जाना था गंगा पार, प्रभु केवट की नाव चढ़े

रामानंद सागर भले घोषित संत ना रहे हों, पर मैं उन्हें वाल्मीकि जी या तुलसी दास जी से कहीं कम नहीं मानता!

उन्होंने रामायण धारावाहिक के रूप में श्रीराम को जिस प्रकार से जीवंत किया है यदि वाल्मीकि जी या तुलसीदास जी स्वयं आज जीवित होते तो उनके इस धारावाहिक को अपने लिखे ग्रन्थों से कहीं कमतर ना मानते.

मैं जानता हूँ, मैं बड़ी बात कर रहा हूँ पर जब जब मैं रामानंद सागर जी की रामायण देखता हूँ… कहीं खो सा जाता हूँ, भावुक हो बैठता हूँ.

आज सवेरे धारावाहिक देखते-देखते रो दिया… मेरा पसंदीदा एपिसोड राम-भरत मिलाप देखकर….

मेरे और मेरे मित्र के पास रामायण की पूरी सीरीज़ है. सो आज सवेरे मित्र से रामायण का वही एपिसोड लगवाया जब भरत जी, श्री राम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए खोजते खोजते चित्रकूट पहुँच जाते हैं….

श्रीराम के सहपाठी और बालसखा निषादराज जी को जैसे ही भनक लगती है कि भरत पूरे लश्कर के साथ आ रहे हैं… उन्हें भरत पर संदेह होता है कि कहीं ये श्रीराम के प्रति द्वेष तो नहीं रखते?

सो निषादराज (आज उन्हें दलित कहा जाता) श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम के कारण भरत के प्रति संदेह की दृष्टि से परखने हेतु चले जाते हैं.

पर जैसे ही आर्य सुमंत्र (अयोध्या के सेनापति) भरत से कहते हैं कि श्रीराम, निषादराज को अपना मित्र व सखा मानते हैं, इतना सुनते ही भरत निषादराज के चरणों में गिर जाते हैं और कहते हैं कि वे श्रीराम के मित्र हैं इसीलिए वे उनके लिए बड़े भैया राम के समतुल्य ही हैं…

निषादराज भरत का श्रीराम के प्रति ये प्रेम देख भावुक हो जाते हैं और भरत जी के प्रति संदेह करने हेतु क्षमा मांगते हैं…

उसके बाद धर्म और प्रेम में श्रेष्ठता को लेकर दोनों भाईयों के बीच जो वाद-विवाद होता है वो अद्वितीय है.

जहाँ सारा ज्ञान चाहे वेद हों पुराण, राजनीति, नैतिकता से लेकर परिस्थिति जन्य ही क्यों ना हो… आप को सोचने पर विवश कर देता है.

विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति भी निःस्वार्थ प्रेम और धर्म जो शास्त्र सम्मत भी है, उसमें क्या सही क्या गलत, इसका अंतर कर ही नहीं पाता…

ज्ञान के रूप में हमारे पास महाभारत और रामायण सरीखे ग्रंथों के समान ही उत्कृष्ट धारावाहिक भी हैं, इनकी उपेक्षा ना ही करें तो बेहतर होगा…

आज दलित-सवर्ण की जो बहस चल रही है, उसका निराकरण भी इन ग्रंथों में है…

निषादराज एक भील जाति से थे. आज आप उन्हें राजनेताओं की भाषा में दलित कह सकते हैं, अयोध्या के राजा भरत उनके चरणों में गिरे थे क्योंकि वे राम के मित्र थे…

ये ग्रंथों में लिखा और प्रमाणित भी है, जो बतलाता है कि उस समय हमारे समाज में कोई भेदभाव, कोई छुआछूत था ही नहीं जिसे लेकर तरह तरह के प्रपंच और झूठ इन वामपंथियों ने गढ़े.

इन दिनों सवर्ण-दलित को लेकर तमाम झूठ फैला रखे हैं, अपने ज़हरीले लेखों और तथ्यों को तोड़ मरोड़कर हमारे शूद्र भाइयों के मन में एक ग़लतफ़हमी भर दी है ताकि समाज को बांटकर एक बार पुनः राष्ट्र के टुकड़े किये जा सकें…

आम भारतीय जनमानस को चाहिए कि वो इन वामपंथियों के छद्म इतिहास को ना पढ़कर असल भारत को जानें, प्राचीन ग्रंथों और शास्त्रों को पढ़ें ताकि वे सही और गलत में भेद कर सकें….. भारत को टूटने से बचा सकें.

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