सुभाष जन्मोत्सव 3 : ‘महात्मा’ के चोले में छिपे राजनीतिज्ञ गांधी को बेनक़ाब कर गए नेता जी

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गतांक से आगे…

20वीं सदी की शुरुआत में ऊपर वर्णित चारों नायक एक-दूसरे से अनजान, देश के अलग-अलग कोने में थे. 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से नाम कमा कर भारत वापस लौटे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बन गए.

वहां उनको आगे बढ़ाने वाले उस समय के कांग्रेस दल के प्रमुख भारतीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, जो एक मध्यम मार्गी थे और उस समय की व्यवस्था के अंदर ही काम कर के आगे बढ़ने के समर्थक थे.

गांधी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने कालांतर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्वरूप बदल कर पूरा भारतीय कर दिया.

जमींदारों के खिलाफ और किसानों के हक के लिए 1918 में चम्पारन और गुजरात के खेड़ा में मिली सफलता से गांधी की ख्याति पूरे देश में फ़ैल गयी. उनकी भारतीय वेशभूशा, खान पान ने उन्हें सारे भारतीयों का अपना बना लिया था.

इस प्रकार गांधी पहले नायक थे जिन्हें सम्पूर्ण भारत में स्वीकारोक्ति मिली थी और उसके बाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वमान्य नेता हो गये.

गांधी के इस शिखर पर पहुँचने के दौरान ही पटेल, नेहरू और बोस का पदार्पण कांग्रेस और गांधी के जीवन में हुआ.

यह तीनो एक-दूसरे से बिलकुल जुदा थे. तीनो की परिवारिक पृष्टभूमि और उनके राष्ट्रीय विचारधारा में जुड़ने के क्रम भी अलग थे.

इन सबमें सबसे बड़े वल्लभ भाई पटेल थे. 1875 में एक कृषक परिवार में जन्मे पटेल ने स्वाध्याय किया, 22 साल की उम्र में मैट्रिक पास की और फिर पैसे बचा कर इंगलैंड गए, जहाँ उन्होंने बैरिस्टरी पास की.

लौट कर उन्होंने वकालत का सफल व्यवसाय किया. शुरू में उनकी राजनीति में कोई रूचि नहीं थी, फिर लोगो के जोर देने पर सैनिटेशन कमिश्नर, अहमदाबाद का चुनाव लड़ा और जीते.

इसी तरह शुरू में उन्हें गांधी में कोई रूचि नहीं थी लेकिन खेड़ा सत्याग्रह में वे गांधी के करीब आये और उनसे प्रभावित हुए. एक बार जब पटेल गांधी के अनुयायी हुए तो उन्होंने पूरी तरह अपने को समर्पित कर दिया.

पटेल कृषक परिवार से आये थे और जिस बात से वे चीज़ सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, वो थी दक्षिण अफ्रीका के लौटने के बाद गांधी का सभी पाश्चात्य वस्तुओ का त्याग और भारतीय ग्रामीण परिवेश में आश्रम बना कर रहना और भारतीय गरीब आदमी के पहनावे को ग्रहण करना.

यहां इस बात का जरूर ध्यान रखना होगा कि पटेल जिस समय गांधी के सानिध्य में आये तब वो स्वयं 40 वर्ष के ऊपर के हो चुके थे और अपने जीवन के संस्कारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध, गांधी को बड़े का सम्मान देने और उनके आदेशो के प्रति पूरी तरह आज्ञाकारी थे.

वे खुद बड़े अड़ियल माने जाते थे लेकिन गांधी को बड़ा मान कर अनुज की भूमिका स्वीकार कर चुके थे. इसलिए गांधी के आदेशों को अंतिम मानना अपना कर्तव्य बना बैठे थे. इसी बड़े और छोटे के भारतीय जीवन के दर्शन ने बाद में भारत के भाग्य में बड़ी अठखेलियाँ खेली.

नेहरू उनसे 14 साल छोटे थे. 1889 में उनका जन्म एक मोतीलाल नेहरू के यहाँ हुआ था जो एक अमीर बैरिस्टर थे. उनका लालन पालन रईसी में हुआ था और शुरू की पढाई भी प्राइवेट ट्यूटरों द्वारा घर पर हुई और बाद में इंगलैंड जा कर बैरिस्टरी पास की.

