शॉर्ट टर्म मेमोरी वाला हिरन बने रहेंगे तो खाता रहेगा शेर, वीडियो : यूपी का चुनावी विश्लेषण

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उत्तरप्रदेश में चुनाव सर पर हैं और उसके साथ भाजपा ने अपने टिकिट बांटने शुरू कर दिए है. इसके साथ ही प्रथानुसार उसके समर्थको में, अपने-अपने कारणों से कहीं-कहीं असंतोष का दौर भी चालू हो गया. भाजपा इस मामले में सबसे अनूठी पार्टी है, जहाँ टिकिट वितरण में सन्तोष से ज्यादा असन्तोष का वातावरण ज्यादा गर्म रहता है.

जहाँ तक मेरा मसला है, मेरे लिए, यदि कोई असन्तोष है तो वह असन्तोष मेरा व्यक्तिगत मामला है, जिसका प्रभाव चुनाव पर नही पड़ने देता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि लोकत्रांतिक व्यवस्था में विचारधारा की जमीनी दीर्घायु, चुनाव के जीतने से और सत्ता पर लम्बे काल तक बने रहने पर निर्भर करता है.

मेरे लिए, चुनाव का महीना अपने तमाम व्यक्तिगत विग्रहों के कत्ले आम करने का महीना होता है क्योंकि मेरे लिए जीत ही अंतिम लक्ष्य है. अब जब यह तय हो चुका है कि महान सेक्युलर समाजवादी अखिलेश यादव और खानदानी इंडो इटेलियन सेक्युलर सोनिया की कांग्रेस का लिव इन रिलेशनशिप में रहना तय हो चुका है और दलित के हाथी पर बैठ कर सेक्युलर मायावती ने अजान करना शुरू कर दी है, तब आप लोगो को पिछले साल की हिरन और शेर की यह कहानी याद कराना बनता है –

जंगल ज्ञान – शेर और हिरण

हम लोग 5 जनवरी को पेंच, मध्यप्रदेश के जंगल में, खुली जीप में, शेर देखने के लिए घूम रहे थे. हमारे साथ एक गाइड भी था, वह हिरणों और लंगूरों की काल व ताजा बने पंजों के निशान के भरोसे, यह खोज रहा था कि शेर किस इलाके में है.

तभी उसने एक घास के मैदान पर ले जाकर हमारी जीप रुकवा दी. हम लोगों ने देखा कि खुले में 5 सियारों का एक दल, टीक के पेड़ के नीचे चहलकदमी कर रहा है.

गाइड ने बताया की भोर में एक 3 साल के, युवा होते शेर ने, अपनी औकात से बड़ा सांभर मार दिया है और वह अपने शिकार को इसी घास के मैदान में छुपा कर, छुपा बैठा है.

यह सियारों का झुण्ड, सुबह से इस इलाके में, उस शिकार में हिस्सेदारी के लिए घूम रहा है. वो इंतज़ार कर रहे हैं कि शेर इधर-उधर हटे तो वो सांभर का कुछ हिस्सा नोच कर भाग जाएँ.

शेर की आहट लेने के लिए, हम लोग भी थोड़ी देर के लिए वहीं रुक गए. जीप की दाहिने तरफ, करीब 15 चीतल का झुण्ड भी चर रहा था, जिसमे उनके कुछ शावक भी थे.

मैंने गाइड से पूछा कि शेर बगल में है और ये हिरण आराम से चर रहे है, इनको डर नहीं लगता? मेरी बात पर वो हंस दिया और फिर उसने मुझे एक पते की बात कही.

उसने कहा, ‘हिरणों की बड़ी शॉर्ट टर्म मेमोरी होती है सर, उनको जब आभास होता है कि शेर अगल-बगल ही है, तब अपने खुर को पटक कर और गले से एक तरह की आवाज़ निकाल कर, अपने अगल बगल के साथियों को अगाह कर देता है और फिर मस्त चरने लगता है. इसी लिये, हिरण, शेर का सबसे आसान शिकार होते है. सर, यदि हिरण हमेशा खौफ लेकर, चौकन्ना हो कर जियेगा तो फिर शेर तो भूखे ही मर जायेंगे न सर!’

बड़े पते की कही थी कही थी इस गाइड ने. यदि हिंदुओं में हिरण नही होते तो क्या सेकुलरिस्म का शेर भारत में कभी इतना फलता-फूलता?

यह जो कश्मीर, यूपी, बिहार, बंगाल, असम, केरल, हैदराबाद इत्यादि जगह है, यह सेक्युलर शेरो के अभ्यारण्य हैं क्योंकि वहां प्रचुर मात्रा में हिरण है जो दशकों से चरने में मस्त रहे हैं.

हम लोगो को तो शेरों की भयावहता का डर तभी सताता है जब शेर टोंक, मालदा, पूर्णिया ऐसे जगहों में अपने इलाके से निकल कर हमारे घर के मवेशियों और लोगों का मार जाता है.

मेरा तो लोगो से आग्रह है कि शेर को मारने के लिए हांके या मचान बंधवाने का इंतज़ार मत कीजिये भाई, सबसे पहले शॉर्ट टर्म मेमोरी वाले हिरणों को खत्म कीजिये. वह कम होंगे तो शेर भूखा हो जायेगा और भूखा शेर सबसे आराम से मारा जाता है.

हमारी लोकत्रांतिक व्यवस्था में फिलहाल आपके पास चुनाव ही ऐसा हथियार है जिससे सेक्युलर शेर मारा जा सकता है और उसके लिए आपको शॉर्ट टर्म मेमोरी वाला हिरन बनना बन्द करना होगा.

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