शास्त्रीजी के हत्यारे कौन? ताशकंद वार्ता की कवरेज के लिए रूस गए वरिष्ठ पत्रकार का सवाल

  • मनमोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के निधन को हालांकि कई दशक गुजर चुके हैं मगर उनकी मृत्यु आज भी रहस्यमयी बनी हुई है. यह निश्चित है कि वह स्वभाविक मौत से नहीं मरे थे बल्कि उनकी सुनियोजित ढंग से हत्या की गई है. उनके हत्यारे कौन थे इसके बारे में दावे से कुछ कहना कठिन है.

स्व. लालबहादुर शास्त्री की हत्या के प्रकरण की चर्चा करने से पूर्व उन परिस्थितियों का उल्लेख करना जरूरी है जिनके कारण उनकी राजनीतिक हत्या की गई थी.

पंडित जवाहरलाल नेहरु के जीवनकाल में ही उनके उत्तराधिकारी के बारे में चर्चा गर्म हो गई थी. यह सच है कि पंडित नेहरु की नीयत अपनी एकमात्र पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की थी. यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था.

जब नेहरु का निधन हुआ तो उनके उत्तराधिकार के प्रश्न पर कांग्रेस में जंग छिड़ गई. कहा जाता है कि अधिकांश कांग्रेसी नेतागण इंदिरा गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के खिलाफ थे. क्योंकि उस समय तक इंदिरा गांधी को अपरिपक्व माना जाता था और उन्हें गूंगी गुंड़िया की संज्ञा दी जाती थी.

उत्तराधिकार के युद्ध में जब पलड़ा मोरारजी देसाई के पक्ष में भारी हुआ तो कामराज नादिर ने उनके मुकाबले में लालबहादुर शास्त्री को ला खड़ा किया. नेहरु गुट ने शास्त्री का साथ दिया और वो प्रधानमंत्री बन गए. मोरारजी देसाई मुंह देखते रह गए.

पाकिस्तान की नजर शुरू से ही जम्मू-कश्मीर को हड़पने की थी. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान एक अनुभवी सैनिक थे. उन्होंने यह महसूस किया कि भारत का नेतृत्व एक कमजोर आदमी के हाथ में है इसलिए वह सहज में ही कश्मीर को हड़प सकते हैं.

इसलिए पाकिस्तान ने मुजाहिद्दीन के लिबास में अपने सैनिक कश्मीर में भेजने शुरू कर दिए. इसके साथ ही पाकिस्तान ने छम्बजोरिया सेक्टर में अपना हमला बोल दिया. उसकी योजना जम्मू को कश्मीर घाटी से काटने की थी. मगर देशभक्त लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान की इस कुटिल योजना को धराशायी कर दिया.

शास्त्री जी के साथ ताशकंद दौरे पर गए वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा

6 सितम्बर, 1965 को भारतीय सेना तीन तरफ से पाकिस्तान के भीतर घुस गई. 20 दिन तक चली जंग में भारतीय सेना लाहौर और सियालकोट के महत्वपूर्ण नगरों तक पहुंच गई थी. जबकि शक्करगढ़ सेक्टर में उसने गुजरांवाला सेक्टर की पाकिस्तान सप्लाई लाइन को काट दिया था. बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के कारण युद्धविराम की घोषणा कर दी गई.

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रूस का दबाव

इस संदर्भ में यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि पाकिस्तान के कब्जे में जो भारतीय क्षेत्र था वह अधिकांश राजस्थान की मरू भूमि और पंजाब का खेमकरण नामक कस्बा था. जबकि पाकिस्तान का जो क्षेत्र भारत के कब्जे में था वह सैनिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था और पाकिस्तान पंगु बन चुका था. इसलिए पाकिस्तानी शासकों का यह प्रयास था कि किसी भी कीमत पर भारत के कब्जे से उस क्षेत्र को खाली करवाया जाए जिस पर उसने कब्जा किया हुआ है.

