विभाजन के बाद पाकिस्तान में कदम रखते ही शुरू हो गयी थी मंटो की मौत

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सआदत हसन मंटो ने कम्युनिस्टों को हमेशा ‘ठग’ ही माना. आधुनिक हिन्दुस्तान के -सलमान रश्दी के मुताबिक़- सबसे बेहतर कथाकार मंटो ने हाशिये के लोगों पर ही कहानी लिखी जिनके वे सच्चे हमदर्द भी थे; किसी मज़हब का पक्ष लिए बगैर लिखने के लिए उन्हीं कम्युनिस्टों द्वारा मुफलिसी में धकेले गए जो कोम्युनिस्ट बोलने की आजादी के नाम पर अपनी रोटियाँ सेंकते थे.

मंटो ने लिखा था, “मुझे तथाकथित कम्युनिस्ट जबरदस्त नापसंद हैं. मैं उन लोगों की सराहना नहीं कर सकता जो आरामकुर्सी में धंस कर हंसिए-हथौड़े की बात करते हैं. हो सकता है कि कामकाजी मज़दूरों के पसीने का इस्तेमाल कर के पैसा बनाने वाले और इसे स्याही बनाकर लंबे मैनिफेस्टो लिखने वाले गंभीर लोग हों. मुझे माफ करेंगे, लेकिन मैं उन्हें ठग मानता हूं.’’

मंटो ने कोम्युनिस्ट-प्रोग्रेसिव-लेखकों के पाखण्ड पर लिखा था, : “ये नीमहकीम किसी काम के नहीं हैं, जो क्रेमलिन के नुस्खे का इस्तेमाल कर के साहित्य और राजनीति का अचार बना रहे हैं.”

बकौल अहमद राही, मंटो की मौत विभाजन के बाद पाकिस्तान में कदम रखते ही शुरू हो गयी थी. ‘ठंढा गोश्त’, ‘खोल दो’, और ‘टोबा टेक सिंह’ जैसी कई मर्मस्पर्शी कहानियां लिखने वाले इस बेख़ौफ़, बेबाक, और बेहतरीन कहानीकार को आज उनकी पुण्यतिथि पर शत शत नमन!

(सन्दर्भ : (१) मंटो द्वारा लिखित निबंध ““गुनाह की बेटियाँ, गुनाह के बाप”, (२) मंटो की “जेब-ए-कफ़न”, (३) आशीष शर्मा का “Why it is trendy to read Manto again”, (४) सरमद सहबाई की “Why was Manto considered threat to the progressive” )

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