महावीर को ज्ञान हुआ तो वस्त्र छूट गए, वस्त्र छोड़ने से प्राप्त नहीं हुआ ज्ञान

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किसी विशेष जैन मुनि की बात न करते हुए यदि केवल उन मुनियों की बात की जाए जो महावीर की राह पर चलने के लिए पहले वस्त्र त्याग रहे हैं और फिर ज्ञान प्राप्ति का प्रयास कर रहे हैं.

जहाँ तक मैंने सुना है जैन मुनि पहले अकेले में नग्न होने का अभ्यास करते हैं… जब वो इसके अभ्यस्त हो जाते हैं तब सार्वजनिक रूप से नग्न घूमना शुरू करते हैं.

प्रश्न सिर्फ इतना है क्या महावीर को नग्न होने के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था? या फिर ज्ञान प्राप्ति के बाद वो शरीर से इतने अलग हो गए थे कि उन्हें वस्त्र पहनना भी निरर्थक लगता था. वो बिलकुल एक नए जन्मे शिशु की भांति अबोध हो गए थे. परमात्मा के प्रेम में एक शिशु की भांति हो जाने का नाम वैराग्य है. न कि होशपूर्वक वस्त्र त्याग कर फिर ज्ञान प्राप्ति की राह पर चलना.

जैन मुनियों की आस्था पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है, वो महावीर के प्रेम में उनका अनुकरण कर रहे हैं, ठीक है, लेकिन प्रश्न हर बार यहीं आकर रुक जाता है कि जब जैन धर्म में पुरुषों को महावीर के प्रेम ने नग्न होने का अधिकार है तो स्त्रियों को क्यों नहीं.

कोई स्त्री होशपूर्वक नग्न होना चाहेगी भी नहीं, जब तक वो प्रेम में इतने गहरे न उतर जाए कि उसे अपने वस्त्रों का भी ध्यान न रहे.

एक किस्सा बताती हूँ. बात 2008 के पहले की है जब मैं एक संस्था में अंग्रेज़ी पढ़ाती थी. मेरी एक विद्यार्थी जैन साध्वी थी जो मुझसे उम्र में 10 साल बड़ी थी.

पढ़ाई के दौरान विद्यार्थी से मेरा रिश्ता अक्सर ऐसा हो जाता था कि वो अपनी समस्याएँ बेझिझक मेरे सामने प्रस्तुत कर देते थे. तो उस साध्वी ने भी अपना दुःख बाँटते हुए बताया कि बहुत कम उम्र में उसने संन्यास ले लिया था. तब उम्र कम थी तो वहां के नियम कायदे सहनीय थे. लेकिन बढ़ती उम्र के साथ वही नियम पीड़ा में बदल गए थे.

सर के बाल तोड़कर निकालने से उसे माइग्रेन हो गया था और भी कई बीमारियों ने उसे घेर लिया था, वो बिलकुल एक नर कंकाल सी लगती थी. और भी ऐसे नियम कायदे थे जो उसे घृणित लगने लगे थे, खासकर मूत्र विसर्जन और माहवारी से सम्बंधित, जिसे मैं यहाँ लिख भी नहीं सकती.

तो ऐसी मानसिक स्थिति में उसे क्या ज्ञान प्राप्त होगा. घर के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो चुके थे तो उसने वहीं पर रहकर बगावत की… पढ़ाई जारी रखी… हिन्दी में MA किया, गोल्ड मैडल पाया और अब मुझसे अंग्रेज़ी सीखने आई थी.

ये बस एक उदाहरण है, पुरुषों को कम समस्याएँ आती है इसलिए वो सारी पीड़ा को पार करते हुए उस अवस्था तक पहुँच जाते हैं जहां वो समाज में सम्मान पा सके. लेकिन क्या सम्मान पाने भर से वो उस अवस्था को पा लेते हैं जो महावीर ने प्राप्त किया था?

बात का समापन एक बार फिर ओशो के प्रवचन से करना चाहूंगी.

महावीर कहते हैं, जिसे अभी यह ही पता नहीं है कि आत्मा क्या है और शरीर क्या है, वह संयम नहीं साध सकेगा. लेकिन आप साधुओं से जाकर पूछें. दूसरे साधुओं को छोड़ दें, महावीर के ही साधुओं से जाकर पूछें कि तुम्हें अनुभव हुआ है भीतर कि शरीर कहां खत्म होता है और आत्मा कहां शुरू होती है? कहां सीमांत है? कहां दोनों मिलते हैं? और कहां दोनों में फासला है? और अगर अनुभव नहीं हुआ है, तो तुम जो संयम साध रहे हो– महावीर तो कहते हैं, ऐसा साधक संयम साधेगा ही कैसे!

लेकिन साधु संयम साध रहे हैं. संयम में उनके कोई कमी नहीं है. क्या भोजन करना, कितना करना, कब सोना, कब उठना, कितनी सामायिक करनी, कितना ध्यान करना–सब कर रहे हैं; कितना प्रतिक्रमण–सब नियम से चल रहा है, यंत्रवत. उसमें कहीं कोई भूल-चूक नहीं. संयम पूरा चल रहा है.

लेकिन उनका संयम, संयम नहीं है– हो नहीं सकता. क्योंकि महावीर की पहली शर्त ही पूरी नहीं हो पा रही है.

लेकिन उनकी कोशिश यह है कि संयम के द्वारा वे जान लेंगे कि शरीर और आत्मा क्या है. और महावीर उलटी बात कह रहे हैं. वे कह रहे हैं, जो जान लेगा कि शरीर और आत्मा क्या है, उसके जीवन में ही संयम हो सकता है.

हम चीजों को उलटा लेते हैं. उलटा लेने का कारण है –हम उलटे खड़े हैं. हमें हर चीज उलटी दिखाई पड़ती है. महावीर को भी जब हम देखते हैं, तो हम उनको उलटा देखते हैं. जो पहले है उसे पीछे कर देते हैं, जो पीछे है, उसे पहले कर देते हैं. फिर हमें सुविधा हो जाती है. अगर हम महावीर की बात को वैसा ही रहने दें, जैसी वह है, तो हमारे जीवन को हमें बदलना पड़ेगा.

क्या फर्क है?

महावीर कहते हैं, भीतरी बोध पहले होगा, फिर बाहरी संयम होगा.

हम क्या करते हैं?

हम पहले बाहरी संयम साधते हैं, फिर सोचते हैं, भीतरी बोध अपने आप आ जायेगा. हमारे लिए बाहर का मूल्य इतना ज्यादा है कि संयम को भी जब हम साधते हैं तो बाहर से ही शुरू करते हैं. हमारी आंखें बाहर से इस तरह आब्सेस्ड हो गयी हैं, इस तरह बंध गयी हैं. और हमारी वासनाओं ने हमें बाहर से इस तरह चिपका दिया है कि हम अगर साधना भी करते हैं तो भी बाहर से ही शुरू करते हैं. और साधना शुरू ही हो सकती है भीतर से.

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