क्या अपने मज़हब की समीक्षा करते हैं मुसलमान वामपंथी?

भारतीय वामपंथियों में मुसलमान भी रहे हैं. फिर भी यह देखने जैसी बात है कि किसी भी मुस्लिम वामी ने इस्लाम की कड़ी समीक्षा भी नहीं की है.

जिस कदर हिन्दू वामपंथियों ने अपने धर्म की न केवल समीक्षा की है बल्कि अपप्रचार भी किया है, ऐसा कुछ तो छोड़िए, कहने जैसे बातों पर भी सवाल नहीं पूछे.

वैसे एक बात है कि उन्होने अन्य धर्मों पर भी सार्वजनिक सवाल नहीं उठाए. पार्टी के अंदर कुछ कहा हो तो पता नहीं.

हाँ, जन्मना हिन्दू वामपंथी जब पागल कुत्तों से भी ज़्यादा बदहवास होकर हिन्दू रीति रिवाज और सनातन धर्म की निंदा कर रहे थे तो उन्होने रोका भी नहीं.

अगर अपने मजहब के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा तो फिर नास्तिक और धर्मद्वेषी वामपंथियों में इनका क्या काम हो सकता है यह मेरे लिए प्रश्न था. ऐसे सवालों के जवाब इल्हाम होते हैं.

इनका काम यही होता है कि वामपंथियों को इस्लाम पर कुछ भी कहने से रोकना. मौजूदगी ही काफी है.

जो जन्मना हिन्दू वामपंथी होते हैं, वे कायर होते हैं, केवल अपनों से ही, वह भी कानून का दुरुपयोग कर के, उलझते हैं, जिसमें कॉंग्रेस जैसों का पॉलिटिकल सपोर्ट भी पाते हैं.

मुसलमान काँग्रेस के लिए वोट बैंक है, वामपंथी को काँग्रेस से इस मामले में कोई सपोर्ट नहीं मिल पाएगा.

आप देखिये, क्या किसी जन्मना हिन्दू वामपंथी ने इस्लाम या इसाईयत पर कुछ लिखा है?

क्या मुसलमान और ईसाई वामियों ने भी अपने-अपने मजहब–रिलीजन और फिरकों में जो कुछ चलता है, उस पर कभी कुछ सार्वजनिक लिखा है?

या ये दोनों केवल जन्मना हिन्दू वामपंथियों को अपना गाड़ीवाला बनाकर और हिंदुओं को गाड़ी का बैल बनाकर हांक रहे हैं?

लगता है वामपंथियों से कड़ा हिसाब लेना ज़रूरी है कि उन्होने सुधार कितना किया है और बिगाड़ कितना.

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