आपस के इस अटूट रिश्ते से बनी ये हिन्दुस्तानी फौज

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सेना के जवान की उस मूर्ति को नमन कर के ही फील्ड मार्शल करिअप्पा अपने दिन की शुरुआत करते थे जिसे हमेशा उन्होंने अपने पिता की तस्वीर के बगल में रखा.

सैन्य-जवानों और सैन्य-अधिकारियों के बीच अटूट रिश्ते की मिसाल है भारतीय सेना. सन पैंसठ युद्ध में रिटायर्ड करिअप्पा के बेटे स्क्वाड्रन लीडर नन्दा पाकिस्तान में पकडे गए; तब उन्हें विशेष सुविधा, भारतीय युद्ध बंदी-जवानों से अलग रखने, और शीघ्र रिहा करने का प्रस्ताव जब पाकिस्तानी सैन्य-अधिकारी अयूब ने, ब्रिटिश जमाने की मित्रतावश, करिअप्पा को भेजा – तो करिअप्पा का जवाब था, “धन्यवाद ! लेकिन सारे जवान मेरे बेटे हैं, मैं अपने अफसर बेटे के लिए कोई वैसी सुविधा नहीं चाहूँगा जो शेष सारे जवानों के लिए सुनिश्चित न हो सके; और या तो आप सब को रिहा करें या किसी को नहीं.”

कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टेन बत्रा अपने सूबेदार साथी के आगे ये कहते ढाल बन कर खड़े हो गए, “तू हट, तू तो बाल-बच्चेदार है.” पाकिस्तानी कबाइलियों से युद्ध में मेजर सोमनाथ अपने जवानों के मशीनगन में कारतूस भर कर उनकी मदद करते वक्त शहीद हुए.

कश्मीर में आतंकियों से लड़ाई में लेफ्टिनेंट नवदीप ने एक जवान को बचाते हुए जान दे दी. सन बासठ युद्ध में मेजर शैतान सिंह शहीद हुए तो उनके साथ अपने हाथों में बम लिए कई जवान भी शहीद पाए गए थे, हाथों में ‘मेडिकल किट’ लिए सेना का अर्दली भी शहीद पाया गया था.

आपस के इस अटूट रिश्ते से बनी ये वो हिन्दुस्तानी फौज है जिसमें दरार नहीं डाली जा सकती, लाल बुद्धिजीवियों का गिरोह चाहे लाख कोशिश कर ले. ये हिन्दुस्तानी सेना है भाई, न टूटती है न झुकती है! ‘सैल्यूट टू इंडियन फ़ोर्स’! जय हिन्द!

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