तथाकथित गौरक्षकों को ज़रूरत है जल्लीकट्टू के पीछे चल रहे षडयंत्र समझने और समझाने की

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जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध पर समाज की मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. जो गौहत्या पर प्रतिबंध चाहते हैं वो जल्लीकट्टू पर नहीं चाहते और जो गौमांस पर प्रतिबंध नही चाहते क्योंकि खाना किसी का निजी चुनाव है, जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध चाहते हैं.

आखिर क्या गहराई है इस साधारण से दिखने वाले विषय में? क्यों ‘बीफ बैन’ के विरुद्ध खड़े होने वाले प्रबुद्ध ‘जल्लीकट्टू’ पर बैन चाहते हैं?

जल्लीकट्टू की महत्वता समझने से पहले भारतीय संस्कृति के मर्म को जानना आवश्यक है. भारतीय संस्कृति में किसी भी जीव के प्राण किसी अन्य जीव से कम या ज्यादा नही है. चींटी को मारने में भी पाप है, और हाथी को मारने पर भी. किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचते हुए, प्रकृति को सहेजकर, सतत विकास ही भारतीय संस्कृति का लक्ष्य रहा है. प्रकृति के संतुलन में गौवंश का मानव से भी ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान है.

जल्लीकट्टू का इतिहास वैसे तो युगों पुराना है. पर तकनीकी रूप से देखा जाए तो इसकी झलक मोहनजोदड़ो की प्राचीन सिंध सभ्यता में भी मिलती है. आज से लगभग 5000 वर्ष पुरानी सिंधु घाटी से प्राप्त एक ‘मोहर’ में इसकी छाप देखने मिलती है.

तमिल शब्द “येरु थाज़्हुवुथल” के नाम से प्राचीन भारत में ऐसा ही खेल प्रचिलित था जिसका अर्थ है “गौवंश को गले लगाना”. मदुरई के गुफा मंदिरों में भी जल्लीकट्टू के चित्र उकेरे गये थे जो कम से कम 2500 वर्ष पुराने हैं.

जल्लीकट्टू का वर्तमान स्वरूप भी कम से कम 100 से 400 वर्ष पुराना है. पहले ‘एक व्यक्ति और एक बैल’ ही खेलते थे. अब ‘कई मानव प्रतियोगी और एक बैल’ खेलते हैं. कई तमिल ग्रंथो जैसे सिलप्पतिकारम, कालिथोगई, मलाईपादुकुदाम आदि में जल्लीकट्टू का वर्णन मिलता है.

यह प्रतियोगिता मट्टू पोंगल त्यौहार के तीसरे दिन होती है जो गौवंश को समर्पित है. भारतीय परंपरानुसार गौवंश परिवार का हिस्सा होता है, इसी भावना से गौवंश को खेती में अपना साथी भी मानते हुए पोंगल (जो मूलतः किसानों का त्यौहार है) का तीसरा दिन गौवंश को समर्पित है, जिसमे बैल को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि वह किसान के साथ बराबर परिश्रम करते हुए खेत जोतता है, प्रजनन कर उत्तम गौवंश प्रदान करते हुए दूध, गोबर खाद आदि पदार्थ भी देता है.

जल्लीकट्टू में बैल के सींगों पर जल्ली (सिक्कों) से भरा एक कट्टु (थैला) होता है. जिसे प्रतियोगी प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं. ज्यादा से ज्यादा 20 से 30 मीटर तक उसकी सवारी या उसपर झूल पाते हैं 10-20 सेकंड के लिए. प्रतियोगिता में मनुष्य और गौवंश में भेद नहीं किया गया है. न ही स्पेन के बुल फाइट जैसे इसमें प्रताड़ित किया जाता है.

जल्लीकट्टू का महत्त्व भारत की आत्मा से जुड़ा है. तहलका पत्रिका के अध्ययन के अनुसार अगले 10 वर्ष के भीतर भारत विदेश से “A1” दूध (A1 और A2 दूध में अंतर गूगल कर लें) का आयात करने पर विवश हो जायेगा. पंजाब-हरयाणा में 80% गौवंश विदेशी हो चुका है जो दूध “A1” बहुत देता है पर भारतीय वातारण को झेल नही पा रहा.

