कहानी कश्मीर की : मंदिर न बचा पाने के दुःख में जब महंत ने की आत्महत्या

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SRINIGAR KASHMIR INDIA martand Temple

कश्मीर नाम की उत्पत्ति ‘केशर’ शब्द से होती है, मात्र केशर की खेती ही नहीं, केशर के केसरिया (भगवा) रंग से कश्मीर का पुरातन सम्बन्ध है.

आज कश्मीर का नाम सुनते ही मन में आतंकवाद, अलगाववाद, सेना, पाकिस्तान, धारा 370 जैसे विचार उमड़ पड़ते हैं न कि श्री श्री शंकराचार्य द्वारा स्थापित “शारदा पीठ” की. कुछ दोगले लोगों को वहां रह रहे घुसपैठियों पर पेलेट बन्दूक चलाने पर कष्ट होता है, किसी को कश्मीर के मूलनिवासी कश्मीरी हिंदुओं को जिंदा जलाकर, बलात्कार करके, मस्जिदों से कश्मीर से चले जाने के फरमान को लेकर कुंठा होती है. इसके आगे संभवतः कम व्यक्ति ही कश्मीर को जानते होंगे.

कश्मीर का इतिहास महाभारत काल से भी प्राचीन है. इसका इतिहास नीलमत पुराण (ऋषि कश्यप के पुत्र नील) से आरम्भ होता है, ऋषि वैशमपायेन (ऋषि वेद व्यास के शिष्य) और महाराज जन्मेजय (अर्जुन के पड़पौत्र/परीक्षित के पुत्र) के संवाद से. जिसमें राजन पूछते हैं कि महाभारत में कश्मीर की सेना क्यों नही थी?

उत्तर मिलता है क्योंकि राजा नाबालिक थे और उन्हें धर्म/अधर्म का ज्ञान नहीं था. कश्मीर के राजा गौनंद थे जो महाकाल वरदानित जरासंध के रिश्तेदार थे, जिन्होंने श्री कृष्ण को चुनौती दी, पर बलराम द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुए. उनके भाई दामोदर राजा बने और पुनः अपने भाई की मृत्यु के प्रतिशोध लेने के अहंकार में गंधार जाते समय युद्ध में श्री कृष्ण से मृत्यु को प्राप्त हुए. उनकी विधवा महारानी यशोमति, विश्व की पहली शासन करने वाली महारानी बनी जिन्होंने पुत्र गौनंद द्वितीय को जन्म दिया, जो महाभारत के समय बालक थे.

काशी जो भारत की शिक्षा का केंद्र/राजधानी माना जाता रहा है, वहां से शिक्षा लेने के उपरांत उच्च शिक्षा के लिए कश्मीर जाया जाता था, आज भी शारदा प्रदेश (कश्मीर) की दिशा में कुछ कदम चलने की परंपरा है.

विश्व का सबसे पुराना पंचांग (कैलेंडर) सप्तऋषि पंचांग है जो कश्मीर में आज भी कुछ बचे हुए हिन्दू प्रयोग करते हैं जिसका वर्तमान वर्ष 5094 वां वर्ष है.

शारदा पीठ से ही आदि शंकर, शंकराचार्य बनकर लौटे थे. एक स्तुति है – “नमस्तुते माँ शारदा, कश्मीरपुरवासिनी.”
अगर कश्मीर के शास्त्रों की बात करें तो भरतमुनि के “नाट्यशास्त्र” को वेदों के समक्ष माना जाता है और पांचवे वेद की उपाधि दी जाती है. नाट्यशास्त्र को अभिनवगुप्त के लिखित ग्रन्थ (जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है) “अभिनव भारती” को समझे बिना आज से युग में लगभग असंभव है. जो विश्व के 80 से ज्यादा विश्वविद्यालयों (एक भी भारतीय नही) में पढ़ाया जाता है.

भारतीय संगीत (हिंदुस्तानी और कर्णाटक दोनों) के पिता शारंगदेव के उनके गृह के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने उत्तर दिया था – “अस्ति स्वस्तिगृहम कुलवंशम, ‘श्रीमद’कश्मीर संभवम.”

बौद्ध पंथ की द्वितीय सभा भी कश्मीर में हुई थी जहाँ से ‘महायान बौद्ध’ परंपरा ने जन्म लिया और चीन, जापान, कोरिया तक गया.

क्या आप जानते हैं महान चक्रवर्ती सम्राट ललितादित्य के बारे में? जिन्हीने 7-8 वीं सदी में राज किया (जब इस्लाम विश्वभर में फ़ैल रहा था), जिनका राज्य (अशोक से भी बड़ा) उत्तर में कैस्पियन सागर, दक्षिण में कावेरी, पूर्व में असम और पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान सीमा तक था.

“राजतरंगिनि” नामक ग्रंथानुसार कश्मीर में इस्लाम 1339 में आया, जब शाहमीर के कुछ मुस्लिमों ने राजा उदययंदेव की शरण ली, धर्मानुसार उन्होंने शरणार्थी बनाया गया; भूमि, संपत्ति आदि दी गयी. यह राजा ‘स्वाथ’ नामक जगह से थे जो कश्मीर का हिस्सा था और आज वहां से तहरीक_ए_तालिबान का संचालन होता है.

