स्पष्ट शब्दों में कहें तो तुम महामूर्ख हो

तीस के दशक में स्पेन में गृहयुद्ध छिड़ गया… इस गृहयुद्ध में दो धड़े थे. पहले रिपब्लिकन यानी राष्ट्रवादी और दूसरे फासीवादी… दोनों तरफ से जबर्दस्त मारा मारी हुई.

पूरे स्पेन में रिपब्लिकनों को फासीवादियों ने खोज-खोज के मौत के घाट उतार दिया… कई बार तो ऐसा हुआ कि पहले व्यापक संख्या में रिपब्लिकनों को एकत्रित किया जाता इसके बाद लेबर कैम्पों में इन्हें पीड़ादायक यातनायें दी जातीं…

इसके बाद लाइन में खड़ा कर सर में गोली मार दी जाती… फिर सामूहिक कब्रों में एक साथ इन्हें दफना दिया जाता… 1936 में छिड़े इस गृहयुद्ध के कई साल बाद स्पेन में रिपब्लिकनों की सामूहिक कब्र का पता चला…

कुछ दिन पहले ममता बनर्जी ने मोदी सरकार को फासीवादी बताया था… फासीवादी यानी मुसोलिनी की विचारधारा से प्रेरित… ममता बनर्जी को या तो फासीवाद का अर्थ नहीं पता या तो उसका अर्थ वो जानना नहीं चाहती…

असल में ये एक भयानक सच्चाई है कि भारत में साम्यवाद का लाल झंडा उठाए नवयुवकों और नक्सली बने आदिवासियों से आप पूछ लीजिये कि फासीवाद, साम्यवाद क्या है? लेनिन, मार्क्स, माओ, स्टालिन कौन थे? तो वो आपको साम्यवाद की ABCD भी ना बता पाएं…

याद कीजिये आज से करीब 20 साल पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब वामपंथियों ने अटल जी को छिपा हुआ फासिस्ट बताया था और कहा था कि अगर वाजपेयी पीएम बने तो इस मुल्क में अल्पसंख्यकों का जीना मुश्किल हो जाएगा…

इसके बाद जब 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे तब भी वामपंथियों ने इसका विरोध किया और कहा कि गुजरात के फासीवादी माहौल को पूरे देश पर थोपा जा रहा है…

इन्होने तब भी फासीवाद की व्याख्या नहीं की… वाग्विलास की पराकाष्ठा देखिये कि जिस मुसोलिनी ने फासीवाद की नींव रखी वो खुद पहले एक कम्युनिस्ट ही था… यानी फासीवाद खुद साम्यवाद के लाल झंडे से निकला है…

आप मुसोलिनी को लेनिन-माओ और स्टालिन-मार्क्स से अलग कैसे देख सकते हैं?फासीवाद और साम्यवाद दोनों में ही एक व्यक्ति की सत्ता होती है… दोनों में ही वर्गीय नर संहार के लिए अनुमति है…

इसी को आधार बनाकर माओ ने चीन में और स्टालिन ने रूस में करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया… उनकी श्रद्धा एक वाक्य में थी कि ‘कुछ समूहों को जीने का अधिकार नहीं है, चाहे वो बच्चे हों, बूढ़े हों, औरतें हों, या नवयुवक हों…’

क्योंकि वो उस वर्ग से घृणा करते थे… मार्क्स के शिष्य लेनिन ने रुसी किसानों की एक पूरी आबादी को इसी वर्ग संघर्ष के कारण मौत के घाट उतार दिया…

ठीक इसी तरह फासिस्ट हिटलर ने यहूदियों को गन्दी नस्ल का कह कर 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया…

आज से कोई 6 साल पहले बंगाल के मालिकडंगा गाँव में सामूहिक कब्र का पता चला… पड़ताल करने पर पता चला कि अपने 34 साल के शासन में कम्युनिस्टों में बंगाल में 20 हज़ार राजनीतिक हत्याएं की थी…

इसमें से ज्यादातर हत्याएं तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की हुई थी, लेकिन इस घटना को छिपाने के लिए कम्युनिस्टों ने ममता बनर्जी को ही फासीवादी कहना शुरू कर दिया …

यानी कम्युनिस्टों की नजर में हर वो इंसान फासीवादी है जो साम्यवाद का विरोध करे… कभी ये वाजपेयी को फासीवादी कहते हैं, तो कभी मोदी को, तो कभी ममता बनर्जी को…

यानी साम्यवादी खुद भ्रमित है कि वो किसे फासीवादी कहें? आप खुद सोचिये बंगाल की तुलना में गुजरात का शासन कैसा था जहाँ 2002 मे हुए दंगों में 1015 लोगों के मरने की पुष्टि हुई जबकि अकेले बंगाल में पिछले तीस सालों में 29000 लोगों की हत्या राजनीतिक षड्यंत्र में हुई… बताइए फासीवादी कौन है?

और एक बड़ा प्रश्न कि क्या मोदी भी मुसोलिनी की तरह फासीवादी हैं? लाल ध्वजवाहकों की सरकारें विश्व में जहाँ भी रही हों, चाहे वियतनाम को लें या फिर चीन रूस या फिर स्पेन… हर जगह वामपंथ का इतिहास मासूमों के बेगुनाह खून से रंगा है…

और जो वामपंथी फासीवाद को अपना दुश्मन मानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि फासीवाद और साम्यवाद एक दूसरे के पूरक हैं. इनका सम्बन्ध आत्मा और शरीर जैसा है.

तो ऐ लाल झंडे का डंडा उठाए लाल लंगूरों सुनो… जब साम्यवाद, फासीवाद, मार्क्स, लेनिन, माओ, सोवियत संघ, चीन, वियतनाम और स्पेन जैसे देशों का इतिहास ना मालूम रहा करे तो JNU में बैठकर तुम्हे इंडिया गो बैक के नारे लगाने का और मोदी को फासीवादी कहने का कोई अधिकार नहीं…

या तो इतिहास पढ़ लो या फिर बकवास करना बंद कर दो… और अंत में स्पष्ट शब्दों में कहें तो तुम महामूर्ख हो.

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