मनुष्य के साहस से बड़ा कुछ भी नहीं, हारा वही जो लड़ा नहीं

वो तीस का दशक था…. दुनिया वैश्विक मंदी की मार से जूझ रही थी…. जापान एक ऐसा ही देश था जो इस मंदी के दौर में खुद को जिन्दा रखने के लिए संघर्ष कर रहा था.

उन्ही दिनों स्कूल में पढ़ने वाले एक किशोर ने एक छोटी सी वर्कशॉप बनाई थी… जहाँ पर वो पिस्टन रिंग के concept पर काम कर रहा था… उसका सोचना था कि ये concept जापान की नयी-नयी खुली एक ऑटोमोबाइल कम्पनी को बेच कर वह काफी पैसे बना सकता है.

वो दिन रात पिस्टन रिंग डेवलप करने में लगा रहता…. घर लौट कर आने की भी फुर्सत नहीं थी उसे…. काम करते करते वर्क शॉप में ही सो जाता…. इस आइडिया पर काम करने के दौरान ही उसकी शादी हो गयी…. और उसने पूंजी जुटाने के लिए अपनी पत्नी के गहने तक बेच दिए….

आखिरकार वो दिन आ ही गया जब उसने पिस्टन रिंग तैयार कर ली…. वो बड़े ही उत्साह के साथ उस नयी ऑटोमोबाइल कंपनी के ऑफिस पहुंचा और अपने बनाये पिस्टन रिंग के सैम्पल को दिखाया…. लेकिन उसे ये जान कर बहुत धक्का पहुंचा कि उसकी बनायी पिस्टन रिंग कम्पनी के मानकों पर खरी नहीं उतर रही….

वो मायूस हो कर घर लौट आया…. उसकी सारे उम्मीदें अब टूट चुकी थीं…. फिर भी अपने प्रोजेक्ट को रिजेक्ट कर दिए जाने के बाद भी उसने हार नहीं मानी… असफ़लता पर शोक मनाने के बजाये वो फिर से उठा और अपनी बनाई पिस्टन रिंग के सैम्पल को फिर से दुरुस्त करने में जुट गया….

लगातार दो सालों तक उसके बनाए पिस्टन रिंग को दसियों बार ऑटोमोबाइल कम्पनियों द्वारा ठुकराया गया….. लेकिन अंत में उसकी मेहनत रंग लायी और उसे एक कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में कामयाबी मिल गयी….

लेकिन अब एक नयी समस्या आन पड़ी थी…. कॉन्ट्रैक्ट तो मिल गया लेकिन अब उस कंपनी को सप्लाई देने के लिए फैक्ट्री डालनी थी…. और फैक्ट्री के लिए चाहिए था कच्चा माल… लेकिन तभी सेकेण्ड वर्ल्ड वॉर छिड़ गई… और उस युद्ध के दौर में कच्चा माल कहाँ से मिलता भला?

अब युवक था तो एक इंजिनीयर…. उसने अपनी जरुरत के अनुसार एक कंकरीट मिक्सचर मशीन का अविष्कार कर दिया जिससे वो कम से कम लोहे का इस्तमाल करके भी अपनी फैक्ट्री डाल सकता था….

काफी मेहनत के बाद फैक्ट्री तैयार हो गयी…. युवक उत्साह से लबरेज़ था…. उसे लगा कि अब उसका सपनों का महल बन कर तैयार ही होने वाला है कि तभी जापान पर अमेरिकी लड़ाकू जहाजों ने बमबारी कर दी और इस बमबारी में उस युवक की फैक्ट्री तहस नहस हो गयी….

मेहनत से बनाया सपनों का महल पल भर में उजड़ गया…. लेकिन इसकी परवाह ना करते हुए युवक फिर से उठा और किसी तरह फिर से उसी टूटी फूटी फैक्ट्री को खड़ा किया…. लेकिन दुर्भाग्य ने अभी तक उस युवक का पीछा नहीं छोड़ा था….

फिर से अमेरिकी लडाकू जहाज़ों ने उसकी फैक्ट्री पर बम गिरा दिए…. अबकी बार फैक्ट्री पूरी तरह तबाह हो गयी…. उसने नियति को चुनौती देते हुए फिर से तीसरी बार अपनी फैक्ट्री खड़ी करने की कोशिश की…. और खड़ी भी कर ली…. लेकिन अब तक उस युद्ध के वीभत्स माहौल में इस्पात मिलना बंद हो गया था….

