बिल्ली के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं

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modi with gandhi charkha

ढाका की मलमल के बारे में आप सभी ने सुना होगा. कहते हैं कि आप ढाका की मलमल वाली चादर को एक अंगूठी से निकाल सकते थे. इतनी बारीक़ और महीन होती थी ये. यही कहानिया कमोबेश भारत के हर हिस्से की हैं. हमने एसा लोहा बनाया जिसपे हजारों सालों से जंग नहीं लगी. पर ये सब हवा में नहीं हुआ. इसे करने में हमारे पूर्वजों की दिन रात की मेहनत और ज्ञान था.

फिर अंग्रेज आये. अपनी रिपोर्ट में वायसराय ने लिखा “ मैं हैरान हूँ भारत को देखकर. यहाँ कोई गरीब नहीं. सब व्यापारी है, किसान हैं. सबके अपने काम धंधे हैं. सबके यहाँ स्वर्ण भंडार हैं. मैं यहाँ इतने दिनों से हूँ. मैंने किसी को भीख मांगते नहीं देखा. सिवाय साधु सन्यासियों के. पर वो समाज के हित में मांगते हैं. अपने लिए नहीं. ये हैरत की बात है ” ये था इंग्लॅण्ड के भारत में तत्कालीन वायसराय के शब्दों में हमारा भारत. नाम नहीं लिख रहा हूँ. गूगल कीजियेगा.

धन- धान्य और तमाम तरह के खनिजों से परिपूर्ण सोने की चिड़िया कहे जाने वाली इस भारत भूमि को लूटने के नए नए तरीके खोजे जाने लगे. तमाम मीटिंग्स हुई. निष्कर्ष निकाले गए. निर्णय लिए गए. चूंकि तब तक अंग्रेज भारतवर्ष के भाग्य विधाता बन चुके थे सो उनके लिए गए निर्णय भारत का भविष्य थे. उनके लिए गए निर्णयों में से एक था भारत के हथकरघा उद्योग को बर्बाद करने का निर्णय. आधुनिकीकरण के नाम पर तमाम छोटी छोटी ग्रामोद्योग इकाइयों को बंद करा दिया गया.

भारत भर से कपास ढाका की जगह लन्दन जाने लगी. वहां से मशीन का बुना सस्ता और घटिया कपड़ा आने लगा. चूंकि ये कपड़ा बहुत ही सस्ता और दिखने में आकर्षक था. सो हमारे भारतीय भाइयों ने इसे हाथों- हाथ लिया. धीरे- धीरे बुनकरों के घर में फांका पड़ना शुरू हुआ. उन्हें दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होने लगी. मजबूरन उन्हें अपने पूर्वजों के हुनर, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके हाथों में रचा बसा था, उसे तिलांजलि देनी पड़ी.

आप सोच रहे होंगे मैं इसे क्यों सुना रहा हूँ ? बताता हूँ. अभी हाल ही में मोदी जी खादी ग्रामोद्योग की डायरी और केलेंडर पर सूत कातते नजर आये. ये डायरी और केलेंडर हर साल छपते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है. पर इस बार फ्रंट पेज पर गाँधी जी की नहीं बल्कि आज के आइकोन भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी. बस यही विवाद की जड़ है. हालाँकि ये प्रथम बार नहीं है जब फ्रंट पेजेस पर गाँधी जी नदारद हैं. विगत वर्षों में कई बार ऐसा हुआ है. पर चूंकि इस बार केंद्र में मोदी जी हैं तो विवाद उठना लाजमी है.

हिम्मत कैसे हुई संघ के एक स्वयंसेवक की गाँधी को रिप्लेस करने की? माना आपको अपार जनसमर्थन प्राप्त है. पर कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ लकीर की फ़कीर पीटना अनिवार्य है. कहते भी है “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी.” और आपने साहब उन्ही गाँधी को रिप्लेस कर दिया. ऐसे में वो लोग जिनकी रोजी रोटी गाँधी नाम से चलती है, भला वो कैसे चुप रह सकते हैं? माना आपके विचारों से प्रेरित हो आज का युवा खादी खरीदने लगा है. आकंड़ो को अगर देख लें तो खादी की बिक्री के आकंडे की सुई जो विगत बीस वर्षो 5-6 % की बढ़ोतरी पर टिकी हुई थी. आज आपके शासन काल में वही सुई मीटर फाड़ के 34% का ग्रोथ दिखाती है.

