गिरे एक तो सौ खड़े हों, बस आहुति की परिपाटी हो

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नेताजी का स्केच 11 वर्षीय मानसी पुरोहित के सौजन्य से

मन व्याकुल था राष्ट्रनायक, एकमात्र ‘नेताजी’ सुभाष चंद्र बोस पर कुछ लिखने को. अवकाश नहीं मिला लेकिन निश्चय दृढ़ था कि लिखूंगा तो कुछ खास ही.

फेसबुक ने मेमोरी रिकॉल करवाई तो गत वर्ष लिखी मेरी कविता ही फिर से लिखने का निर्णय हुआ.

कैसी है? यह नहीं पूछूँगा क्योंकि मै स्वयं इस सत्य को जानता हूँ कि शब्दों का कोई भी उत्तम समूह इस महापुरुष की दिव्यता का वर्णन करने में सक्षम नहीं हो सकता.

आपका पुण्य और और पुरुषार्थ सदियों तक प्रत्येक भारतीय के रक्त में, पैतृक गुणों के रूप में उपस्थित रहेगा. आप भारत के ह्रदय में सक्षम शक्ति के प्रतीक रूप में सदा अमर रहेगे.

प्रस्तुत है –

गुलाम तन है गुलाम मन है
पराधीन जन गण मन है,
वीरभूमि के बेटों का कातर क्रंदन नहीं सुनूँगा नहीं सुनूँगा,
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा।
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा।।

वहन करो और मनन करो
हर जुल्म एक सीमा तक सहन करो,
शांतिदूत श्वेत खगों की
उन्मुक्त उडान का जतन करो,
पर माता के आँचल पर कुदृष्टि नहीं पड़ने दूंगा,
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा।।
तुम मुझे …….

मुट्ठियां भींच लो सांस खीच लो
नस नस में उन्माद सींच लो
मातृभूमि को मुक्त कराने
कलम त्याग के खड्ग खींच लो,
प्रण है अब तो पूर्ण स्वराज तक कदम नहीं रुकने दूंगा,
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा।।
तुम मुझे ………

बहें लहू की नदियां चाहे
फिर से एक हल्दी घाटी हो,
गिरे एक तो सौ खड़े हों
बस आहुति की परिपाटी हो,
लाल किले पे लहराये तिरंगा स्वप्न यही अपलक रखूँगा,
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा।।
तुम मुझे ………

।।जय हिन्द।।

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