राष्ट्रपति अयूब की बात को भलीभांति जानते थे कि रूस ही ऐसा देश है जोकि भारत पर दबाव डालकर उसे उसका क्षेत्र वापस दिला सकता है. इसलिए अयूब ने रूस से मैत्री संबंधों को बढ़ाने का प्रयास शुरू कर दिया. रूसी नेता भी पाकिस्तान को किसी भी कीमत पर अमेरिका से दूर करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने पाक अधिकृत क्षेत्रों की वापसी के लिए भारत पर दबाव डालना शुरू कर दिया.

क्या हुआ ताशकंद में?

मैं उन पत्रकारों में शामिल था जोकि ताशकंद वार्ता की कवरेज के लिए रूस गए थे. इस वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भारतीय पत्रकारों को अनौपचारिक रूप से वार्ता के संबंध में पूरी जानकारी दिया करते थे. मगर यह शर्त होती थी कि इसका इस्तेमाल समाचारों के रूप में नहीं किया जाएगा.

हम लोगों ने भी इस वायदे को निभाया. शास्त्री जी ने हम लोगों को बताया कि रूस की ओर से हम पर इस बात के लिए बेहद दबाव डाला जा रहा है कि हम उन क्षेत्रों को वापस कर दें जिन पर हमारे जवानों ने खून बहाकर कब्जा किया है. शास्त्री जी का यह भी कहना था कि रूस का रूख अब भारत की बजाय पाकिस्तान के प्रति ज्यदा महत्वपूर्ण है.

समझौते से एक दिन पूर्व ही हमें पाकिस्तानी संवाददाताओं से यह जानकारी मिल गई थी कि भारत पाकिस्तान को उसके अधिकृत क्षेत्र वापस करने वाला है. जब इस संदर्भ में शास्त्री जी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भाई क्या करें बेहद मजबूरी है. अमेरिका से भारत के संबंध पहले ही तनावपूर्ण है. अभी तक कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वाटो पावर का इस्तेमाल करके रूस हमारा साथ देता रहा है इसलिए हम रूस की मित्रता को खोने की स्थिति में कतई नहीं हैं.

क्या शास्त्री की हत्या की गई थी?

जब ताशकंद समझौते पर दोनों देशों के नेताओं ने हस्ताक्षर कर दिए तो शास्त्री जी ने भारतीय पत्रकारों को अपने कमरे में बातचीत के लिए बुलाया और हम लोगों से पूछा कि अगर हम पाकिस्तान के क्षेत्रों को वापस लौटा देते हैं तो देश में उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी? उनकी इस बात को सुनते ही अचानक मेरे मुंह से निकला ‘शास्त्री जी जाते ही जूते पड़ेंगे.’

इसके बाद शास्त्री जी हमसे इस समझौते के विभिन्न पक्षों पर हम लोगों से बातचीत करते रहे. जब बातचीत खत्म करने के बाद उनके कमरे से हम निकल रहे थे तो अचानक शास्त्री जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा ‘आपका कहना सही है, मैंने दिल्ली में भी अपने परिजनों से बात की है वो भी इस संधि का विरोध कर रहे हैं. उनका भी वही मत है जो आपने अभी व्यक्त किया था.’

यह पर मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि स्व. लालबहादुर शास्त्री शुद्ध शाकाहारी थे. इसलिए वह रूसी रसोईयों द्वारा परोसे जाने वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करते थे. अपना खाना बनाने के लिए वह अपना एक रसोईया साथ ले गए थे.

संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद रूस सरकार द्वारा जो राजकीय भोज दिया गया उसमें उन पर इस बात के लिए विशेषरूप से दबाव डाला गया कि वह उसमें रूसी रसोईयों द्वारा तैयार किए गए कुछ शाकाहारी भोजन अवश्य खाएं.

