AMU, देश का पहला शाहबानो और माया-मुलायम-अखिलेश-कांग्रेस का दोहरा चरित्र

उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में आरक्षण लागू न करने का मुद्दा बेहद संवेदनशील मुद्दा बन सकता है. भाजपा पहले ही इस मुद्दे पर अपना रुख साफ़ कर चुकी है और केंद्र सरकार भी इसी ओर बढ़ती दिख रही है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की अपील को वापस लेते हुए हलफनामा दिया और कहा कि एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता है.

ऐसे में बाजार में आई एक नई किताब उत्तर प्रदेश की सियासी फिजा को गर्मा सकती है. क्योंकि पुस्तक में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में आरक्षण लागू न करने पर समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और बीएसपी अध्यक्ष मायावती से सीधे और वाजिब सवाल पूछे गए हैं.

प्रभात प्रकाशन की पुस्तक ‘राष्ट्रीय आरक्षण नीति और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी’ में दावा किया गया है कि 1920 में इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के वक्त देश में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण या इससे जुड़ा कोई कानून नहीं था. यही नहीं, पुस्तक में कहा गया है कि 1920 के ‘द अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट’ 1920 के जरिए इसकी मान्यता केंद्रीय विश्वविद्यालय के तौर पर होती है.

इसी तरह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की भी स्थापना इसी तरह के एक्ट से हुई है, लेकिन वहां आरक्षण नीति लागू है. यही नहीं 1967 में अजीज बाशा मामले में संविधान पीठ के आदेश का भी जिक्र पुस्तक में किया गया है. जिसमें कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को केंद्र सरकार ने बनाया था न कि मुस्लिमों ने.

पुस्तक के सह लेखक प्रो ईश्वर विश्वकर्मा कहते हैं कि ये बेहद दुर्भाग्य है कि इस यूनिवर्सिटी की स्थापना से लेकर आज तक इस बात को लेकर विवाद है कि क्या यह अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है या नहीं, जबकि इसकी स्थापना से लेकर संविधान सभा, संसद और न्यायपालिका ने सदैव इस विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय के तौर पर स्वीकार किया है. संतोष की बात है कि केंद्र सरकार अब इस मसले का अंतिम समाधान माननीय सुप्रीम कोर्ट और संविधान की मौलिक भावना के अनुरूप करने के लिए संकल्पित है.

विश्वकर्मा जी कहते हैं, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय राष्ट्र की धरोहर है, न कि किसी धर्म विशेष की संपत्ति है, लिहाजा केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते यहां राष्ट्रीय आरक्षण नीति लागू होनी चाहिए.

माया-मुलायम की कथनी और करनी का फर्क

गोरखपुर यूनिवर्सिटी के डॉ ईश्वर विश्वकर्मा और प्रो राजकुमार फलवारिया ने संयुक्त रूप से इस किताब को लिखा है. पुस्तक में इन दोनों लेखकों ने दलित-पिछड़ों की सियासत करने वाले माया-मुलायम को सवालों के कठघरे में खड़ा किया है. पुस्तक में इन दोनों ने कहा है कि मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण को 1993 में लागू किया गया था.

लेकिन 1989 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह ने अपने अगले किसी भी कार्यकाल के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण लागू करने को लेकर कोई पहल नहीं की.

इसी तरह 1995 में पहली बार दलित शक्ति के आधार पर राज्य की सत्ता पर काबिज हुई मायावती ने भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं की.

जातिगत सम्मान और उत्थान के नाम पर जाति आधारित राजनीति का जहर बोने वाले माया और मुलायम ने दलितों और पिछड़े वर्गों को अपने इस दोहरे चरित्र से केवल ठगने का काम किया.

आइये अब एएमयू मसले को भी विस्तार से देखें और पहचान करें कि कैसे यह देश का पहला शाहबानो है!

1920 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज को भंग कर एएमयू एक्ट लागू किया गया था. संसद ने 1951 में एएमयू संशोधन एक्ट पारित करते हुए इस यूनिवर्सिटी को गैर मुसलमानों के दाखिले के लिए भी खोल दिया.

