पाईड पाइपर ऑफ़ हैमलिन और चुनाव

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लोक कथाएं हर समाज का हिस्सा होतीं हैं, और पाईड पाइपर ऑफ़ हैमलिन (pied piper of hamelin) तो सबसे मशहूर किस्सों में से है. किस्सा इसमें लम्बा सा है. Rhodents का, इसका मतलब कुतरने वाले जीव होता है.

तो भैया, एक शहर था हैमलिन नाम का, जैसे बाकी शहर होते हैं वैसे ही वो भी था, और वहां भी चुनाव से मेयर चुना गया था. अब शहर में इतने चूहे हों तो मेयर साहब की सबसे बड़ी समस्या थी इनसे निपटना.

तो भैया, पहले तो सल्फास जैसी गोलियां इस्तेमाल की गई, फिर चूहे दानी, लेकिन बरसों से रहते-रहते चूहे बिलकुल ढीठ हो गए थे. मोटे तगड़े, बिल्लियों जितने बड़े, तो जहर का असर नहीं, चूहेदानी भी टूट गई.

आखिर जब बिल्ली की बारी आई तो चूहे ही तगड़े थे, बिल्लियों को मार भगाया उन्होंने!! ‘यलगार हो’ के नारों के साथ चूहों की फौज़ बिल्लियों पर टूटी और कहीं फ़र उड़े, कहीं बिल्लियों की मूछें !!

बरसों से सहेजी हुई, पूर्वजों की इज्ज़त ख़ाक में मिल गई. कई इलाकों से आई बिल्लियाँ तो चूहों का ‘अय्या हो…’ सुनते ही भाग गई, छः फुटों की कमर से जीन्स सरक गई. सब भाग खड़े हुए, जो खड़े रहे वो शहीद हुए.

बिल्लियों की फौज़ के जाते ही सामान्य जनता सकते में आ गई!! अब क्या हो, कैसे हो? तो इतने में एक दाढ़ी वाला मौका-ए-वारदात पर आया. इस सफ़ेद दाढ़ी वाले के साथ इसका काली दाढ़ी वाला मुस्कुराता सा चेला भी था.

उसने कहा, “भाई तुम मुझे वोट दो… मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा…“

जनता के पास और कोई रास्ता बचा ही नहीं था. उन्होंने पुराने लल्लू एंड खानदान के बदले दाढ़ी वाले को खड़ा कर दिया.

फिर क्या था… आगे आगे बांसुरी बजाता दाढ़ी वाला पाईड पाइपर ऑफ़ हैमलिन चला, रंग बिरंगे से कपड़े, कुरता भगवा, पजामा सफ़ेद! नहीं साहब टोपी बेचारे ने नहीं पहनी थी. पाईड पाइपर किसी तरह टोपी पहनने को तैयार ही नहीं होता था.

खैर आगे-आगे पाइपर और पीछे-पीछे चूहे. सबको ले जा के इसने नदी में कूद जाने दिया. बेचारे चूहों को तैरना नहीं आता था, इकॉनोमिक अपहीवल (economic upheaval), कभी इकॉनमी के डाउनफॉल का जमाना, कभी क्रूड ऑइल के रेट गिरे कभी उनके मित्र अमरीका की इकॉनमी में डाउनफॉल हुआ.

चूहे बेचारे शहीद हो गए. उन्हें 72 हूरें मिली की नहीं ये हमें नहीं पता.

मगर जब पाईड पाइपर, मेयर साहब के पास पहुंचा तो अचानक मौका-ए-वारदात पर मेयर साहब की अम्मा पहुंची, कहने लगी, ये चूहा-भक्षी है, भेड़िया है (भेड़िया भी चूहों का दुश्मन है) इसे खदेड़ा जाए. बस फिर क्या था पप्पू ने भगा दिया pied piper को. कोई मेहनताना भी नहीं दिया.

पाईड पाइपर को काली दाढ़ी वाले ने बताया कि कैसे उनके साथ धोखा हुआ है, कोई मेहनताना नहीं मिला. जो बेइज्ज़ती हुई सो अलग!

पाईड पाइपर ने फिर से अपनी बांसुरी उठाई. बजाता-बजाता फिर से शहर से निकला, इस बार मधुर तान सुनते ही जनता पीछे-पीछे चल पड़ी. साथ साथ ढोल पीटता काली दाढ़ी वाला उसका चेला भी दौड़ता था, कभी लम्बी कतार के आगे जाए, कभी पीछे! कभी चश्मा संभाले, कभी ढोल!

छत के ऊपर से मेयर पप्पू की अम्मा देखती थी लेकिन सारा शहर देखते-देखते ही खाली हो गया. सब पाईड पाइपर के पीछे निकल लिए.

अभी वैसे पप्पू कभी-कभी दावतों की घोषणा करता है कोई जाता कि नहीं जाता, पता नहीं!! चूहों में से कुछ एक लाल गढ़ टाइप के बिलों में दुबके रह गए थे, कभी-कभी सर उठाते हैं, फिर कुचल दिये जाते हैं.

1920 के दौर की अपनी स्थापना के करीब सौ साल बाद उन्होंने अपनी रैलियों, मजलिसों में तिरंगा फहराना भी सीख लिया है. खैर जो भी हो, ये पाईड पाइपर ऑफ़ हैमलिन ने राजवंशों के साथ सही नहीं किया. सारा शहर खाली कर दिया है.

बाकी कोई उतपत देस जैसे इलाकों में बचा है तो वो भी मुख्य धारा में शामिल हो जाए तो अच्छा, नहीं तो फिर नदी में कूद जाने का विकल्प तो है ही…

आनंद कुमार की आवाज़ में ये लेख सुनें

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