कम्युनिज़्म रशियन या चाइनीज़ नहीं, विशुद्ध ब्रिटिश ‘फूटनीति’ का पैकेज

sufism and communism-making-india

मैंने कल पूछा था कि हमारा ज़्यादा नुकसान सूफियों ने किया है या वामपंथियों ने?

किसी ने कहा सूफियों ने, किसी ने कहा वामियों ने. लेकिन इसके साथ-साथ ही, यह कहने वाले भी थे कि हमारा नुकसान हम खुद ने ही किया है.

पता था यह उत्तर भी आयेगा, आप लोगों के लिए ही वह प्रश्न था. यह उत्तर देने के पीछे आप के कुछ तर्क हैं, यह बात भी समझ में आती है.

अब जरा यह परिच्छेद पढ़िये. मान्यता है कि 1953 से 1964 तक सोवियत रशिया के प्रेसिडेंट रह चुके निकिता ख्रुश्चेव के यह उद्गार हैं. ख्रुश्चेव ने ये शब्द कहे थे या नहीं, यह मुझे नहीं पता, लेकिन जो बात कही गई है उसमें दम जरूर है. क्या कहा है?

Your children’s children will live under COMMUNISM. You AMERICANS are so gullible. No, you won’t accept COMMUNISM outright, but we’ll keep feeding you small doses of SOCIALISM until you will finally wake up & find that you already have COMMUNISM. We won’t ever have to fight you, we’ll weaken your economy until you fall like overripe fruit into our hands.

तुम्हारे बच्चों के बच्चे कम्युनिज़्म की सत्ता में जिएंगे. तुम अमेरिकन बहुत आसानी से धोखा खा जाते हो. नहीं, तुम कोई सीधा-सीधा कम्युनिज़्म स्वीकार तो नहीं करनेवाले लेकिन हम तुम्हें समाजवाद के छोटे-छोटे डोज़ खिलाते रहेंगे ताकि एक दिन नींद से जागोगे तो पाओगे कि अरे, कम्युनिज़्म तो छा ही गया है. हमें तुमसे कभी भी लड़ने की जरूरत नहीं होगी, हम तुम्हारी अर्थव्यवस्था इस कदर खोखली कर देंगे कि पके हुए फल की तरह तुम हमारे हाथों में गिर जाओगे.

इस quote के कुछ अलग variations भी मिलते हैं लेकिन कुल मिला कर मतलब एक ही है, धीरे-धीरे ऐसे ज़हर घोल देंगे कि पता भी नहीं चलेगा कि वाम कब आप पर काबिज़ हो गया.

हिन्दू ही अपनी इस दशा के लिए जिम्मेदार हैं, यह सोच भी कुछ यूं ही है. यह जो सामंतवाद, कुलीनवाद वगैरह जो भी शब्द हैं वे सीधा ‘ism” का अनुवाद है. मनुवाद, ब्राहमणवाद भी इसी देशविरोधी विचारधारा की फ़ैक्टरी की पैदाइश हैं, अपने ग्रन्थों में कहीं मिलते नहीं.

और हाँ, अगर आप कम्युनिज़्म को रशियन या चाइनीज़ मानते हैं तो गलत हैं, यह ब्रिटिश राजनीति है. बस बात कुछ यूं हुई कि बोये बीज पर बोनेवाले का कंट्रोल नहीं रहता. इसलिए कम्युनिज़्म को जब रशिया और चाइना ने अपने-अपने स्वार्थ और विदेश नीति के लिए अपना लिया तब अंग्रेज़ और अमेरिकनों ने उसे बदनाम करना शुरू किया. वरना यह विशुद्ध फूटनीति का पैकेज है.

अगर हम इसे एक विशुद्ध भारतीय नाम देना चाहे तो मंथरावाद कह सकते हैं. नारीवादी लोग चाहें तो शकुनिवाद भी कह सकते हैं.

फ़तवा ए आलमगिरी पढ़ें तो हमारी इस जाति व्यवस्था का मूल समझ में आयेगा और औरंगज़ेब वाकई में कितना शैतानी या इस्लामी दिमाग का था, यह समझा जा सकता है.

अंग्रेज़ क्या थे, यह भी स्पष्ट हुआ ही है. कांग्रेस भी उनका निर्माण किया हुआ एक सेफ़्टी वाल्व थी, ताकि लोग अपने असंतोष की भाप निकाल सकें.

वे दुबारा 1857 नहीं चाहते थे. कितनों को उन्होने criminal tribe घोषित किया और बदहाल जीवन जीने पर मजबूर किया, यह खोज का विषय है.

मुसलमान तथा अन्य आक्रांताओं के खिलाफ भी हिन्दू एक हो कर लड़े ही हैं. कृपया वो झूठ न फैलाएँ कि बाबर ने जब सुना कि इनके खाने की व्यवस्था अलग अलग है वो खुश हुआ.

यही कहानी मैंने अकबर और अलाउद्दीन खिलजी के नाम से भी सुनी है. बस झूठ का पुलिंदा है, बाकी कुछ नहीं. वामी या इस्लामी है, क्या फर्क पड़ता है. झूठ, झूठ ही होता है.

खैर, लंबे समय से खिलाया गया ज़हर जल्द नहीं उतरता. व्यक्तिगत तौर पर इस से बचें तो भी काफी कुछ हो सकता है, अन्यों पर अन्याय न करें.

युद्ध का ही समय है, अपने पड़ोसियों को डॉ नारंग न होने दें तो देश को विकासपुरी होने से बचाया जा सकता है.

अपने गरीबों का ध्यान रखें, उनका ख्याल रखें, यथा शक्ति, यथा इच्छा तो काफी कुछ होता है, यह अनुभूत है. जातियाँ अलग होने से और अलग रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

वैसे बात नुकसान की कहें तो नुकसान हमेशा कम्यूनिकेशन की गति और दायरे पर आधारित होता है.

कम्युनिस्टों को अधिक संसाधन मिले तो उन्होने अधिक नुकसान किया. सूफियों को मिलते तो वे भी कम नहीं थे.

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