महाउर लोक उत्सव के रंग

सजग भारतीय सेवा समिति द्वारा आयोजित महाउर 111 के प्रथम पड़ाव रंगयात्रा में दिनांक 15/01/2017 ग्यारहवें दिन इंद्रवती लोक कला ग्राम में लोक उत्सव के रूप में संपन्न हुआ.

लोक उत्सव में फगुआ, काली नृत्य, कोलदहका, भगत सहित यादवों के बिरहा और अहिराई नृत्य का प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शन के दौरान अंगराग नाट्य समिति, लकोड़ा के लोक कला दल एवं सैकड़ों की संख्या में रंग्दार्श्क उपस्थित रहे.

कोलदहका नृत्य आदिम जाति कोल का अपना जातीय लोक नृत्य रूप है. अन्य नृत्यों की तरह इस नृत्य रूप को देश की अन्य जातियां नहीं करती और न ही इससे मिलता–जुलता रूप किसी लोकनृत्य शैली में देखने को मिलता है.

बघेलखंड में पायी जाने वाली कोल जाति के नाम पर ही इस इस नृत्य का नाम कोलदहका पडा है. कोल जाति के लोग कोलदह्का के अलावा अन्य नृत्य या गायन शैली के संवाहक है जैसे कि कोलन्हयी, कोलदादर, भगत आदि आदि.

इस जाति के लोग बघेलखंड के कई क्षेत्रो में बहुतायत मात्रा में पायी जाती हैं और इस नृत्य को पारम्परिक रूप में प्रस्तुत करती हैं. कोल जाति जो उत्तरप्रदेश राज्य में पायी जाती है वो भी अपनी जातीय लोक नृत्य रूप की प्रस्तुती देती है लेकिन वो बघेलखंड के लोक कलारूपो से कहीं अलग है.

कोलदहका शब्द जैसे ही कानो में पड़ता है तो हमारा ध्यान देश की एक प्रमुख और पुरातन जाति ‘ कोल ‘ पर जा टिकता है. मध्यप्रदेश के बघेलखंड में कोलो के राजवंशीय प्रमाण मिलते है. उनका अपना ऐतिहासिक महत्व व प्रचुर मात्रा में लोक साहित्य है बघेलखंड क्षेत्र में गोंड जनजाति समूह के बाद कोलो का समुचित लोक साहित्य है.

कोल जनजाति द्वारा कोलादहका नृत्य कोलदहका नृत्य आदिम जाति कोल का अपना जातीय लोक नृत्य रूप है. अन्य नृत्यों की तरह इस नृत्य रूप को देश की अन्य जातियां नहीं करती और न ही इससे मिलता –जुलता रूप किसी लोकनृत्य शैली में देखने को मिलता है.

बघेलखंड में पायी जाने वाली कोल जाति के नाम पर ही इस इस नृत्य का नाम कोलदहका पडा है. कोल जाति के लोग कोलदह्का के अलावा अन्य नृत्य या गायन शैली के संवाहक हैं. मध्यप्रदेश राज्य में प्रचुर मात्रा में निवास करने वाली जनजाति कोल का प्रमुख नृत्य कोलदह्का है साथ ही साथ इस जाति के अन्य नृत्य एवं मौखिक परम्पराओं के लोक कलारूप हैं जो निम्न लिखित हैं –कोलन्हइ, भगत, फाग, मन्त्र गीत, संस्कार गीत, ददरिया, टप्पा, मलेलबा, जवारा, कबीर, मृत्यु गीत, कोलदादर , काली नृत्य , केहरा नृत्य आदि.

कोल आदिवासियों द्वारा किया जाने वाला यह महिला पुरुष का समवेत लोक नृत्य है जो कोल जाति के तमाम मौखिक, प्रदर्शनिक पक्ष में से सबसे प्रधान और कोल जाति की विशेषता प्रकट करने वाला नृत्य है. इसके आलावा भी कोल जाति के लोग अन्य जातीय लोक कलारूपो का प्रदर्शन करते हैं परन्तु कोलदह्का की मंचीय प्रस्तुती और इसका कोल जनजीवन से सहज ही जुड़ाव कोल जाति का प्राचीनतम इतिहास और प्रकृति के प्रति इनके अथाह प्रेम को प्रकट करता है.

महाउर रंगयात्रा का यह तीसरा वर्ष है, 2015 से चल रही रंगयात्रा के तीसरे सोपान में कुल 55 अलग-अलग प्रदर्शन स्थलों पर एकल नाटको, मूकाभिनय एवम् किस्सा गोई का प्रदर्शन अगले 40 दिनों तक होना है. पिछले वर्षो में बिट्टी सीधी के आयोजन में हम रंगयात्रा के माध्यम से 25000 रंगदर्शकों तक पहुंचे थे. जिनमे उम्र के तीनो पड़ावों के लोग शामिल रहे. इस वर्ष हमारा उद्देश्य 100000 दर्शकों तक पहुँचाना है.

  • नरेंद्र सिंह (सिधी)

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