अफवाहों के पंखों पर उड़ने की जगह अफवाह को अफवाह समझने की समझ तो पैदा करिए

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दो दिन पहले लिखा था कि भाजपा फेसबुक से 12 – 15 लोगों को उठा कर टिकट देगी और मैं दिल्ली में हूँ. इसके बाद इस पर कुछ प्रतिक्रियाएं आई जो मज़ाकिया थीं और कुछ गंभीर थी.

मैंने उनको सबको एक मज़ाक ही माना. सोचने पर तब मजबूर हुआ जब 63 मित्रों ने ‘किस विधानसभा से लड़ना है और किस विधानसभा से लड़ूं’ का प्रश्न और सुझाव इनबॉक्स में दे डाला.

43 मित्रों ने फ़ोन पर बात की और सीट पूछ कर उस सीट के जातीय-धार्मिक समीकरण बता डाले….

दरअसल मेरी पोस्ट कुमार विश्वास और नारायण दत्त तिवारी के भाजपा में आने के अफवाह और उस पर आ रही प्रतिक्रियाओं पर थी कि कैसे एक कोई फ़र्ज़ी खबर उड़ा देता है और राष्ट्रवादी झट से उसको लेकर उड़ लेते हैं….

उनके इसको लेकर उड़ने से वामी गैंग से लेकर अन्य विरोधी दल वाले और मेन स्ट्रीम मीडिया के पत्रकार कैसे मज़े लूटते हैं.

नेतागिरी करने के लिए बनने वाले अलग होते हैं…

क्या कभी किसी नेता को देखा है – फोटो नहीं, नजदीक से… उसके संग समय बिताया है… बिताया होगा… क्या उसकी दिनचर्या पर मंथन किया है?

चलिए, क्या उसकी माली हैसियत पर गौर किया है… बहुतों ने किया होगा लेकिन बहुतों ने नहीं किया होगा…

जिन्होंने नहीं किया होगा उनकी संख्या ज्यादा है, उनके अंदर नेता की एक इमेज है और वो उसी पर आधारित होकर समझ बनाते हैं….

मैंने देखा है, नेता को साथ लेके घूमा हूँ और उसकी दिनचर्या को भी देखा है. 9 से 5 बजे, 10 से 6 बजे की नौकरी करने वाले नहीं होते वो…

एक बार सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद रिटायर होने तक 1 से 2 बजे के लंच समय को 12:45 से 2:30 बजे बनाने वाले नहीं होते वो….

9 से 5 बजे के कार्य समय को अक्सर 9:30 से 4:40 बजे करने वाले भी नहीं होते…

आपको को कोई गाली दे, पीठ पीछे बुराई करे और कई बार मुँह पर ही चार बात खरी खरी बोल दे तो आपका उत्तर क्या होता है…. शायद ईंट का जवाब पत्थर.

तुरंत नहीं तो बाद में … नहीं मानेंगे क्योंकि आप ईंट का जवाब पत्थर की हिम्मत नहीं रखते… इस समय मैं बताता हूँ अधिकतर क्या करते हैं – इस आदमी से सारे रिश्ते तोड़ लेते हैं….

आपको नेतागिरी का धंधा करने वालों की समझ नहीं है. फ़र्ज़ी की खबर पर कुलांचे मारने वाले आप लोगों को भी राजनीती का कुछ नहीं पता है…

किसी पार्टी के उम्मीदवार को टिकट मिलने पर जातिगत और धार्मिक गिनती लेकर बैठने वाले लोग आपको मालूम होना चाहिए कि आपकी राजनैतिक सूझ-बूझ निल बटा सन्नाटा है.

कुल मिलकर फेसबुक पर पोस्ट लिखकर और चार अक्षर के ट्वीट लिखकर लाइक और रिट्वीट बटोरने से न विधायक बनते हैं और न ही ग्राम प्रधान.

उसके लिए पहले बहुत गाली, बेइज्जती, झिड़क सहनी पड़ती है… कई बार उम्र के 60वें पड़ाव पर सांसद बनने से पहले सारी जमीन जायदाद तक बिक जाती है…

अगर आप पार्टी के खानदानी पैदाइश नहीं हैं तो MP/ MLA बनने के लिए किस तरह विरोधियों द्वारा कई वर्ष मार और घसीट खा के बिताना पड़ता है, ये उन विधायकों और सांसदों से कभी पूछो जो वहां पहुँचे हैं…

किसी MP/ MLA से काम करवाने की अर्जी आगे बढ़ाने की जगह उसके झेले गए दिनों को पूछिये…. और अंत में प्रधानमन्त्री बनने तक क्या नहीं झेलना पड़ता वो नरेन्द्र मोदी से पूछें…

फेसबुक लाइक और कमेण्ट दिलाता है, वो MP/ MLA, मंत्री नहीं बनाता…. फिलहाल अफवाहों के पंखों पर उड़ने की जगह अफवाह को अफवाह समझने की समझ को विकसित कीजिये….

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