इसके बाद 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अजीज बाशा केस में एक अहम फैसला देते हुए कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी माइनॉरिटी संस्थान नहीं है क्योंकि इसका गठन संसद में कानून के जरिए हुआ है न कि मुसलमानों द्वारा.

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को न मानते हुए 1981 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया और यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया.

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि 1981 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन तक के लिए जाना और यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा देना… उसके माइनॉरिटी स्टेटस की किसी चली आ रही व्यवस्था की बहाली का मामला नहीं था बल्कि 1951 के संसद से पास एएमयू संशोधन एक्ट के मुँह पर तमाचा मारते हुए एक नयी शुरुआत थी.

2004 में यूनिवर्सिटी ने पीजी कोर्सों के दाखिले में 50 फीसदी सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित कीं जिसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हुई और हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान न मानते हुए उसके निर्णय को पलट दिया.

जिसके बाद 2005 में एएमयू और तत्कालीन केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गए, जहाँ एएमयू ने अपना पक्ष रखते हुए अल्पसंख्यक संस्थान के दर्जे के आधार पर सीटों के आरक्षण की बात कही.

इस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे और न्यायमूर्ति अशोक भूषण के दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि जिस तरह मुसलमानों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है वह असंवैधानिक और ग़लत है.

बीते दिन सुप्रीम कोर्ट में इसी 2005 के मुकदमे में सुनवाई के दौरान केंद सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने जस्टिस जेएस शेखर, जस्टिस एमवाई इकबाल और जस्टिस सी नगप्पन की बेंच को बताया कि भारत सरकार का मत है कि अलीगढ यूनिवर्सिटी माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी नहीं है. ‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और हम यहां माइनॉरिटी संस्था का गठन होते हुए नहीं देखना चाहेंगे इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के साथ खड़े हैं’.

जस्टिस इकबाल ने इस पर अटॉर्नी जनरल से पूछा, ‘क्या केंद्र में सरकार बदलने की वजह से स्टैंड बदला जा रहा है?’

रोहतगी का जवाब था, पिछला स्टैंड गलत था. इसलिए हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एएमयू के साथ अपनी साझा अपील को वापस लेना चाहती है और मानती है कि 1968 में अजीज बाशा केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था और AMU को माइनॉरिटी संस्थान नहीं करार दिया जा सकता क्योंकि इसे संसद के एक कानून के द्वारा बनाया गया है.

एएमयू ने केंद्र के हलफनामे पर अपना पक्ष और जबाब दाखिल कर दिया है जिस पर केंद्र का पक्ष भी अदालत में दाखिल है और मामला अपने खत्म होने की औपचारिक प्रतीक्षा कर रहा है.

इस तरह देखा जाय तो मज़हब के आधार पर देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को संविधान संशोधन से पलटने और संविधान के साथ धार्मिक आधार पर खेलने की पहली चर्चित घटना शाहबानों का गुजारा भत्ता केस नहीं, बल्कि साल 1981 का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी है.

इसके सामने 1951 के संसद की भावना के खिलाफ, 1967 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ और 2004 के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ… न खड़ा होते हुए वर्तमान केंद्र सरकार है…. जो 1951 की संसद की भावना के मुताबिक और 2004 के फैसले के समर्थन में…. 1967 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी माइनॉरिटी संस्थान नहीं है क्योंकि इसका गठन संसद में कानून के जरिए हुआ है न कि मुसलमानों द्वारा.” दुहराते हुए संविधान की भावना, संसद की इच्छा और न्यायपालिका के फैसलों की मर्यादा का सम्मान ही करती दिखी है.

साफ़ तौर पर यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत और संवैधानिक व्यवस्था के तहत स्थापित एक संस्थान के बीच के फैसलों के क्रम में एक संवैधानिक और अदालती जंग है जिसमें सरकार की भूमिका बेहद सीमित और संविधान के साथ खड़े रहने भर की है.

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