एक चम्मच ‘मीठा’ खिला कर जो चाहो लिखवा लो

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आपको याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अमेरिका के प्रतिष्ठित न्यूज चैनल को सवाल पूछने से मना करते हुये बार-बार उसे फेक न्यूज चैनल की संज्ञा से नवाजा था.

अमेरिका हो या भारत अथवा कोई भी अन्य लोकतांत्रिक देश, लोकतंत्र की मजबूती के लिये मीडिया का होना आवश्यक बताया जाता है.

वैसे भी सत्ताधारी दल या विपक्ष अपनी बात को अगर जनता तक न पंहुचा पायें तो फिर इनकी सारी कवायद फलीभूत नहीं हो सकती. मीडिया इनमें सहायक हो सकता है और होता भी है.

लेकिन जैसे कि ट्रंप मीडिया से पीड़ित नजर आते हैं उसी तरह का हाल भारत में मोदी का भी है. ऐसा नहीं है कि ये दोनों नेता चुनाव जीतकर अभिमान में मीडिया को टारगेट करते नजर आते हैं. बल्कि चुनाव से पहले से ही इन लोगों को मीडिया टारगेट करता रहा है.

फिर लोकतांत्रिक पद्धति में अभिव्यक्ति के प्रसार की बहुत आवश्यकता होती है. ऐसे में इन लोगों ने सोशल मीडिया की सहायता लेकर अपनी बात सीधे तौर पर जनता के बीच रखनी शुरू कर दी.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या इन देशों में पत्रकारिता अपने उद्देश्य से भटक गयी है?

विश्व में मुख्यत: तीन प्रकार की सत्ताएं देखने को मिलती हैं. वामपंथ प्रभावित राजशाही, इस्लामिक और लोकतांत्रिक.

वामपंथी और इस्लामिक देशों में मीडिया के खिलाफ कोई भी स्वर कभी देखने को नहीं मिलता है. इसके उलट सच्चाई यह होती है कि ऐसे देशों में मीडिया अपने वास्तविक अर्थों में होता ही नहीं है.

इस्लामिक देशों में इसे हराम करार देकर तमाम तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता है तो वामपंथी देशों में बस यह सरकारी लाउडस्पीकर के तौर पर ही जाना जाता है.

ऐसे में इनका वजूद लोकतांत्रिक देशों में ही फल फूल सकता है. लेकिन हालात दर्शा रहे हैं कि इन देशों में भी इनकी पौध रोगग्रस्त होने लगी है. मतलब आज यह एक मिशन न होकर मशीन बन चुकी है. पैसा और तरक्की पाने की मशीन.

पत्रकारिता के मिशन की बात करता हूं तो मुझे एक वाकया याद आता है जोकि मदन मोहन मालवीय जी से संबंधित है.

वाकया उन दिनों का है जब मालवीय जी “हंस” के संपादन का काम देखते थे. उस दौरान एक दिन एक चीनी (शक्कर) का व्यापारी उनसे मिलने आया और भेंट स्वरूप बेहतरीन चीनी के दो पैकेट उन्हें दिया.

व्यापारी तो आखिर व्यापारी ही होता है. उसकी लालसा थी कि मालवीय जी उस चीनी की मिठास से प्रभावित होकर हंस में दो-चार लाइन लिख देंगे.

लेकिन हंस के कई अंकों के प्रकाशन के बाद भी जब उसे अपनी चीनी के बारे में एक भी लाइन पढ़ने को नहीं मिला तो धह दोबारा मालवीय जी से मिलने पंहुच गया.

बातचीत के दौरान उसने जब चीनी के संबंध में पूछा कि हंस में इस संबंध में कुछ भी नहीं छपा तब मालवीय जी ने अपने मेज का दराज खोला और उसमें से उस चीनी के दोनों पैकेटों को व्यापारी के सामने रखते हुये कहा कि ‘हंस के अभी इतने बुरे दिन नहीं आये कि उसे चीनी का स्वाद बताना पड़े.’

जबकि आज चीनी के दो पैकेट क्या, बस एक चम्मच चीनी मुंह में पाकर ही पत्रकार किसी के पक्ष में मिठास उगलने लगते हैं.

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