राजनैतिक विक्षिप्तता की मिसाल है शरद यादव का ‘बेटी की इज्ज़त’ वाला बयान

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चुनावी माहौल का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जब तक टिकट वितरण पर जिंदाबाद मुर्दाबाद बन्द नहीं हो जाते है तब तक कुछ सार्थक लिखने की कोशिश करना भैंस के आगे बीन बजाना ही होता है.

ऐसे वक्त में दूसरों के ‘कु’वचन कान में पिघले हुए गर्म मोम जैसे लगते है.

“बेटी की इज्ज़त से ज्यादा वोट की इज्ज़त बड़ी है.”

“बेटी की इज्ज़त जायगी तो गाँव और मोहल्ले की इज्ज़त जायगी, वोट एक बार बिक गया तो देश की इज्ज़त और आने वाला सपना पूरा नहीं हो सकता है.”

यह अमृत वचन माननीय शरद यादव जी के है.

अब यह बात एक महान समाजवादी जातिवादी सेकुलर ने कही है तो उसका विरोध करना प्रगतिशीलता और लोकतंत्र का अपमान करना होगा इसलिए चुनाव पर जाने वाली जनता से यह अपील है कि शरद यादव जी की समर्थित पार्टियों को ही आप चुने और यादव जी के सपनो को साकार करे.

वैसे भी माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने समाजवाद में ‘लड़कों से गलती हो ही जाती है’ को स्वीकार ही करा लिया है.

शरद यादव की कितनी लड़कियां है यह तो मुझे नहीं मालूम है लेकिन ‘वोट नहीं बेचना चाहिए’ जैसी महत्वपूर्ण बात कहने में बेटियों की इज्ज़त उतराई को जो उन्होंने इज्ज़त दी है, वह यह स्पष्ट करता है कि आज इन नेताओं की राजनैतिक विक्षिप्तता उस पतन को पहुंच गयी है, जहाँ मोदी विरोध के नाम पर घर की बहन-बेटियों की इज्ज़त को दांव पर लगाना इन सेक्युलरों की जरूरत हो गयी है.

यह बिलकुल सही है कि जनता को वोट नहीं बेचना चाहिए, लेकिन अपनी जातियों और मुसलमानों से जाति के नाम पर और हिन्दू धर्म से डरा कर, कौन जनता से अपने वोट बेचने को कहता और खरीदता रहा है?

यह काम तो शरद यादव और इनकी सेक्युलर बिरादरी शुरू से ही करती आ रही है! यह इतनी हल्की बात, इतने महत्वपूर्ण सन्दर्भ क्यों कर रहे है, इसका आभास मुझे है, शायद मैं इन सेक्युलरों की मनोस्थिति समझ रहा हूँ.

आज शरद यादव जैसे नेताओं के अस्तित्व का प्रश्न है. आज वह, वो पल जी रहे हैं, जो पल उनके सपनों को जीवित बनाये रखने के आखिरी पल हैं.

आज अस्तित्वहीन और अप्रासंगिक होने के भय में जी रहे शरद यादव जैसे नेताओं के उदगार शायद उनकी वही जरूरत है जो उन राजाओं की थी, जिन्होंने अपने सपनों को साकार करने और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बहन-बेटियां मुगलो को दी थीं और जिसे कभी-कभार शादी का नाम दिया गया था.

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