व्यक्तिगत रूप से हिन्दू हुआ जा सकता है, पर मुसलमान नहीं

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मेरे लेखों पर एक भाईजान रोष में आ गए. बहुत खरे-खरे शब्दों में उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं किस हक़ से उन्हें देशद्रोही कह सकता हूँ, उनकी देशभक्ति किसी से कम नहीं है… वो देश को धर्म से ऊपर रखते हैं…

उनकी तस्वीर देखी, गले में तुलसी माला है… कोई दिखाने के लिए नहीं पहन रखी है, यूँ ही पहन रखी है तो दिख गयी… उन्होंने यह भी माना कि अपने पूर्वजों की गलती से मुसलमान हैं, कोई पसंद से नहीं हैं…

इतनी बात की तो तारीफ करनी ही पड़ेगी, पर अब आते हैं आगे के सवाल पर.

वैसे तो यह बात कई बार कह चुका हूँ, हर बार कोई नया बंदा आकर फिर से वही सवाल पूछे तो हर किसी की सोच बदलने और बहस करने के लिए नहीं लिखता, लेकिन इन साहब ने अपनी बातों से इतना हक़ हासिल तो किया ही कि इनकी बात का जवाब दिया जाये.

वैसे मेरे जवाब जानने है तो #TheLiberalMuslim हैशटैग पर जाइये और मेरी करीब दर्जन भर पोस्ट पढ़ लीजिये.

मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी मुसलमान से कोई दोस्ती और अदावत नहीं है, कोई लेना देना नहीं है. आपकी उदारता से इम्प्रेस भी नहीं होना है, आपकी पाँच नमाज, तीस रोजों से भी कोई शिकायत नहीं है, कोई वास्ता ही नहीं है.

बल्कि मैं तो कहता हूँ, कोई व्यक्तिगत रूप से मुसलमान हो ही नहीं सकता… व्यक्तिगत रूप से हिन्दू हुआ जा सकता है, पर मुसलमान नहीं.

इस्लाम एक मज़हब है तो एक फौज भी है. आप जब एक फौजी होते हो तो एक रेजिमेंट में होते हैं, एक फार्मेशन में होते हैं, किसी ब्रिगेड, डिवीज़न, कोर, कमांड का भाग होते हैं.

आपके जूते किस साइज के हैं, आप वर्दी में बाजू मोड़ कर रखते हैं या नीची रखते हैं, टोपी सीधी लगाते हैं या तिरछी, ड्यूटी पर टाइम से जाते हैं या देर से या नहीं जाते… इससे आपके फार्मेशन कमांडर को फ़र्क़ पड़ सकता है, मुझे नहीं पड़ता.

मेरे लिए प्रश्न बस इतना है कि आप क्या आइडेंटिटी सब्सक्राइब करते हैं… आप अपने आपको मुसलमान कहते हैं… फिर आप कितने नेक बन्दे हैं, इससे असल में कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

आपकी फौज आपसे पूछ कर हम पर गोलियाँ नहीं चलाएगी… और आप तब अपनी फौज के साथ मिलकर गोलियां चलाएंगे, या गोला बारूद ढोएंगे, या कुक हाउस में खाना बनाएंगे या बगावत करके अपना कोर्ट मार्शल करवा लेंगे यह आपकी मर्ज़ी है…

आपने अपना फौजी आइडेंटिटी कार्ड दिखा दिया, बस इतनी ही आपकी पहचान है.

और आप कोई अब्दुल हमीद और डॉ कलाम नहीं हैं, पर उनकी भी बात करूँ… उन्होंने देश के लिए जो किया, मुसलमान की हैसियत से नहीं किया.

पर अगर डॉ कलाम भी आमने-सामने होते और कहते कि मैं मुसलमान हूँ, तो मैं उनसे भी यह कहने की गुस्ताखी करता कि सर, आपका मुसलमान होना देश को भारी पड़ रहा है… भूल जाइए कि आप मुसलमान हैं, मैं भी भूल जाऊंगा कि आप मुसलमान हैं…

पर अगर डॉ कलाम भी कहते कि मैं मुसलमान हूँ और मैं नेक हूँ तो इस लॉजिक से भी मैं नहीं मानता कि मुसलमान देश के लिए वफादार हो सकता है…

इस्लाम में, बाई डेफिनिशन, अल्लाह सबसे बड़ा है, सबसे पहले है… और एक मुसलमान की पहली ड्यूटी जिहाद है… यह डेफिनिशन मैंने नहीं लिखी है और आपने नहीं चुनी है…

फौजें जनरल साहब के हुक्म से चलती हैं, प्यादे क्या कहते हैं उससे फ़र्क़ नहीं पड़ता… और जनरल साहब 1400 साल पहले जो कह गए हैं वह सबके सामने है.

इसलिए कलाम साहब को इस्लाम का प्यादा बना कर मत पेश कीजिये. वो मुसलमान नहीं थे… मुल्लों के लिए भी नहीं और हमारे लिए भी नहीं.

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