नागाओं का रहस्य -3 : बुद्ध के सिर पर नाग-छत्र

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पुराण के अनुसार, मगध के राजा बिंबिसार, शिशुनाग के पोते के पोते के पोते (great-great grandson ) थे. उनके शासनकाल के दौरान, बुद्ध ने प्रवचन दिए और अपनी विचारधारा को प्रचारित किया. इस समय तक मगध आर्य संस्कृति से पहले से ही प्रभावित हो चुका था, और बौद्ध धर्म आर्य संस्कृति के खिलाफ एक क्रांति थी.

पुराण के अनुसार शिशुनाग ‘पतित क्षत्रीय’ थे. यह ब्राह्मणों की मगध के गैर-आर्य नागों के प्रति घृणा के कारण था. नालंदा जो कि नाग के समान नाम से लिया गया, के नाम की उत्पत्ति में परिवर्तन एक राजा जो बिना विराम के दान करता था, पर लागू करना, आर्यों द्वारा द्रविड़ लोगों की पुरानी परंपरा से अलग करने के एक अन्य प्रमाण के रुप में दिखाई देता है.

और कदाचित इस नफरत और उत्पीड़न के कारण हम नागों के यह शब्द सुनते हैं: “नाग इतना नीच राज्य है कि एक अच्छा जन्म प्राप्त करना असंभव सा लगता है.” पूर्णभद्र की ‘पंचतंत्र और ‘कथासरितसागर’ में नागों और ब्राह्मण के बीच विवाह की कहानियाँ, उनके बीच संपर्क के पर्याप्त प्रमाण देती हैं. इन सबके साथ बुद्ध का ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह करना अनुपयुक्त नहीं होगा. अपनी विचारधारा के समर्थक होने पर भी बुद्ध ने विद्रोह किया. वह नागों का एक महान व्यक्ति था. सुत्ता निपुत्ता के परायानावग्गा में उन्हें नाग बताया गया है.

इसलिए कुछ विद्वानों का कहना बिल्कुल सही है कि बुद्ध एक नाग वंश के हैं. उनके स्वाभाविक रूप से नाग लोगों के साथ मित्रवत संबंध थे, जिन्होंने महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित किंवदंतियों में प्रमुख भूमिका निभाई. यहां तक ​​कि उनकी मृत्यु पर, नाग राजाओं द्वारा उनकी मृत देह पर अपने हिस्से का दावा किया कहा जाता है, और उन पर स्तूप का निर्माण किया. और सांची और अमरावती स्तूप पर दिखाए अनुसार यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बुद्ध के उपदेश अपने स्वयं के गैर आर्यन नागों द्वारा स्वीकार होना चाहिए थे.

बुद्ध का फन फैले हुए नाग के साथ प्रस्तुतिकरण का केवल इतना मतलब है कि वह नाग लोगों के एक महान और सम्मानजनक व्यक्ति थे जैसा कि हमने पहले ही बलराम को देखा है. जैन धर्म में भी नाग लगभग हमेशा पूजा की एक वस्तु के रूप में जैन मंदिरों में पाए जाते थे, लेकिन निश्चित रूप से उस तीर्थंकर के अधीनस्थ जिसको मंदिर समर्पित है. जैनों के सुपार्श्व सातवें और पार्श्व तेईसवें तीर्थंकर भी नाग वंश के अंतर्गत आते थे जैसा कि उनके फन फैले हुए नाग के साथ प्रस्तुति में देखा जा सकता है. फन फैलाए हुए बहुत सारे नाग के छत्र के साथ प्रस्तुति के साथ वे बुद्ध और बलराम की तरह महान थे.

मगध और उसके पड़ोसी राज्य की जनता, जहाँ बुद्ध ने अपने जीवन का अधिकतर समय बिताया, प्राचीन समय और फिर बाद के समय में बड़े पैमाने पर नाग वंश की ही थी. आर्यन प्रवास के कारण उनको दक्कन, दक्षिण भारत और सीलोन में विस्तार करने के लिए मजबूर किया गया. नागों का पतन काफी स्वाभाविक है कि बुद्ध के पतन के कारण हुआ. आर्यों का गैर आर्यन बौद्ध को हिन्दुत्व अपनाने के लिए प्रलोभन दिया जाना या उनको मजबूर करना, उत्तर भारत में नागों के घातक पतन का कारण हो सकता है.

यदि नागों को उनका मज़हब नाग पूजा के कारण नहीं मिला तो फिर उनके नाम की उत्पत्ति कैसे हुई और उनका संप्रदाय कैसा था?

वर्तमान में भी, नाग पूजा नहीं करने के बावजूद, मणिपुर के बिलकुल पास, असम में आदिवासी लोगों की कई जनजातियों को नाग बुलाया जाता है. मणिपुर के राजा नागों के वंशज कहे जाते हैं.