क्या जरूरत है साहब आपको खादी की फिकर करने की? काहे नहीं उन कुकुरमुत्तों को चैन से उगने और फलने फूलने देते आप? पड़ा रहने दीजिये चरखे को इक कोने में. लगने दीजिये उसे धूल-धक्कड़. बाकी नेताओं की तरह आप भी बापू के जन्मदिन पर जाइए आश्रम में. चढ़ा आइये 2 फूल उस चरखे पर. जब आज तक यही होता आया है तो वही होने दीजिये न. आप काहे चरखे को अपने अंगोछे से पोछ अपने हाथ ख़राब करते हैं? मरने दीजिये उन बुनकरों के सपनों को, फटने दीजिये उस मलमल की चादर को जो कभी अंगूठी से पार हो जाया करती थी. पहले अंग्रेजों ने उन्हें लूटा, अब चरखे की आड़ में गाँधी के वंशज लूटेंगे. आपको क्या?

साहब हम भारतीय इसी लायक हैं. 1200 सालों की गुलामी हमने यूं ही नहीं झेली. आपका विरोध तार्किक आधार पर नहीं है. ये हो भी नहीं सकता. क्योंकि गाँधी को बेचने वाले तर्क की कसौटी पर कहीं खरे नहीं उतरते. चूंकि बात अब लेगेसी की हो रही है. तो गाँधी जी की लेगेसी और वर्तमान पर विमर्श करना और उसे आप तक पहुँचाना हमारा परम कर्तव्य है. दो ट्वीट पेशे- खिदमत हैं.

1. “Since it’s happy women day today. Men should be allowed to touch them to feel happiness.”
2. “I love to watch women playing at Wimbledon. The trouble is I keep watching the wrong balls.”

मेरे हिंदी पाठकों के लिए मैं हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ.
1. “चूंकि आज महिला दिवस है इसीलिए आज पुरुषों को उन्हें छूकर खुश होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.”
2. “मुझे महिलाओं को विम्बलडन में खेलते देखना पसंद है.” माफ़ कीजिये इससे आगे का अनुवाद मैं नहीं लिख सकता. बस इतना समझ लीजिये कि आगे जो कहा गया है वो बहुत ही बदतमीज़ और घटिया मानसिकता को दर्शाता है. एक सभ्य परिवार से आने वाला कभी ऐसा नहीं कह सकता.

हाँ ये मेरे ट्वीट नहीं हैं. मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ. मुझे शाखाओं में “यत्र नारीयस्तु पूज्यते” का पाठ पढाया गया है. मैं वीर शिवाजी की उस परंपरा का वाहक हूँ जिसने विजित गौहर खान में अपनी माँ का अक्स देख उन्हें ससम्मान पालकी में बैठाकर उनके शिविरों में वापस भेजा था. ये उदगार हैं महान महात्मा गाँधी जी के प्रपोत्र तुषार गाँधी के. जिन्हें आपने कल टीवी पर कलपते देखा होगा. कल उन्होंने कहा कि “बापू अब KVIC को राम-राम कह दें. यूं भी KVIC ने खादी और बापू दोनों की विरासत को कमजोर ही किया है. लिहाजा मोदी को चाहिए कि वो इस कमीशन को निरस्त कर दें.”

इन महानुभाव ने विरासत चुराने की बात की है. मैं यहाँ इन्हें गाँधी जी की सुशीला बेन और मनु बेन को अपने बिस्तर पर सुलाने वाली विरासत से नहीं जोड़ रहा. यद्यपि ऊपर लिखे 2 ट्वीट से ये स्पष्ट है कि ये किस विरासत की बात कर रहे हैं. फिर भी मैं इनका ध्यान कुछ ऐतिहासिक तथ्यों की तरह खींचना चाहूँगा.