भारत के 69% गौपालक निर्धन हैं. भारत की दुग्ध उत्पादन क्षमता 3.2 कि./पशु है, जबकि वैश्विक 6.6 कि/पशु. भारत में 100 वर्ष पहले तक ही 130 से अधिक गौवंश की प्रजातियां हुआ करती थीं, जो अब मात्र 28 (कुछ सर्वेक्षण के अनुसार 37) ही बची हैं. गौवंश लुप्त होने के दो प्रमुख कारण हैं, खेती से बैल का उपयोग बंद होना व गौवंश हत्या जिसमे नर गौवंश का ‘क़त्ल’ अधिक होता है.

भारत की अर्थव्यवस्था आज भी खेती पर टिकी है जो गौवंश के सहयोग से ही संभव है. आज पुनः विश्व भारत की जैविक खेती को अपना रहा है. और भारत में ही रासायनिक खाद, कीटनाशक आदि का चलन चलवाया जा रहा है. ‘organic’ नाम से विदेशों में भी दाम बढ़ा कर उत्पाद बेचे जाते हैं. आज के परिदृश्य में जल्लीकट्टू जैसी प्रतियोगिताओं में बैल का उपयोग होता है. जिसे समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है. नर के बिना मादा, और मादा के बिना नर का रहना असंभव है, ये एक दूसरे के पूरक हैं.

‘उंबिचेरी’ (Umbiachery जो विलुप्ति की कगार पर हैं) नस्ल का गौवंश जो जल्लीकट्टू में उपयोग होता है उसे ‘drought cattle’ भी कहा जाता है, अर्थात यह सूखे में भी अत्यंत सहयोगी है. Edgar Thurston अपनी पुस्तक ‘Vastea and Tribes of Southern India’ में कहते हैं यह अद्भुत प्रतियोगिता है जिसमें अदम्य साहस और अभ्यास चाहिए, कोई बड़ा हादसा नहीं होता मात्र कुछ चोटें लगती हैं (जो गाड़ी चलाकर गिरने से भी लग सकती हैं, इसका अर्थ गाड़ी पर प्रतिबंध लगाने का औचित्य नहीं). जल्लीकट्टू भारतीय गौवंश को बचाने में सहायक है. प्रतिवर्ष 10,000 से ज्यादा प्रतियोगिताएं होती हैं जिसमे 7-8 में क्रूरता होती रही होगी, जिन्हें दिखाकर पशुक्रूरता का नाम दिया जाता है.

PETA ने 2004 में यह प्रकरण उच्च न्यायलय में डाला था, जिसे वो 2014 में प्रतिबंधित करवा पाई. बकरीद के विरुद्ध कोई प्रकरण नहीं डाला गया, एक बार भोपाल में कुछ PETA के कार्यकर्ता अपील अवश्य कर रहे थे, तो उन्हें अल्लाह हू अकबर के नारों के साथ जुतिया दिया गया था.

धर्म और अर्थ का बहुत गहन सम्बन्ध है. भूखे पेट भजन नही होते. अर्थ पर वार किया जाए तो धर्म की हानि होती है. यह बात चाणक्य ने कही थी जिसे अंग्रेज समझ गए. और हमें यही पढ़ाया गया कि “वो” भारत को लूटने आये थे. हर बात के पीछे बहुत गहराई होती है. जिसे काम ही लोग समझ पाते हैं.

जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध से लाभ किसका? बीफ एक्सपोर्ट कंपनी का, क्योंकि गौ तो माता है, लेकिन बैल बाप नही है. परंतु नर गौवंश को नहीं बचाओगे, तो गौमाता कहाँ से लाओगे? कुछ ऐसे षड्यंत्र होते हैं जिन्हें सामान्य बुद्धि नहीं समझ सकती जब तक अर्थतंत्र का ज्ञान न हो. परिवार व्यवस्था* समाप्त करने के लिए षड्यंत्र हो या गौवंश समाप्त करने के लिए समझना और समझाना आवश्यक है.

कई गौरक्षकों को ज्ञान की आवश्यकता है.

*परिवार व्यवस्था पर आघात किया जा रहा है यह अलग विषय है, भारत के अर्थतंत्र से जुड़ा अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय जिसपर बाद में लिखूंगा.

 

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