सुभाष जन्मोत्सव 1 : ‘महात्मा’ के चोले में छिपे राजनीतिज्ञ गांधी को बेनक़ाब कर गए नेता जी

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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस! एक नाम, एक शख्सियत, 72 साल से दुनिया के पटल से अदृश्य होने के बाद आज भी, रगों में खून दौड़ा देता है.

क्यों भारत नेता जी को नही भूल पाता? क्यों आज भी भारत की जनता 18 मई 1945 को हुई हवाई जहाज दुर्घटना में नेता जी के मरने की बात पर यकीन नहीं कर पाती है?

क्या है ? क्यों है ऐसा कि आज़ादी के नायको में केवल नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही हम लोगो में जिन्दा रहते है?

कुछ तो बात है… यदि 2017 में भारत की जनता में यह बात है तो फिर कल्पना कर लें कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस किस हद तक 1930 से 1945 तक भारत की जनता के दिल में घर कर चुके थे.

बस यही जड़ है!

सुभाष चन्द्र बोस द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से पहले ही भारत की राजनैतिक धारा से सुदूर चले गए थे. वो उस सबको छोड़ के चले गए थे जो गांधी व कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार से मेल खाता था.

अब चलते है उस वास्तविकता पर जिस को लेकर सब अंधेर किये हुए है.

आगे कुछ भी लिखूं, पहले यह जान लीजिये मुझे दो दशको से केवल शक था लेकिन अब मुझे पूरा यकीन है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के असली सच को, एक भारी अंतराष्ट्रीय षड्यंत्र के तहत दफ़न कर दिया गया था.

इसकी सूत्रधार और लाभार्थी कांग्रेस थी. मैं केवल नेहरू का नाम इसलिए नहीं ले रहा हूँ, क्योंकि इस में गांधी के साथ कांग्रेस के शीर्ष के सभी नेता शामिल थे.

चलिए एक-एक कर के नेता जी के, माफ़ कीजियेगा यहाँ मुलायम सिंह से मतलब नहीं है, भारत की राजनीति से गायब होने को देखते है.

बचपन से किताबों में, स्कूल में और खद्दरधारी बुजर्गो ने बताया था कि 18 मई 1945 को मंचूरिया, आज का ताईवान, में हुई हवाई जहाज दुर्घटना में नेता जी मर गए थे और उनका दाह संस्कार कर दिया गया था. उनका अस्थि कलश रेनकोजी टेम्पल में रखा हुआ है.

उस अस्थि कलश को भारत सरकार ने कभी भारत लाने का कभी कोई प्रयास नहीं किया.

क्यों? क्या उन्हें मालूम था कि वो उनका अस्थि कलश नहीं है या फिर नेता जी के नाम पर पहुंचा हुआ अस्थि कलश देश में एक नया भूचाल ला देगा?

जवाहर लाल नेहरू 1957 में उस रेनकोजी टेम्पल गए थे और नेता जी सुभाष चन्द्र को श्रद्धांजलि अर्पित की थी. डॉ राजेंद्र प्रसाद 1958 में गए थे और इंदिरा गांधी 1969 में गयी थी, लेकिन किसी ने उस कलश को भारत लाने की जरुरत नहीं समझी.

क्यों?

इसके अलावा अटल बिहारी बाजपेयी जब जनता सरकार में विदेश मंत्री थे तब गए थे और फिर जब प्रधानमंत्री बने तब 2001 में गए थे, लेकिन उस अस्थि कलश को भारत लाने को किसी को भी ललक नहीं थी.

क्यों ऐसा था?

क्योंकि 18 मई 1945 को नेता जी सुभाष चन्द्र की मृत्यु हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी.

यह इन सबको मालूम था.

यहाँ यह बताता चलूं, नेहरू की सरकार ने शाहनवाज़ कमेटी का गठन किया था जिसको नेता जी की मृत्यु का अन्वेषण करना था.

नेता जी की मृत्यु पर संदेह और भारत के सरकार के आधिकारिक रूप से उन्हें उस हवाई दुर्घटना में मारे जाने पर लोगों को अविश्वास हो गया था इसलिए नेहरू ने इसका गठन किया था.

इस शाहनवाज़ कमेटी का सबसे मजेदार पहलू यह था कि इनका 4 सदस्यीय दल 1956 में जापान, नेता जी की मृत्यु की खोज बीन के लिए गया लेकिन इन लोगों ने ताईवान सरकार से इस खोज में सहायता की कोई अपील और दरखास्त नहीं दी.

