शुभ मौके पर तो हम ‘राम नाम सत्य है’ भी नहीं कहते!

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‘हिटलर’ नाम के शाब्दिक अर्थ का तब कोई तात्पर्य नहीं रह जाता जब हिटलर एक बार ‘दुष्टता’ और ‘दर्द’ का पर्याय बन जाता है, दार्शनिक डेविड फ्रीमैन ने कहा था.

बच्चे का नाम ओसामा रख दीजिये और दलील दीजिये कि ‘ओसामा’ का शाब्दिक अर्थ तो ‘शेर’ होता है! ‘लादेन’ का अर्थ होता है ‘चरित्रवान’, तो इसलिए बच्चे का नाम लादेन रख दीजिये! ‘हिटलर’ शब्द की उत्पत्ति है ‘हेडलर’ से यानि ‘नदी तट निवासी’ या फिर ‘हटेन’ यानि ‘रक्षक’, तो बच्चे का नाम हिटलर रख दीजिये.

बच्चे को कंस नाम दे दीजिये और दीजिये दलील कि ‘कंस’ का तो अर्थ होता है ‘सुराही’. इन दलीलों के बाद फिर गूगल कीजिये और मैग्निफाइंग ग्लास से आँखें गड़ा गड़ा कर ढूंढ निकालिए कि पाकिस्तान में एक डॉक्टर का नाम भी तो लादेन है; फिर क्या है, अब तो एक और दलील मिल गयी!

हे ‘बुद्धू’जीवी, वो पाकिस्तान है जहाँ हिन्दुस्तान को निशाना कर बने मिसाइलों के भी नाम वही “मोहम्मद ग़ोरी” और ग़ज़नवी” हैं जिसने कभी हिन्दुस्तान में मौत, लूट, और धार्मिक कहर का नंगा नाच किया था.

इसके अलावा, क्या ये भी पता नहीं कि शब्द और भाषा अपने अर्थों के लिए अपने उत्पत्ति-स्त्रोत से अधिक अपने व्यवहारिक प्रयोगों से प्रभावित हो जाते हैं? क्या पता नहीं कि ‘नामों’ के शाब्दिक अर्थ तब धूमिल हो कर नए अर्थ ले लेते हैं जब कोई आततायी क्रूरता के इतिहास में उस ‘नाम’ के साथ अपनी जगह बना लेता है या जब परम्परा से कुछ अशुभ जुड़ जाता है? “राम नाम सत्य है”, शाब्दिक अर्थों से इस अभिव्यक्ति में कुछ गड़बड़ नहीं, लेकिन शुभ कामों के समय इस अभिव्यक्ति का उच्चारण करेंगे आप? नहीं, क्योंकि व्यवहार में यह अप्रिय मौके का बोध कराता हुआ स्थापित हो चुका है.

तैमूर एक चोर और लुटेरा था जो हिन्दुस्तान में किये नरसंहार और धर्म-केन्द्रित अत्याचार के लिए यहाँ आतंक का पर्याय बन चुका है. फिर भी, ‘तैमूर’ नाम के कसीदे पढ़ने हैं तो पढ़िए – कानूनी हक़ है आपका! लेकिन, कृपया लोगों को लच्छेदार भाषा में “ज्ञान” बांटने की लाल-बुझक्कड़ई बंद कीजिये, लाल-बुझक्कड़ई की पोल खुल चुकी है, भाई!

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