वर्ण व्यवस्था 14 : स्मृतियां व्यवस्था थीं, धर्म नहीं

गतांक से आगे…

लिखा है कि अग्नि में किये हुए हवन की अपेक्षा ब्राह्मण के मुँह में किया गया हवन श्रेष्ठ है. श्राद्ध में भोजन करनेवाला अंधा 90 सद्ब्राह्मणों को, काना 60 ब्राह्मणों को, फूलवाला 100 ब्राह्मणों को और पाप रोगी, दाता के एक-एक हजार ब्राह्मणों को खिलाने का फल नाश करता है. विकलांगो के प्रति यह दृष्टिकोण मानवता का अपमान है.

किसका अन्न खाया जाय और किसका नहीं?

इस पर लिखते हैं सूद लेते वैश्य, लुहार, कारीगर, कलपुर्जे बनानेवाले का अन्न अर्थात आज की भाषा में बैंक कर्मचारियों, डॉक्टर और इंजीनियरों का अन्न, वेतन लेकर शिक्षा देनेवालों का अन्न, नगर में मिलने वाला अन्न न बेचनेवाले का अन्न, नट-दर्जी-केवट-सुनार और नपुसंक का अन्न अर्थात् आज के परिवेश में परिवार नियोजन करानेवालों का अन्न और कुत्ता पालनेवालो का अन्न नहीं खाना चाहिए. हाँ, कुत्ता हिरण पकड़कर लाता हो तो उसमें कोई दोष नहीं है.

राजा और राज्य कर्मचारियों का अन्न तेज को, सुनार का अन्न आयु को और चमार का अन्न यश को नष्ट करता है. चिकित्सक का अन्न पीव, व्यभिचारी का अन्न वीर्य, सूद लेनेवाले का अन्न विष्टा, शस्त्र बेचने वाले का अन्न मल के समान होता है.

इसका अन्न खा लेने पर सात दिन तक गो-मूत्र में पके जौ पर निर्वाह करने से शुद्धि होती है. आदमी-आदमी में अन्तर डालना और फूट डालकर राज्य करना इन्हीं व्यवस्थाकारों की देन है.

इन स्मृतियों में लहसुन, प्याज, गाजर, सूरन, टमाटर, मूली, हींग, गोंद इत्यादि खाने का तो निषेध है; किंतु देव-पितृ कार्यों में पशु-पक्षियों को मन्त्र पढ़कर काटना चाहिए और मन्त्र कौन पढ़ेगा?

लिखा है, ब्राह्मण द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न संतान का संस्कार कर देने से नापित (नाई) बन जाती है. प्रत्येक मांगलिक अवसर पर ब्राह्मण के साथ नाई की उपस्थिति इसी दुरभिसन्धि का परिणाम है. शूद्रों में उनका अन्न भक्षणीय बताया गया है.

दक्षिणा कितना दें?

लिखा है, यज्ञ में थोड़ी दक्षिणा देने से इन्द्रिय, यश, स्वर्ग, आयु और पशुओं का नाश हो जाता है. ब्राह्मण का धन चुराने वाला स्वयं मूसल लेकर वध के लिए राजा से निवेदन करे. यह मात्र जीने-खाने की व्यवस्था थी, धर्म नहीं.

लिखा है- ब्राह्मण किसी भी जाति की कन्या से विवाह कर सकता है किन्तु शूद्र ब्राह्मणी रख ले तो उसे स्वयं अपना लिंग और अण्डकोष अपने हाथ में लेकर नैर्ऋत्य दिशा में हाथ कर तब तक चलना चाहिए जब तक वह मर न जाय. यह मात्र सुरक्षा व्यवस्था है.

वैसे तो ब्राह्मण को तिनके से भी न मारने का विधान है किन्तु भूल से किसी ने मार दिया तो उसका पाप दूर कैसे हो?

इसके लिए उसको जलती हुई अग्नि में सिर नीचे करके तीन बार कूदना चाहिए. राजा अन्य जातियों को प्राणदण्ड दे सकता है किन्तु सिर मुड़ाना ही ब्राह्मण के लिए प्राणदण्ड है. प्रत्येक प्रकार का पाप करनेवाले को भी दण्ड न दें. क्योंकि ब्राह्मण स्वयं अपनी तपस्या और मन्त्रो से शुद्ध होता है.

दोष उन व्यस्थाकारों का भी नहीं है, जिन्होने अपने युग जमाने के लिए इन कानूनो की संरचना की. दोष तो हमारा-आपका है जो आज भी इसे मानते हैं. सच्चाई तो यह है कि इन्हें न मानते हुए भी मानने का खोखला दावा करते हैं. उन्हें गाली देने की अपेक्षा अपने को सुधारना अधिक उपयोगी होगा.

हाँ, यह बात अलग है कि हम बिजली बनाते हैं तो लाईन मैन, लोहा ठोंकते है तो लोहार, सोना गढ़ते है तो सोनार – यह कोई जाति नहीं, व्यवसाय के नाम हैं.

इस प्रकार के वर्गीकरण सदैव होते रहे और होते रहेंगे. लेकिन भगवत्-पथ में न कोई जाति है और न सम्प्रदाय, ‘अपि चेत् सुदुराचारो’- ( गीता ९/३०) अत्यंत दुराचारी भी इस कर्म का सच्चा अधिकारी है.

अस्तु यदि छुआछूत, ऊँच-नीच, जाति और सम्प्रदाय है तो वह धर्म नहीं और इसको माननेवाला अभी धर्मी नहीं है. परमात्मा एक है और उसकी एक जैसी अनुभूति सबके लिए है. उनकी अनुभूति पा लेनेवाला महात्मा समाज में कभी भी दरार नहीं डाल सकता. केवल अधूरी जानकारी और नासमझी के कारण लोग ऐसा समझते और करते हैं.

समाप्त

(महाकुम्भ के पर्व पर चंडीद्वीप हरिद्वार में दिनांक 8 अप्रेल 1986 ईस्वी की जनसभा में स्वामी श्री अड़गड़ानंदजी द्वारा वर्ण-व्यवस्था का रहस्योद्घाटन)

लोकहित में http://yatharthgeeta.com पर pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध ‘शंका-समाधान’ से साभार. आदिशास्त्र ‘गीता’ की यथा-अर्थ सरल, सुबोध व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ भी pdf वर्जन में नि:शुल्क उपलब्ध है.

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