कुमार विश्वास जैसा कुमार चाहे ‘आप’ से जुड़ा रहे, लेकिन ‘खुद’ से कभी विश्वासघात नहीं कर सकता

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AAP में नहीं होता तो भाजपा में ही होता… याद है किसी को कुमार विश्वास को पूछे गए एक इंटरव्यू में दिया गया यह जवाब?

मुझे याद है क्योंकि जब पहली बार कुमार विश्वास की कविता सुनी थी तब से मैं उनकी मुरीद हो गयी थी… उनका हर कार्यक्रम, उनका हर इंटरव्यू, उनकी गतिविधियों पर बहुत बारीक नज़र थी मेरी… विशेषकर तब जब वो AAP से जुड़ गए थे…

कहते हैं इंसान दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए वो अपनी जन्म स्थली को कभी नहीं भुलाता… लौकिक रूप से भूल भी जाए तो उसके अवचेतन मन में उसकी छवि इतनी प्रगाढ़ होती है कि जागते हुए में ना सही लेकिन स्वप्न में वो स्मृतियाँ बार बार उभर कर आती है….

कुमार विश्वास के साथ भी कुछ ऐसा ही है… एक प्रखर जोशीला मिटटी से जुड़ा युवा जिसके संस्कारों में हिंदुत्व और हिन्दुस्तान के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देने का जज़्बा हो, अपने कॉलेज के दिनों से ही जिसमें एक लीडर (सिर्फ राजनेता नहीं) बनने के गुण हो, जिसकी कविताओं में प्रेम और देश प्रेम दोनों बराबर रूप से झलकता हो… जिसमें देश के हजारों युवाओं को अपनी बातो, कविताओं से बाँध कर रखने का कौशल हो… वो आप जैसी पार्टी में रहकर भी आपका नहीं हो सकता.

जिन दिनों AAP का जन्म हो रहा था तब देश के हर दल का ध्यान उस पर गया… AAP को शुरुआत में कोई पहचान नहीं पाया और बड़े बड़े नामी गिरामी लोग उसमें शामिल हो गए… अब इतने बड़े समर्थन के साथ किसी पार्टी का उदय हो रहा हो और देश के खुफिया विभाग के कान में जूं तक नहीं रेंगे… ऐसा मुझे अव्यावहारिक सा लगता है….

अरविन्द केजरीवाल का अन्ना के आन्दोलन में प्रवेश की विदेशी एजेंटों की योजना है ये देश की ख़ुफ़िया एजेंसी जानती ही होगी… ऐसे में जैसे कोयल कौए के घोंसले में अंडा दे जाती है, वैसे ही ऐसे कई लोगों को आप के उदय के समय उसमें सम्मिलित किया जाना भी एक योजना हो सकती है.

लेकिन कौए के बच्चों का दिन भर कांव कांव करते रहना आखिर कितने दिन बर्दाश्त कर सकता था कोई… कई कोयल के कई बच्चे उड़ना सीखते ही घोंसला छोड़ कर चले गए…

लेकिन जैसे कि मैंने पहले ही कहा… जिसकी रग रग में देश के लिए समर्पण हो वो सबकुछ बर्दाश्त करता हुआ भी अपने लक्ष्य को समर्पित रहता है…

तो कुमार विश्वास का आत्मविश्वास कभी नहीं डगमगाया और उसने कौए की तरह कांव कांव नहीं किया, बल्कि चुपचाप रहना चुना ताकि कोयल की मधुर वाणी सुनकर कौए उनका कोयल होना पहचान ना जाए…

और मेरी इस आशंका को अंतिम मोहर लगाई अजित डोभाल ने, पिछले वर्ष कुमार विश्वास के जन्मदिन की पार्टी में अजित डोभाल के सम्मिलित होने की खबर आई थी तो मैं मुस्कुरा दी थी… मन में दोनों के लिए बराबर सम्मान जागा… कौन कहता है राजनीति बहुत गंदा खेल है… यदि आप में एक अच्छे खिलाड़ी के गुण, प्रतिस्पर्धा से परे केवल खेल की भावना हो तो यह एक बहुत ही अच्छा ऊर्जावान खेल है… जिसमें अलग अलग खिलाड़ी की ऊर्जा जब एक टीम के रूप में एकत्रित होती है तो परिणाम सकारात्मक ही होते हैं…

अब चूंकि राजनीति में पलटवार शुरू हो गया है, और कौए की काली करतूतें उजागर हो रही हैं, ऐसे समय में अटकलें लगाते हुए, या कभी हाँ कभी ना के अंदाज़ में खंडन मंडन करते हुए कुमार विश्वास अपनी जन्मस्थली लौट आते हैं तो कम से कम मुझे कोई अचम्भा नहीं होगा…

कुमार विश्वास भारत के वो कुमार हैं जो देश के कुमारों के लिए एक आदर्श हैं जिस पर से भारत का विश्वास कभी नहीं डगमगा सकता …. वो फ़िलवक्त चाहे जिस पार्टी में रहे, वो काम केवल अपनी माँ के लिए ही कर रहे हैं … कल को वो अपनी पसंदीदा कविता गाते सुनाई दे तो समझना वो भाजपा के लिए ही गा रहे हैं कि

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है.. मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है मैं तुझसे दूर कैसा हूँ ये मेरा दिल समझता है ये तेरा दिल समझता है…

कुमार विश्वास जैसा युवक चाहे कितने ही “आप” से जुड़े रहें लेकिन वो “खुद” से कभी अलग नहीं हो सकता… और उनका ये खुद अर्थात व्यक्तित्व, देश प्रेम, देश भक्ति और भारत के प्रति उनकी निष्ठा से सींचा हुआ है… वो धड़ से कट जाएगा लेकिन जड़ से कभी नहीं उखड़ेगा…

मेरी उपरोक्त बातों पर ‘विश्वास’ न आए तो हाल ही में रानी पद्मावती पर सुनाई उनकी वायरल कविता सुनिए, और ‘आप’ खुद तय करें… कहीं कौए के घोंसले में कोयल का अंडा तो नहीं-

– माँ जीवन शैफाली 

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