ऐसा लगा जैसे उस फैक्ट्री के मलबे के साथ युवक के सपने भी ध्वस्त हो गए हैं…. लेकिन वो अब भी हार मनाने को तैयार नहीं था…. वो एक अदभुत जीवट वाला इंसान था…. उसने अमेरिकी सेना द्वारा फेंके गए पेट्रोल के कनस्तरों को गला कर उसके पिघले लोहे से इस्पात बनाने का एक नया फार्मूला इजाद कर लिया…. ये कच्चा माल यानी इस्पात उसके सपनों को पूरा कर सकता था….

फैक्ट्री फिर से बनकर तैयार थी…. पर दुर्भाग्य तो जैसे तन कर उस युवक के साहस को बार-बार चुनौती दे रहा था…. अबकी बार एक भूकंप ने उसकी फैक्ट्री को फिर से मलबे के ढेर में परिवर्तित कर दिया….

अब चौथी बार शुरुआत करने से पहले युवक ने थोड़ा इन्तजार किया कि अब धंधा तभी शुरू करूँगा जब युद्ध समाप्त हो जाएगा…. युद्ध समाप्त हुआ लेकिन उसके अपने देश को परमाणु बम से तबाह करने के बाद….

इस लड़ाई में जापान की कमर टूट गयी…. सारी अर्थव्यवस्था चरमरा गयी…. लोग दाने-दाने को तरसने लगे…. जापान में महामारी का दौर चल पड़ा…. भूख और कुपोषण ने लोगों को अपने आगोश में जकड़ लिया…. अब अगर पिस्टन रिंग तैयार भी हो जाते तो उन्हें खरीदता कौन? हकीकत तो ये थी पूरा जापान उन दिनों साइकिल पर था….

सड़कों पर ये नज़ारा देख कर उस युवक के दिमाग में एक अदभुत विचार कौधने लगा…. उसने अपनी साइकिल में घास काटने की एक छोटी सी मशीन लगा दी…. नाम मात्र के पेट्रोल की खपत से चलने वाला ये इंजन साइकिल को तेज़ रफ़्तार देता था…. लोगों को उस युवक का ये अविष्कार काफी पसंद आया…. लेकिन उस युवक के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो इस तरह के वाहन को बाजार में पेश कर सके….

उस इंसान ने अपने जीवन में इतनी ठोकरें खायी थी कि उसे अब जीवन के कठिन टेढ़े मेढ़े रास्तों की पहचान हो चली थी…. उसने एक काम किया…. उसने जापान के लगभग 18 हज़ार साइकिल के दुकानदारों को एक पत्र लिखा जिसमें उसने उन दुकानदारो से आग्रह किया कि वो जापान को फिर से गतिशील बनाने के लिए उसकी सहायता करें और फिर उसने अपने साइकिल इंजन के माडल का जिक्र किया….

युवक का विचार इतना स्पष्ट और सरल था कि महज़ कुछ ही दिनों में उसके पास बड़े-बड़े लोग मदद के लिए आने लगे….. पूंजी इकट्ठी होने लगी और 50 के दशक के अंतिम में उस युवक ने ‘सुपर cub’ नाम से हलकी बाइक बाज़ार में उतारी…. इसे जापान में हाथों हाथ लिया गया…. और जापान की जर्जर हालात को सुधारने के लिए इसका निर्यात भी किया गया….

कमाल तो तब हो गया जब 60 के दशक में अमेरिका में इस बाइक ने धूम मचा दी…. और अमेरिका में टॉप सेलिंग टू व्हीलर बाइक का रिकार्ड बना दिया…. नाकामयाबी और किस्मत के थपेड़ों से कभी हार ना मानने वाले उस जापानी युवक को आज दुनिया सोइशिरो होन्डा के नाम से जानती है, जो होन्डा जैसी वैश्विक कंपनी के सीईओ हैं.

इसी होन्डा कम्पनी के साथ 80 के दशक में भारत की अग्रणी टू व्हीलर कम्पनी हीरो ने पार्टनरशिप कर हीरो होन्डा जैसी बेस्ट सेलिंग बाइक बनाई जिसने बाइक की दुनिया में विश्व रिकार्ड कायम कर दिया….

1986 में हीरो होन्डा ने भारत में महज 43 हज़ार बाइक बेचीं थी वही सन 2002 में इसी कम्पनी ने 14 लाख 25 हज़ार बाइक बेचकर विश्व कीर्तिमान स्थापित कर लिया…. आज होन्डा टू व्हीलर और कारों की दुनिया में लीडिंग कम्पनी है….

अपनी असफलताओं को अपने सपनो पर कभी हावी न होने देने वाले सोइशिरो होन्डा का एक वाक्य इस कम्पनी के कर्मचारियों को हमेशा आगे बढने का हौसला देता है और वो है ‘सफलता 99 प्रतिशत असफलता है’…. अटल जी के शब्दों में ‘कोई भी काम मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं….हारा वही जो लड़ा नहीं….’

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