कि इस शब्द का मूल उन्नीसवीं सदी के शुरुआती यूरोप में है, जहां गलती से ज़िंदा दफना दिये गये लोगों को बचाने के लिये कॉफिन (ताबूत) को एक घँटी या झंडे से जोड़ दिया जाता था.

कॉफिन में कोई हरकत होने पर ये घँटी बज जाती थी, जिसकी देखरेख के लिये एक शख़्स की ड्यूटी लगाई जाती थी और इनकी पाली बदलने से ग्रेवयार्ड शिफ्ट शब्द प्रचलन में आया.

अब सवाल उठता है कि आखिर किसी को ये पता कैसे चला होगा कि उन्होंने ज़िंदा इंसान को दफना दिया है!

उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय शहर फैक्ट्री मजदूरों से भरे हुये थे. लोगों को दफनाने के लिये जगह की कमी होती जा रही थी. चर्च के ग्रेवयार्ड (कब्रिस्तान) भर चुके थे.

इस समय से लोगों ने कब्रों को रिसायकिल करना शुरू कर दिया था. एक कब्र के पुराने अवशेष निकाल कर उसकी जगह पर परिवार के अन्य सदस्यों को दफनाया जाने लगा.

इसी रिसाइकिलिंग के दौरान लोगों ने पुराने अवशेषों पर खरोचों आदि के निशान देखे और पता चला कि गलती से कई बार वो ज़िंदा बीमार लोगों को दफना दे रहे हैं.

2013 में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार सन दो हज़ार पच्चीस तक ब्रिटेन के आधे ग्रेवयार्ड आउट ऑफ स्पेस हो जायेंगे.

2015 में BBC News इस समस्या पर आर्टिकल लिख चुका है – The world is running out of burial space – By John McManus

हाँ ऐसी कोई स्टडी अगर हमारे यहां हो तो निश्चित ही सेकुलरिज़्म खतरे में आ सकता है.

इन समस्याओं से निपटने के लिये लोगों ने बहुत से तरीके इस्तेमाल करना शुरू कर दिये हैं जिसमे रेज़ोनेशन (Resonation), ग्रीन क्रेमिनेशन आदि हैं.

पर इन सब में प्रमुख है, क्रेमिनेशन या शव दाह. यूरोप के बाद अब यह प्रचलन अमरीका के बड़ी जनसंख्या वाले शहरों में भी प्रचलित हो रहा हैl

अमेरिका में इस सदी की शुरुआत तक सिर्फ 4 प्रतिशत लोगों का शव दाह होता था जो अब लगभग पैंतालिस प्रतिशत के करीब है.

शव दाह का प्रचलन इतना बढ़ गया कि ना चाहते हुएभी सन 1963 में कैथोलिक चर्च ने इससे प्रतिबंध हटा लिया.

जनसंख्या घनत्व के हिसाब से मुंबई, दिल्ली, बंगलौर जैसे भारतीय शहर, कई मुख्य अमेरिकी और यूरोपीय देशों को पीछे छोड़ देते हैं.

पारंपरिक शव दाह को पर्यावरण के लिए खतरनाक बताने वाले केजरीवाल के क़ाबिल मंत्री इमरान हुसैन इस समस्या पर कब बोलेंगे?

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