नागाओं का रहस्य – 5 : पारंपरिक इतिहास

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वैदिक उपरांत समय से नागाओं के पारंपरिक इतिहास के लिए हमारे सूत्र महाभारत, रामायण, पुराण, जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य एवं अन्य साहित्यिक कृति हैं. मुख्य नागराजाओं और नागाओं के इतिहास में उनके योगदान के संदर्भ में हमें पता चलता है. पारंपरिक कथाओं के ऐतिहासिक महत्व के बारे में, विद्वानों की राय भिन्न है, उनके बारे में कुछ विद्वान अत्यधिक संदेह दिखा रहे हैं, और कुछ उसमें जो कुछ भी कहा गया है उसे पूरी तरह से ऐतिहासिक बता रहे हैं.

हालांकि यह सच है कि पुराणों और महाग्रंथों में बहुत कुछ ऐसा है जो ऐतिहासिक रूप में स्वीकार करने के लिए मुश्किल हो सकता है “यह मानना बेतुका लगता है कि कल्पना सच को पूरी तरह से बेदख़ल कर दे”. उनमें निहित कुछ बयान की पुरातात्विक, शिलालेख(पुरालेख विद्या) और मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य से पुष्टि की जा रही है.

इस अवधि के दौरान नागा शब्द इस तरह के कुछ अन्य पर्यायवाची भावों से भी जाना जाता है, जैसे पनागा, सर्प, उरग, भुजंग और अजगर. उनका निवास नागलोक था जो पृथ्वी की आंत में था, ऐसा कहा जाता है कि वह अनंत (अपर्यंत) था और जैसे उसे सैकड़ों विभिन्न प्रकार के स्थानों, घरों, टावरों और शिखरों का ताज पहनाया गया हो और छोटे और बड़े अद्भुत मैदानों से घिरा हो. इसे पाताल भी कहा जाता था जो अधोभूमि के सात क्षेत्रों में से एक था और जो हज़ारों योजन के विस्तार में फैला हुआ था.

पाताल, जिसे रसातल या निरय भी कहा जाता है, खुशी और आकर्षण का धाम था. विष्णु पुराण के अनुसार ऋषि नारद, जिन्होंने यहाँ का भ्रमण किया था, ने अनुभव किया कि वह इंद्र के स्वर्ग से अधिक रमणीय स्थान था. ऐसी मान्यता है कि भ्रमणोपरांत ऋषि नारद की भावनाएं इन शब्दों में व्यक्त हुईं कि; “पाताल की तुलना किससे की जा सकती है, जहाँ नागा प्रतिभाशाली और सुंदर और उल्लास से भरे रत्नों की तरह सुसज्जित हो; पाताल में कौन प्रसन्न नहीं होगा, जहाँ दैत्य और दानव की सुंदर किंतु सादगीपसंद बेटियाँ घूमते हुए आकर्षित करती हैं. जहाँ सूरज दिन में प्रकाश फैलाता है गर्मी नहीं. जहाँ रात में चंद्रमा रोशनी के लिए चमकता है, शीतलता के लिए नहीं. जहाँ दानु के बेटों को स्वादिष्ट भोजन और मदिरा के आनंद में पता नहीं चलता कि समय कैसे बीत जाता है? वहाँ सुंदर पेड़ और नदियाँ और झीलों में खिलते कमल हैं और आसमान कोइल के गीत दोहराता सुनाई देता है. पाताल में रहने वाले दैत्यों, दानवों और नाग देवताओं के लिए आकर्षक गहने, सुगंधित इत्र, अंजन, वीणा, नलिका वाद्य (पाइप) और तबले का मिश्रित संगीत उनके आनंद का सामान्य भाग है.”

पाताल की राजधानी का नाम भोगवती था क्योंकि यह सदा से आनंद का एक स्थान रहा है. समय बीतने के साथ इसका अर्थ साँप की कुंडली भी उल्लेखित किया गया. महाभारत के अनुसार, यह तक्षक का भूमिगत क्षेत्र था, जिसने उतंक द्वारा मैदान में छोड़े गहनों पर हस्तगत करके विदर के माध्यम से उन्हें पाताल में उतार दिया. यह क्षेत्र आसानी से सुलभ नहीं था, हालांकि इसमें कुछ प्रवेश द्वार थे.

कथासरितसागर बताता है कि उनमें से एक कश्मीर में माया द्वारा बनाया गया था. एक अन्य नमुसि की गुफा थी, ऐसा माना जाता है कि कश्मीर के प्राचीन राजा रणादित्य ने चंधभागा नदी को पार करके इस गुफा में प्रवेश किया था. ऐसा माना जाता है कि उसने दैत्यों और दानवों के निवास स्थान पातालेश्वर पर संप्रभुता प्राप्त की थी. पंजाब और सिंध के निम्न भागों में पाताल की स्थिति को कुछ अन्य प्रमाणों का समर्थन मिला है. इतिहासकार अर्रियन एक समुद्री शहर पाताल का उल्लेख करते हैं जिसका मकदूनिया(मैसेडोनिया) जनरल अलेक्जेंडर ने भ्रमण किया था. सिंडा के परिवार की विभिन्न शाखाएँ जिन्होंने डेक्कन के कुछ हिस्सों पर शासन किया, कई शिलालेखों में ये दावा करते हैं कि वे सिंडा नामक परिवार के संस्थापक के वंशज है, जो सिंधु के क्षेत्र में विकसित हुए.

परंतु कुछ अन्य गणनाओं से यह लगता है कि पाताल, देश के किसी अन्य हिस्से में नहीं था. महाभारत के अनुसार, भीम को दुर्योधन द्वारा भोजन में विष देकर गंगा में फेंक दिया गया था, वे कुछ जलचरों द्वारा गहराई में जाकर पाताल में चले गए थे, जहाँ उनको नागाओं ने काट कर विषमुक्त कर दिया था. माना जाता है कि अपने तीर्थयात्रा के दौरान जब अर्जुन संध्या समय गंगाद्वार पर स्नान कर रहे थे, तब अप्सरा उलुपी उन्हें पाताल ले आई थी, जहाँ संध्या संस्कार के बाद उन्होंने नागिन के आकर्षण के आगे घुटने टेक दिए और उससे विवाह कर लिया.

इन पौराणिक कथाओं से ये प्रतीत होता है कि पाताल गंगा के पूर्व में तथा हस्तिनापुर की दूसरी ओर स्थित था और नागाओं का देश था. ऐसा भी वर्णन किया गया है कि भागीरथ की तपस्या के परिणाम स्वरूप गंगा स्वर्ग से उतरी थी और पाताल पवित्र गंगा के मुख पर स्थित था. इन वर्णनों से ऐसा प्रतीत होता है कि नागाओं का देश पाताल, गंगा के ऊपरी और निचले स्थानों पर, जल की निकट सतहों पर था. नागा असम देश में भी फैले हुए दिखाई दिए, जैसा कि मध्ययुगीन शिलालेख में उन्हें कुछ संदर्भों में देखा जा सकता है और आज भी कुछ क्षेत्रों में नागा कबीलों का अस्तित्व दिखाई देता है.

Nagas : The Tribe and The Cult (R. K. Sharma) पुस्तक का हिन्दी अनुवाद

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नागाओं का रहस्य -2 : पुराण में नागाओं का उल्लेख

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