18 मई 1945 में तथाकथित हवाई दुर्घटना ताइपेई, ताईवान में हुयी थी. तब की नेहरू की भारत सरकार ने अपनी बड़ी बेचारगी दिखाई थी कि भारत के ताईवान से राजनयिक सम्बन्ध नहीं है इसलिए उनसे सहायता नहीं मांग सकते थे.

शाहनवाज़ कमेटी में 3 सदस्य थे… खुद शाहनवाज़, जो कि इंडियन नेशनल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल थे और इस कमेटी के गठन के वक्त सांसद थे, एस एन मित्रा जो कि ICS थे और सुरेश चन्द्र बोस, जो कि नेता जी के बड़े भाई थे.

पहले दो ने नेता जी के हवाई दुर्घटना में मरने को सही माना लेकिन सुरेश चन्द्र बोस ने इसका विरोध किया और उस समय यह इल्जाम लगाया –

Committee had been directed by Jawaharlal Nehru to infer death by plane crash, and that the other committee members, along with Bengals chief minister B. C. Roy, had pressured him bluntly to sign the conclusions of their final report.

चलो मान लिया शाहनवाज़ कमेटी, फिर भी जनता नही मानी, उसके बाद शाहनवाज़ कमेटी के तर्ज पर नेता जी की मृत्यु पर खोसला कमीशन का गठन इंदिरा गांधी ने किया.

1974 में इस कमीशन ने रिपोर्ट दी और शाहनवाज़ कमेटी के परिणामों को सही मानते हुए 18 मई 1945 को हवाई दुर्घटना में मारे जाने को सही माना.

चलो सभी सच बोल रहे थे लेकिन फिर भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी नेता जी की मौत को लेकर सुगबुगाहट थी.

अब बना 1999 में मुखर्जी कमीशन जिसके अध्यक्ष थे सुप्रीम कोर्ट के जज एम के मुखर्जी. इस कमीशन ने रूस, जापान और ताईवान का दौरा किया और 2005 में रिपोर्ट दी, जो विस्फोटक थी.

इस कमीशन ने अपनी तरफ से ताइवान सरकार से सहयोग माँगा और ताईवान सरकार ने आधिकारिक रूप से उनको बताया कि 18 मई 1945 को कोई भी हवाई दुर्घटना नहीं हुई थी और किसी तरह की कोई भी लॉग रिपोर्ट ऐसी नहीं है जो इस तारीख में उनके यहाँ किसी भी हवाई दुर्घटना को दर्ज करती है.

कमीशन ने इस हवाई दुर्घटना को एक कहानी बताई जिसकी आड़ में नेता जी रूस को पलायन कर गए और इस पलायन की जानकारी तत्कालीन जापानी और रूस सरकार को थी. इसके आलावा इस कमीशन के पास रुसी सेना के एक पूर्व जर्नल का एक एफिडेविट था जिसने कहा था कि उसने सुभाष चन्द्र बोस को उनकी तथाकथित मृत्यु के एक साल के बाद देखा था.

A former Russian General swore under oath to the commission, that he had seen a true Soviet-cabinet paper detailing and discussing a living Subhash Chandra Bose, one year after his supposed death.

यह क्या माजरा है?

शाह नवाज़ कमेटी… खोसला कमीशन… ने कैसे बिना ताईवान से पुष्टि किये कह दिया कि 18 मई 1945 को हवाई दुर्घटना हुई थी?

इतना ही नही, मुखर्जी कमीशन ने यह भी बताया कि रेनकोजी टेम्पल में रखे गए अस्थि कलश नेता जी के न हो कर एक ताइवानी सैनिक इचिरो ओकुरा के हैं, जिसकी मृत्यु अगस्त 1945 में हुई थी.

अब सबसे बढ़िया खबर… 2006 में इस रिपोर्ट को भारत की संसद में रखा जाता है और भारत की तत्कालीन कांग्रेस नीत यूपीए सरकार इस रिपोर्ट को बिना कोई कारण बताये अस्वीकार कर देती है और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत पर उठे सवालों को दफ़न कर दिया जाता है.

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित मौत का यह सिर्फ एक पहलू है और बहुत कुछ है कहने को है लेकिन वह सब अगले भागों में.

क्रमश: 2

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