यह वही स्वाथ है जहाँ ऋषि पाणिनि का जन्म हुआ था, जो भाषा विज्ञान, व्याकरण के जनक हैं. कुछ समय उपरांत, धोखे से राजा उदययंदेव को मरवाकर शाहमीर ने गद्दी हासिल कर ली. और विधिवद उसका वैदिक मंत्रोच्चार के साथ राज तिलक हुआ.

1450 तक इस वंश ने राज किया और विधिवद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ राजतिलक होते रहे, संस्कृत राजदरबार की भाषा बनी रही. 1450 में जैन उल्ला बिन (बड शाह) ने ही “राजतरंगिनि” नामक इतिहास ग्रन्थ लिखवाया था, जिसमें धर्मान्तरण, मंदिर तोड़ने, मारकाट के ढेरों उदाहरण हैं. उसके बाद उसने सूफी संत बुलबुल शाह के आदेशानुसार राजतिलक और संस्कृत पर पाबंदी लगा दी.

बड़ शाह को महान शासक का दर्जा मात्र इसलिए मिला क्योंकि वह अपने पिता सिकंदर शाह से कम क्रूर था. सिकंदर शाह ने हजारों मंदिर तुड़वाए, और धर्मान्तरण करवाए. मुल्तान जो कभी मार्तण्ड (सूर्य मंदिर) के लिए प्रसिद्ध था और जिसकी भव्यता अनंत थी उसको तोड़ने के असफल प्रयास 6 माह तक चलते रहे, ठोस पत्थर टूटा नहीं तो लाखों एकड़ जंगल की लकड़ियाँ मंदिर में रखकर जलाई गयीं जो महीनो जलती रहीं. पत्थर चटका फिर भी नहीं टूटा. परंतु लगातार प्रयासों से उसे खंडर बना ही दिया गया.

तेहरान विश्वविद्यालय के लेखागार (archives) में रखीं दो पुस्तकों ( तौफुल_तब_एहबाब और बेहरिस्तान_ए_शाही ) का भाषान्तरण काशीनाथ पंडित ने किया जो कश्मीर के बर्बर इस्लामिक इतिहास की गवाह है. जिनमें एक प्रसंग है, शमशुद्दीन अराकी जब लश्कर के साथ धर्मान्तरण करवाने निकलता था तो आश्चर्यचकित हो जाता था.

धर्मान्तरण करवाता, पुनः गांव में आता तो सभी वापस सनातन धर्मी मिलते. किसी ने बताया इनकी महिलाएं ही इनका आधार हैं ये धर्मग्रंथ अपने पोशाक में छुपा लेती हैं और इनके धर्म में सारे पाप माफ़ हैं सिवाय एक के गौमांस भक्षण जिसकी क्षमा भगवान भी नहीं देते. इसके बाद शमशुद्दीन, गांव के पुरुषों को बुलाया करता, उनसे गाय लाने को कहता, उन्ही से कटवाकर उनकी महिलाओं से गौमांस पकवाया करता था.

इन्हीं आक्रमणों के चलते ‘गणेश दत्त कौल’ जो शारदा पीठ के महंत थे, जब मंदिर नहीं बचा पाए और सभी धर्मरक्षक मारे गए तो उन्होंने मंदिर की शिखा पर चढ़कर आत्महत्या कर ली. जिनकी 14वीं पीढ़ी के वंशज प्रोफेसर फारूक नाज़की इस बात की पुष्टि करते हैं और शारदापीठ से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. आज उस स्थान का नाम ‘बकत ए सुलेमान’ है. “विचारनाग” वो स्थान जहाँ सप्तऋषि पंचाग और अन्य ग्रंथों के लिए विद्वान् इकट्ठे होकर शास्त्रार्थ करते थे उसका नाम ‘फिरदौस’ है. गौकदल का नाम मदीना चौक है.

भारत के संविधान के अनुसार 99% मुस्लमान, कश्मीर में अल्पसंख्यक हैं. कश्मीर के संविधान बनने (1956) के बाद एक भी संशोधन नही हुआ जबकि भारत के 65 वर्षों के संविधान में 100 से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं. आंबेडकर जी ने धारा 370 का विरोध किया था, जिनके अनुयायी इस पर अपना कभी मुंह नही खोलते हैं. 1339 में कश्मीरी हिंदुओं का पहला पलायन हुआ था और 1990 तक कम से कम 20 बार कश्मीरी हिन्दुओं का पलायन हो चुका है.

अरुंधति रॉय जैसी लेखिका को कश्मीर पर पाकिस्तान का खुला समर्थन करती है क्या उसको यह इतिहास नही पता? जिसे विश्वभर के ‘अवार्ड’ मिले हों, बरखा, रविश जैसे पत्रकार यह क्यों नही दिखाते? जो लोग यह नारे देते हैं “कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी, इंशाल्लाह-इंशाल्लाह” उनको यह समझ लेना चाहिए यह सत्य है पर जब तक हम पाकिस्तान से अपना कश्मीर नही ले लेते तब तक.

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