1. भारत के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले वीर सावरकर प्रथम व्यक्ति थे. उन्होंने सन 1900 में पूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता की बात की. उस समय तक कांग्रेस के अधिवेशनों में उनकी अंग्रेजों के प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए “लॉन्ग लिव द किंग” गाया जाता था. बाद में वीर सावरकर से प्रभावित हो यही मांग आज़ाद भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों ने की.
उस समय गाँधी जी की लीडरशिप में कांग्रेस की मांग डोमिनियन स्टेट की थी. यानि कि शासन तो अंग्रेजों का ही हो पर उसमें थोड़ी बहुत सहभागिता भारतियों की हो. जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरूद्ध भारतियों में आक्रोश बढ़ा और अंग्रेजों की सेफ्टी वाल्व कांग्रेस इस आक्रोश को थामने में असफल रही. तब जाकर 1929 में गाँधी जी द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी. तो क्या ये कहा जा सकता है कि गाँधी जी ने सावरकर जी के विचारों को चोरी किया और अपने नाम से उनका प्रचार किया?

2. सर्वप्रथम 1905 में वीर सावरकर ने विदेश निर्मित वस्त्रों की होली जलाई. सर्वप्रथम उन्होंने भारत के हथकरघा उद्योग की बर्बादी को समझा. बुनकर भाइयों के हक़ की आवाज बने. गाँधी जी ने यही काम ठीक 16 साल बाद 1921 में किया. तब जाकर उन्होंने चरखा चलाया. तब उनका चरखा बुनकरों के संघर्ष का प्रतीक बना.

चरखा चलाने का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट था. अपने हाथ की बुनी खादी पहनों और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करो. उन्होंने खुद एक दुशाला एक धोती पहनी. उनका कहना था कि अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करों. पर आवश्यकताओं की सीमित रखने का संदेश तो स्वामी विवेकानंद ने उनसे दशकों पहले दिया था. “सिम्पल लिविंग एंड हाई थिंकिंग.” अब चूंकि गाँधी जी ने भी बिलकुल यही सन्देश दिया तो क्या यह कहा जायेगा कि गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत चुरा ली?

मैं वापस अपनी प्रस्तावना पर आता हूँ. गाँधी ने अपने लिए चरखा नहीं चलाया. उन्हें भारत के मुख्य आसामी फाइनेंस करते थे. वो चाहते तो आसानी से बढ़िया इंग्लॅण्ड का बुना सूट पहनते और उन्होंने पहना भी. किन्तु गरीब बुनकरों की दुर्दशा देख गाँधी जी ने उनके लिए चरखा उठाया. गाँधी जी का चरखा मुख्यत: अंग्रेजों की उस लूट खसोट वाली औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध था जिसके तहत अंगेजों ने भारत को लूट अपना घर भरा. जिसने लाखो बुनकरों से उनके चरखे छीन उन्हें पैसे पैसों का मोहताज कर दिया.

इस चरखे ने लोगों को प्रेरणा दी अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा होने के लिए. उनका चरखा आर्थिक आज़ादी के संघर्ष का प्रतीक था. पिछले 120 सालों के इस संघर्ष को गाँधी की तस्वीर को कौड़ियों के मोल बेचने वाले तुषार गाँधी और उन जैसे लोग नहीं समझ सकते. आज ग्रामोद्योग बढ़ रहा है. ग्रामीण अंचल के युवा उद्योगों के लिए लोन देकर मोदी सरकार गाँधी और दीन दयाल के ग्राम स्वराज्य के सपनो को साकार कर रही है.

आज ये लोग जो विरोध में हैं वो इसीलिए बौखलाए नहीं हैं कि मोदी की तस्वीर लग गयी. वो इसीलिए बौखला गए हैं कि जिस विरासत को नोच नोच कर उन्होंने आज तक खाया है वो विरासत अब मोदी की हो रही है. अगर यही हाल रहा तो इन विरासतखोरों के लिए खाने के लाले पड़ जायेंगे.

पर भारत की माटी का एक सपूत अभी जिन्दा है. वो बापू को यूं ही लुटने नहीं देगा. वो चौकीदार अपने डंडे से आपको यूं ही रोकता रहेगा. आप भी अपना कोसने का कीर्तन जारी रखिये. क्योंकि बिल्ली के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करतीं.

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