नाग के नाम की व्युत्पत्ति इस तथ्य के कारण है कि उनके पास अपने राष्ट्रीय या नस्लीय प्रतीक या लाँचन के रूप में नाग था. वर्तमान में नागदेवता उत्तर भारत में पूजे जाते हैं, “भयानक सरीसृप के रुप में नहीं” ना ही “मात्र एक प्रतीक के रूप में” बल्कि प्राचीन लोगों पर शासन करनेवाले देवता के रुप में. लाँचन के माध्यम से व्यक्ति को यह प्रतीत होता है कि वह उस प्रतीक विशेष की “पूरी प्रजाति के साथ अंतरंग हालांकि रहस्यमय संबंध में है”.

टोटेम का पैतृक चरित्र, संरक्षण के विचार के साथ जुड़ाव बताता है जो कि टोटेम और वंश के समूह के प्रत्येक सदस्य के बीच के अंतरंग संबंध पर आधारित है. एक बैज या प्रतीक के रूप में टोटेम, इसलिए व्यक्तियों के उस समूह (जिंदा या मुर्दा) को वर्णित करता है, जिसके साथ एक आदमी भाईचारे के संबंध में खड़ा पाया जाता है और जिसकी सुरक्षा के लिए वह तब तक के लिए चुना गया है, जब तक वह अपने हिस्से के उन सभी दायित्वों का निर्वाह नहीं कर लेता, जो उस समूह के अस्तित्व के कारण उसे मिले हैं.

गैर आर्यन नाग में विभिन्न जनजातियाँ सम्मिलित थी जिनमें विभिन्न टोटेम और उप-टोटेम द्वारा भेद किया जाता था. परंतु नाग सभी में आम थे. लाँचनिजम में बिरादरी के बिल्ले (बैज़) या वंश के प्रतीक का मौलिक विचार रहता है. और इसलिए एक व्यक्ति लाँचन को पहले रूचि से, फिर सम्मान के साथ और फिर विस्मय से देखेगा. और तदनुसार, समय के साथ यह नाग लोग नाग से पहचाने जाने लगे जिसका परिणाम यह हुआ कि प्राचीन मिथकों में साँप और मनुष्य के बीच, नाग के प्रतीक और ख़ुद नागों और उनके देवता के बीच एक अजीब भ्रम उत्पन्न होने लगा.

उपर्युक्त विचार को ध्यान में रखते हुए हम भारत में नागपूजा के पहले सकारात्मक उदाहरण के बारे में कह सकते हैं. फर्ग्यूसन और सर चार्ल्स ईलियट ने पूर्व-आर्य समयकाल में नाग पूजा के अस्तित्व की ओर इंगित किया है. नाग पूजा के उनके कथन मात्र अटकलबाजियां हैं ना कि किसी सकारात्मक प्रमाण पर आधारित हैं. नाग पूजा के पूर्व-आर्य संप्रदाय को भाषाविज्ञान के आधार पर भी नकारा जाता है.

चूंकि नाग शुद्ध रुप से एक संस्कृत शब्द है, उनका आर्य के पहले अस्तित्व के बारे में नहीं कहा जा सकता, हालांकि साँप को टोटेम के रुप में मानने वाली जातियाँ ज़रूर थीं. ऐसे कई संप्रदाय से जाना गया होगा जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते. दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि प्राचीन समय में नागों का अस्तित्व तो था, परंतु नाग पूजा अस्तित्व में नहीं आई थी.

तो फिर भारत में नाग पूजा का सबसे पहला सकारात्मक प्रमाण क्या है? विद्वानों ने हड़प्पाओं में नाग पूजा के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया है. लेकिन जैसा कि ऊपर इंगित किया है, यह अनिवार्य रुप से सिद्ध नहीं होता कि नाग, पूजा की एक वस्तु था. बल्कि नागों को कुछ उच्च देवताओं की पूजा करते हुए प्रस्तुत किया गया है या वे उन उपासकों के टोटेम हुआ करते थे जो सील के देवता की पूजा करते थे. कभी कभी साँपों को उस स्थान पर रखा जाता है जहाँ पर उन्हें संबंधित परिस्थिति की रक्षा करते हुए दर्शाया जाता है. जो अधिकतम निष्कर्ष निकाला जा सकता है वह यह है कि नाग टोटेम वाले लोग समकालीन लोगों के धार्मिक जीवन में सम्मिलित थे और चूंकि रक्षक के रुप में उनके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता, उनको सीलों पर भी दर्शाया गया है. तथापि, आर्यों के उद्गम के साथ उसकी बेहतर तस्वीर उभर कर आती है.

Nagas : The Tribe and The Cult (R. K. Sharma) पुस्तक का हिन्दी अनुवाद

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