यह भोजन रात्रि के 12 बजे तक चलता रहा और हम इस दौरान वहां से उठकर अपने-अपने आवास स्थानों पर चले गए. प्रातः 4 बजे के लगभग प्रधानमंत्री के सूचना अधिकारी कुलदीप नैयर ने हमारे दरवाजे खटखटाए और हमें यह सूचना दी कि शास्त्री जी का निधन हो गया है. हम यह समाचार जानकार हक्के-बक्के रह गए.

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रहस्यपूर्ण मृत्यु

खास बात यह है कि रूसी अधिकारियों ने प्रधानमंत्री के निजी चिकित्स डॉ चुघ को जिस जगह ठहराया था वह उस भवन से काफी दूर था जिसमें प्रधानमंत्री को ठहराया गया था.

हमें यह भी बताया कि शास्त्री जी का शव उनके कमरे के दरवाजे के पास गिरा पाया गया. ऐसा प्रतीत होता है कि जब उन्हें परेशानी हुई तो उन्होंने उठकर कमरे में रखा हुआ पानी पीने का प्रयास किया था मगर थरमस उनके हाथ से गिर गया जोकि उनके शव के पास पड़ा पाया गया था.

शास्त्री जी का निजी सेवक उनके साथ के कमरे में ठहरा हुआ था सम्भवतः शास्त्री जी उसे बुलाना चाहते थे मगर मौत ने उन्हें इसका मौका ही नहीं दिया. डॉ चुघ शास्त्री जी के मरने के दो घंटे बाद रूसी अधिकारियों द्वारा पहुंचाए गए. यह देरी क्यों हुई इसका उत्तर किसी के पास नहीं था.

इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं

अजीब बात है कि रूसी नेताओं ने शास्त्री जी की मौत के बाद इस मामले में जो असाधारण जल्दबाजी दिखाई उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनका सारा जोर इस बात पर था कि शास्त्री जी के शव को जल्द से जल्द भारत पहुंचाकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाए. बताया जाता है कि जब कुछ भारतीय अधिकारियों ने शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम करने का अनुरोध किया तो रूसी अधिकारियों ने इसे ठुकरा दिया.

इसके साथ यह भी सच है कि मृत्यु के बाद शास्त्री जी का शव नीला पड़ गया था और उनका चेहरे का रंग नीला और काला हो गया था. यह आमतौर पर तभी होता है जब किसी की विष देकर हत्या की जाती है. जल्दबाजी में एक विशेष विमान में शास्त्री जी के शव को रूसी अधिकारियों ने लाद दिया और भारतीय अधिकारियों व पत्रकारों को उसी में बिठा दिया और इसके बाद यह विमान सीधा दिल्ली पहुंच गया.

पालम से एक विशेष तोप गाड़ी पर रखकर यह शव जनपथ लाया गया. स्व. लालबहादुर शास्त्री के बड़े पुत्र हरकिशन शास्त्री ने बाद में हमें बताया कि उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी से शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम करवाने का अनुरोध किया था जिसे उन्होंने ठुकरा दिया. बाद में जल्दबाजी में शास्त्री जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि उनके निजी चिकित्सक डॉ चुघ की कुछ ही समय बाद रहस्यमय ढंग से मौत हो गई. तब दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि डॉ चुघ की मौत स्वभाविक नहीं है.

शास्त्री जी की मौत आज भी रहस्य बनी हुई है. कुछ लोगों ने यह सुझाव दिया है कि सरकार को इसकी जांच करने के लिए एक आयोग बनाना चाहिए. मगर मेरी राय में इस आयोग के गठन से कोई लाभ नहीं होगा. क्योंकि इस सारी घटना के लगभग सभी महत्वपूर्ण गवाह इस दुनिया में नहीं रहे हैं. शास्त्री जी की मौत के बारे में जो भी रिकॉर्ड था वो रूसी सरकार के पास था. जोकि अब उपलब्ध नहीं है.

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