कहिये!!

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बात है तबकि, जब नायक कर रहा था तैयारी अपने फाइनल एग्जाम की, इसलिए घर पर ही रहता था उन दिनों. वैसे भी लड़के आवारा पंछी ही होते हैं अपने घोंसले रात को ही याद आते है, वर्ना दिन तो भटकते ही गुजरता है …

तो एक दिन यूँ ही बरसात होते में ध्यान गया कि पड़ोस की बालकनी पर एक नया चेहरा उसको देख रहा था, जैसे ही उसने उस तरफ देखा, वो चली गयी. हमारा नायक शक्ल सूरत से माशा अल्लाह खूब है, इकहरा बदन, गोरा चिट्टा, अपने स्कूटर पर धूप का चश्मा पहन के निकले तो लड़कियां आह भरें, ऐसा.

और नायिका, सांवली सलोनी, थोड़ी ठीक वजन वाली, और नायक की निगाह में बहुत सुन्दर. तो साहब, नायक ने पता किया तो पता चला कि एक नया किरायेदार आया है उस घर में कुछ वक़्त को. तो साहब उस दिन से शुरू हुई आँख मिचौली, दोनों कनखियों से देखते एक दूसरे को, इन्तजार करते कब आँखे भर के देख सकें. वो उसके बालकनी के दरवाजे की आवाज पहचानने लगा और वो उसके स्कूटर की आवाज.

ये वो वक़्त था जब मोबाइल तो छोडो लैंड लाइन फ़ोन भी मोहल्ले में दो चार ही हुआ करते थे. खूब कटने लगे दिन यूँ ही, मुहब्बत के सुरूर में. वो अपने घर की छत पर वक़्त गुजारने लगा, वो अपने सब काम बालकनी पर उठा लाती, वो तेज आवाज में गजलें बजाता और वो पड़ोस के छोटे बच्चों को गोद में उठा उनसे तेज आवाज में सरगोशियाँ करती. यूँ ही चढ़ता रहा परवान ये खामोश प्यार महीनों तक. दोनों को पता था कि अब उनके दिल जुड़ चुके हैं, बिन देखे तड़पते थे दोनों जल बिन मछली की तरह, पर इजहार ए मुहब्बत ना हुआ अब तक.

खैर, वो वक़्त भी आया और क्या खूब आया.. एक दिन जब हमारा नायक छत पर धूप सेक रहा था तो देखा कि उसकी मम्मी और भाई कहीं जाने को निकल लिए, और वो अकेली घर पर, ऐसा होता नहीं था कभी, बहुत देर जद्दो जहद के बाद आखिर हिम्मत जुटा के, कांपते पैरों और छाती से बाहर आते दिल के साथ आखिर चल पड़ा हमारा नायक उसके घर की ओर.

चार कदम का फासला था और नायक चल दिया इजहार ए मुहब्बत को, मन मन भर के पैर रखते हुए, सीढियां चढ़ी, बेल बजाई और कर रहा इन्तजार …… …आखिर दरवाजा खुला…. नायिका ने खोला और सामने अचानक उसको देख कर रह गई स्तब्ध ! अवाक् ! खड़े रहे कुछ देर यूँ ही चुप चाप, नायक जो लाया था मन में बना कर भूमिका, सब बह गई …. आखिर नायिका बोली कहिये!!!!!… बस, बिखर गई किरचें, टूट गया शीशा ए दिल, हाये ये क्या कह डाला, इत्ते दिनों की मुहब्बत को इस कहिये ने दूर कर डाला.

अरी पगली जरा प्यार से बोलो बोल देती, ये औपचारिक कहिये ?… खैर वो फिर बोली जो कहना है जल्दी कहिये नहीं तो मम्मी और भैया आ जायेंगे, पर उड़ चुके थे होश उस बदनसीब के, जैसे तैसे बोला कुछ कहने की जरुरत है? कुछ क्षण झाँका उसकी आँखों में और चला आया वापस, सिकंदर जो दुनिया फतह करने निकला था, पहली ही जंग हार गया…

कुल जमा 3 मिनट का वाकया है ये पर जैसे फासला तीन सदियों का तय हुआ …. वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह उसके मेरे दरमियाँ का फासला अपनी जगह ….

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