Audio : ज़र, जोरू, ज़मीन और अमेठी की लड़ाई

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ज़र, जोरू और ज़मीन, कहते है लड़ाइयों की यही तीन वजहें होती हैं.

मुगलिया दरबार के कुख्यात शहजादे सलीम का नाम शायद आपने ‘मुगल-ए-आज़म’ फिल्म में सुना होगा. अकबर ने उसे मुगलिया सल्तनत को किसी रक्कासा के पांव की पाज़ेब नहीं बनाने दिया था.

लेकिन सलीम अनारकली से भी ज्यादा चटखारे लेकर लिखा-पढ़ा जाने वाला किस्सा सलीम और मेहरुन्निसा का था. इस कहानी में अली कुली खान थे. वो फारस के इलाकों के थे और उन्हें 1605-07 के दौरान बंगाल में बर्धवान का काम काज सौंपा गया था.

मेहरुन्निसा इसी अली कुली खान, यानि शेर अफगन की बीवी थी. अकबर के ख़ास, अब्दुल रहीम खानेखाना की सिफ़ारिश पर शेर अफगन को मुग़ल दरबार में काम दिया गया था.

बाद में जब सलीम ने अकबर के खिलाफ विद्रोह किया था तो उसने अब्दुल रहीम खानेखाना को सबसे पहले मरवा डाला था.

तो जनाब इस खानेखाना के चेले शेर अफगन की बीवी, मेहरुन्निसा पर जब मुग़ल शहंशाह जहाँगीर की निगाह पड़ गई हो तो शेर अफगन कब तक बचते?

राज-काज संभालते ही सलीम ने बंगाल का सूबेदार क़ुतुबुद्दीन कोका को बनाया. अब शेर अफगन पर अफ़गानी विद्रोहियों की तरफदारी का इल्जाम लगाया गया.

वो बर्धवान में थे तो उन्हें गिरफ्तार करने की योजना के साथ कुतुबुद्दीन बर्धवान के लिए रवाना हुए.

अपने दो साथियों के साथ कुतुबुद्दीन से मिलने आये शेर अफ़गन को गिरफ्तार करने की जैसे ही कोशिश हुई वो लड़ पड़े! अपने केवल दो साथियों के साथ लड़े शेर अफ़गन वहीँ मार गिराए गए.

हालाँकि उन्होंने कुतुबुद्दीन को भी मरणासन्न कर डाला था, और कुछ ही दिन बाद चोटों की वजह से वो भी मर गया. उनकी मौत होते ही मेहरुन्निसा, सलीम के हरम में भेज दी गई.

चार साल वो रुकैय्या बेगम की बांदी रही और 25 मई, 1611 को सलीम की बीसवीं बेगम ‘नूर महल’ बनी. थोड़े दिन बाद उन्हें ‘नूर जहाँ’ का ख़िताब भी बख्शा गया.

मेहरुन्निसा की जो एक बेटी थी, लाड़ली बेगम, उसकी शादी 1620 में जहाँगीर (सलीम) के बेटे शहजादा शहरयार से हुई थी. यानि जहाँगीर ने अम्मा से और उसके बेटे शहरयार ने बिटिया से निकाह कर लिया.

थोड़े ही साल बाद जब जहाँगीर की मौत पर मुग़ल बादशाहत की जंग फिर से छिड़ी, तो शहरयार को हरा कर पहले अँधा करवा दिया गया था. बाद में असफ खान ने शाहजहाँ के हुक्म पर शहरयार को क़त्ल कर दिया था.

ऐसा नहीं है कि ये जर, जोरू, जमीन की जंग खाली मुगलिया दौर में होती हो. आज के उतपत देस का अमेठी वाला इलाका देखिये तो ये फिर से दिख जाएगा.

सन 1977 से आप इसे नेहरु-गाँधी राजवंश के लिए जानते हैं लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां के भूतपूर्व राजा रणंजय सिंह ने ये इलाका संजय गांधी को चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावित किया था.

बाद में रणंजय सिंह के सुपुत्र संजय सिंह यहाँ के राजपरिवार के वारिस हुए. उनकी शादी राजा मांडा अर्थात वीपी सिंह की एक रिश्तेदार गरिमा सिंह से हुई थी.

उसी 1980 के दौर में एक मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी थे सैय्यद मोदी. बैडमिंटन खिलाड़ी सैय्यद मोदी राष्ट्रीय बैडमिंटन चैम्पियन थे और लखनऊ में रहते थे. उनकी बीवी अमिता भी खिलाड़ी थी.

कहते हैं सैय्यद मोदी सरल स्वभाव के थे और अमिता महत्वाकांक्षी थी. उनका परिचय भूपति राजमहल के वारिस संजय सिंह से भी था. कथित रूप से गरिमा और संजय को वो भैया भाभी बुलाया करती थी.

एक रोज़ 1988 में सैय्यद मोदी जब अपनी रोज़ की प्रैक्टिस के बाद लखनऊ स्पोर्ट्स क्लब से लौट रहे थे तभी उन्हें गोलियों से भून दिया गया.

गरिमा को वापिस भेज दिया गया और संजय सिंह ने अमिता से शादी कर ली. नब्बे से अब तक के तीन दशकों में इस हत्या की गुत्थी सुलझी नहीं है.

काफी सालों तक गरिमा और उनके बच्चों ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी है. उधर अमिता भी संजय सिंह पर अपने हक़ के लिए लड़ती रही. मुक़दमे तो बरसों चलते ही हैं, सो तीन दशक वो भी चलता रहा.

इस बीच संजय सिंह के रिश्ते कांग्रेसी राजपरिवार से भी बनते बिगड़ते रहे. जब बिगड़े तो बाहर और जब अच्छे रहे तो वो राज्य सभा सांसद भी रहे.

इस बार अमेठी का मुकाबला संजय सिंह की दोनों पत्नियों के बीच भी है. वी.पी.सिंह से रिश्ते की वजह से शायद समाजवादी गरिमा सिंह का समर्थन करेंगे. भाजपा की उम्मीदवार तो वो हैं ही.

उधर दूसरी पत्नी और पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी की भूतपूर्व पत्नी अमिता कांग्रेस के टिकट पर हैं.

राजवंशों में विरासत की लड़ाई अब भी होती है, बाकी संसदीय लोकतंत्र में जो वंशवाद है, सो तो हइये है.

आनंद कुमार की आवाज़ में यह लेख सुनें

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