लौट कर उन्होंने वकालत करने की कोशिश की लेकिन उनकी वकालत नहीं चली और न ही उनका इस व्यवसाय में मन लगा. अपने इंगलैंड प्रवास के दौरान ही उन्होंने बर्नार्ड शॉ, एच.जी वेल्स, जे. एम. कीन्स, बरट्रांड रसेल, डिकिंसन और मेरेडिथ टौन्सेन्ड की किताबें पढ़ीं जिनका असर आगे चलकर उनकी राजनैतिक और आर्थिक सोच पर बहुत गहरा पड़ा.

1912 में उन्होंने लौट के पटना के कांग्रेसी अधिवेशन में हिस्सा लिया और वहां से दुखी लौटे. उन्होंने लौटने के बाद कहा, कांग्रेस का अधिवेशन Very much an English-knowing upper class affair.. नेहरू उस समय के गोखले के मध्यमार्गी विचारों से असहमत थे.

गोखले जी की 1915 में मृत्यु के बाद ऐनी बेसेंट, जो सोशलिस्ट विचारधारा की एक ब्रिटिशर थीं, और लोकमान्य तिलक ने National Movement for Home Rule का आह्वान किया, लेकिन मध्यमार्गी समर्थको ने उसे नकार दिया.

उसके बाद नेहरू, ऐनी बेसेंट से प्रभावित होते चले गए. उनके बाद के जीवन पर, विदेशी महिलाओं के प्रभाव पड़ने के पीछे, यह एक बड़ा साइकोलॉजिकल कारण बना. 1920 के बाद असहयोग आंदोलन में भाग ले कर नेहरू राष्ट्रीय पटल पर पहचाने जाने लगे.

जब सन 1922 में चौरी चौरा काण्ड हुआ और गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया तो मोती लाल नेहरू और चितरंजन दास ने इसके विरोध में स्वराज पार्टी की स्थापना की. जवाहर लाल ने पिता के विपरीत गांधी का साथ दिया और यही से गांधी का जवाहर लाल नेहरू के प्रति विशेष स्नेह स्थापित हो गया था.

उनके बीच यह विशेष सम्बन्ध कालांतर में भारत के भविष्य पर अमिट छाप छोड़ गए. नेहरू, गांधी के अनुयायी जरूर हो गये थे, पश्चिमी कपड़ों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया था लेकिन वैचारिक रूप से पश्चिमी जगत में स्थापित हो रही सोशलिज्म उनके अंदर घर कर रही थी. जहाँ गांधी नीचे के स्तर के भारत को अंदर समा कर भारत को जगाना चाहते थे, वहां नेहरू, समाजवाद में उत्तर ढूंढ रहे थे.

सुभाष चन्द्र बोस इन तीनो में सबसे छोटे थे. वे पटेल से 22 साल और नेहरू से 8 साल छोटे थे. उनका जन्म 1897 में हुआ था. आज या पहले भी जब भारत के लोग इन तीनों का नाम साथ लेते हैं तो तीनों ही समकालीन लगते हैं लेकिन इन तीनो में बड़े और छोटे में 22 साल का अंतर था.

आज यहाँ 2017 से देखने से हमें इस अंतर में ज्यादा महत्व नहीं लगता लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत में पलटते हुए भारत में इन तीनों की उम्र का अंतर बड़ा महत्वपूर्ण है.

सुभाष चन्द्र बोस जन्म एक वकील परिवार में हुआ था और वे मेघावी थे. 16 साल की उम्र में मैट्रिक न केवल पास किया था बल्कि द्वितीय स्थान भी प्राप्त किया था. उसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया.

वहां पहली बार उनका राष्ट्रवादी चरित्र सामने आया जब उन्होंने प्रोफेसर ओटन द्वारा भारत और भारतीयता की निंदा करने पर मार पीट कर ली और जिसके फलस्वरूप कॉलेज से निष्काषित कर दिए गए.

यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि इन तीनों में राष्ट्रवादी भावना सबसे कम उम्र में सुभाष चन्द्र बोस के अंदर आई थी और उन्होंने उसको अपने तरीके से उसका इजहार भी किया था.

सुभाष चन्द्र बोस सेना में जाना चाहते थे और उन्होंने इसकी परीक्षा भी दी थी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया. किन्तु मन सेना में ही जाने को कह रहा था, इसलिए खाली समय का उपयोग करने के लिये उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रँगरूट के रूप में प्रवेश पा गये.

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के चरित्र का यह पक्ष बहुत महत्वपूर्ण है, जो इन तमाम सवालो का जवाब देता है कि नेता जी ने कैसे भारत की आज़ादी के लिए सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की सोची और बाद में हिन्द सेना का गठन किया.

