Audio : शाओलिन टेम्पल का भारत कनेक्शन

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बहुत पुराने ज़माने की बात है, उस दौर में भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार जोरों पर था. गुरु एक जगह से दूसरी जगह आते जाते रहते थे. अभी के शिक्षा के मॉडल की तुलना में इस तरीके के काफ़ी फायदे थे. इस पद्धति के कारण आज की तरह शिक्षा किन्हीं मठों में नहीं बंधती थी. किसी दूरदराज के गाँव में रहने वाले गरीब बच्चे के आस-पास भी शिक्षक पहुँच जाते थे. अच्छी शिक्षा किसी DU, किसी IIT की मोहताज नहीं थी.

ऐसे ही समय में बौद्ध भिक्षु बुद्धभद्र भी धर्म प्रचार के लिए निकले. वो 495 AD का वक्त था. बुद्धभद्र एक कठिन सफ़र करके चीन तक पहुंचे. वहां माउंट सोंग के पास ही उन्होंने एक मठ की स्थापना की. यही मठ बाद के दौर में चान बौद्ध शाखा का प्रवर्तक बना. चान बौद्ध शाखा आज के विख्यात “ज़ेन” (Zen) की पिछली शाखा थी. सदियाँ बीती और मठ धीरे-धीरे वीरान हो चला.

1981 आते-आते इस मठ में मुश्किल से दो दर्ज़न ही भिक्षु बचे थे. आस-पास के खेतों से उपजाए मक्के पर उनका गुजारा होता था. कुछ मवेशी भी थे उनके पास. ये समय ऐसा था जब बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा भी यहाँ से लापता हो चली थी.

पिछले 300 सालों से इस मठ का कोई मठाधीश भी नहीं था. ऐसे ही दौर में वहां लिऊ येंगचेंग नाम का सोलह साल का लड़का पहुंचा. लिऊ के पिता उसे इस मठ में भेजना नहीं चाहते थे, लिऊ ने अपने माता-पिता के घर से बाहर होने का एक दिन फायदा उठाया और भाग कर मठ में आ गया.

मठ में एक बुजुर्ग थे जिंगज्हेंग. वो उस समय मठ का काम-काज देखते थे, आर्थिक तंगी में भी जिंगज्हेंग ने लिऊ को रख लेने का फैसला किया. इस तरह लिऊ वहीँ खाना पकाता और मवेशी चराता हुआ अपनी धार्मिक पढ़ाई करने लगा.

मगर बदलाव एक बार तो होता नहीं. इसलिए परिवर्तन से मठ की मुलाकात वक्त के अगले ही मोड़ पर फिर से हो गई. उस दौर में कुंग फू की फ़िल्में बनने लगी थीं और हॉलीवुड में उस दौर में प्रसिद्ध हो चले जेट ली इस मठ के पास शूटिंग के लिए पहुंचे.

फिल्म बनी, फिल्म का नाम मठ के ही नाम पर था, फिल्म थी The Shaolin Temple. फिल्म एक गुलाम बना लिए गए बच्चे की कहानी थी जो भाग कर किसी तरह शाओलिन टेम्पल पहुँच जाता है और वहां से कुंग फू सीख कर फिर अपने पिता की मौत का बदला लेता है.

फिल्म हिट हो गई और कई लोग शाओलिन टेम्पल का भूला हुआ नाम फिर से जान गए. भविष्य में कभी बौद्ध भिक्षु बनने का सपना देखने वाले लोग फिर से शाओलिन टेम्पल आने लगे.

आस-पास के गाँवों से बच्चे मार्शल आर्ट्स सीखने आने लगे. 1970 के दशक में जहाँ साल में 50 हज़ार लोग भी शाओलिन टेम्पल नहीं आते थे, वहीँ 1984 में 2.6 मिलियन लोग शाओलिन टेम्पल आये.

जिस घर से भागे 16 साल के बच्चे से इस शाओलिन टेम्पल की कहानी शुरू की थी, वो आगे चलके शी योंगजिंग के नाम से जाना जाने लगा.

आज जैसे डिज्नी लैंड कहते ही कार्टून, मिकी माउस, डोनाल्ड की याद आ जाती है, वैसे ही मार्शल आर्ट्स कहने पर जो शाओलिन टेम्पल की याद आती है, वो परिवर्तन योंगजिंग का लाया हुआ है.

ठीक ऐसा ही होता है मेरे साथ जब हम ‘हैदर’ नाम की फिल्म में चू#@पा * देखते हैं (*Chutzpah: जिसका सही उच्चारण, लिखे हुए से थोडा अलग होता है).

मुझे कश्मीर के अनंतनाग में एक पुराना, टूटा फूटा सा मार्तंड सूर्य मंदिर नजर आ जाता है. इस्लामिक आतंकवाद के प्रकोप से कश्मीर के हिन्दुओं के पलायन का वो प्रतीक है. नाज़ियों के द्वारा, यहूदियों पर किये गए ऐसे ही जुल्मों कि याद दिलाता है.

नाज़ियों के पास भी गोएबेल्स का प्रचार तंत्र था ही, जो विरोध के स्वर दबाता था. आतंकियों के वैसे ही प्रवक्ता आज भी कश्मीरी हिन्दुओं के जिक्र पर मज़ाक उड़ाते हैं.

बाकी हमारा विश्वास है कि परिवर्तन अगले ही मोड़ पर होगा, हम उससे मिलने की उम्मीद में वक्त के साथ आगे बढ़ते हैं.

आनंद कुमार की आवाज में यह लेख सुनें

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