उनके व्यवहार से और उनके जीवन में स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों के बढ़ते हुए प्रभाव से उनके पिता चिंतित हो गये थे और वो चाहते थे कि सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस बने.

घर में हो रहे असंतोष को देख कर उन्होंने अपने पिता को वादा किया और आईसीएस की तैयारी के लिए वो इंग्लैंड चले गए. वहां आईसीएस में न केवल चुने गए बल्कि उन्होंने चौथी पोजीशन भी प्राप्त की.

उनका चुनाव तो हो गया था लेकिन इंग्लैंड की नौकरी करना उन्हें मानसिक कष्ट दे रहा था. उन्होंने 1921 में ही आईसीएस से इस्तीफा दे दिया और वहां से अपने बड़े भाई को लिखा –

भइया! हम लोग, जो एक ओर स्वामी विवेकानन्द और दूसरी ओर अरविन्द घोष के प्रभाव-छत्र में बड़े हुए हैं, भाग्य या दुर्भाग्य से ऐसी मानसिकता बना चुके हैं कि ध्रुवों जैसे भिन्न दृष्टिकोणों पर लदा कोई समझौता हमें स्वीकार नहीं है.

मुझे खेद है उनके और मात्र उनके कारण भरे पूरे समंजित परिवार में मतभेद पैदा हो चुके हैं. लेकिन मै मजबूर हूँ बचपन से ही कुछ ऐसे आदर्श मेरे दिलो-दिमाग पर हावी हो चुके हैं जो परिवार के किसी दूसरे व्यक्ति को मंजूर नहीं हैं.

और वो वापिस भारत वापस लौट आये.

इंग्लैंड से वापसी पर रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार भारत वापस आने पर वे सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गांधी से मिले. वहाँ 20 जुलाई 1921 को गांधी और सुभाष के बीच पहली मुलाकात हुई. उन्होंने देशबंधु चित्तरंजन दास के साथ बंगाल में काम करने को कहा.

देशबंधु चित्तरंजन दास कोलकाता के महापौर बन गये. उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया. सुभाष ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला.

कोलकाता में सभी रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दे दिये. स्वतन्त्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वालों के परिवारजनों को महापालिका में नौकरी दी.

इन सब बातो से यह तो अंदाजा लग जाता है कि सुभाष चन्द्र बोस इन तीनों, गांधी, पटेल और नेहरू से विलक्षण थे. इसी विलक्षणता ने ही आगे के समय में इन तीनों को उनके सामने असहज बना दिया.

इसी दौरान वे नेहरू के करीब आये और उनको बड़ा भाई मान कर दोनों ने साथ काम किया. 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ.

इस अधिवेशन में सुभाष ने खाकी गणवेश धारण करके गांधी को सैन्य तरीके से सलामी दी. गांधी क्योंकि अमनपसंद और अहिंसावादी थे, वो सुभाष चन्द्र बोस के इस शानदार वर्दी वाले साथियों के अनुशासन से डर गए और असहज हो गए.

यहाँ यह महत्वपूर्ण है गांधी ने जिस काल में पटेल ऐसे आज्ञाकारी साथी को साथ में लिया, नेहरू जैसे बड़े घर के पश्चिमी दृष्टि से सहज, आज़ादी के लिए कर्मठ को लिया, उस वक्त सुभाष चन्द्र बोस जैसे व्यक्ति ने भी समकक्ष जगह बना ली जो अपनी जगह बेहद राष्टीयता के प्रति संजीदा थे.

वो एक तरफ स्वामी विवेकानन्द और दूसरी ओर अरविन्द घोष से बेहद प्रभावित थे और दूसरी और यह उनको विश्वास हो गया था कि भारत के इतने सालों तक गुलाम रहने के बाद उनके जीवन में अनुशासन का होना जरुरी है.

गांधी जिंदगी में पहली बार किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व से असहज हुए थे और वो थे उनसे 28 साल छोटे सुभाष चन्द्र बोस. सुभाष चन्द्र बोस में वो सब था, जिस के लिए गांधी को अपने से खुद ही इतने साल संघर्ष करना पड़ा था.

स्वामी विवेकानन्द और अरविन्द घोष की आत्मीय शक्ति से सराबोर, सबसे मेघावी, सबसे शांत मन, सब पाकर खुद ही ठुकरा कर राष्ट्रीयता की अलख जलाने वाले.

सुभाष चन्द्र बोस 1920 के दशक में गांधी, पटेल और नेहरू के साथ होते हुए भी उन तीनो से जुदा थे.

क्रमशः 4

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