पंडत जी हाऊ आर यू?

बात शायद 27 या 28 मार्च सन 2011 की है. जनवरी 2011 में मेरे जीवन में एक ऐसा भूकंप, एक ऐसी सुनामी आई जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया और मेरे सोचे हुए सपने को बहा के ले गई.

उस भूकंप और सुनामी का यह परिणाम हुआ कि विद्यालय से मैंने त्यागपत्र दे दिया था जिसके बारे में मैंने किसी को घर में नहीं बताया था. चूंकि उस समय मैं 11-12वीं की कक्षा को इतिहास पढ़ाता था इसलिए बोर्ड की परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए मेरा नाम विद्यालय से गया था.

त्यागपत्र देने की वजह से मैं घर पर बैठ चुका था और पूरी तरह से खाली था. एक दिन विद्यालय से फोन आया कि मुझे अशोक विहार मेट्रो स्टेशन के पास जो सरकारी विद्यालय है वहां उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन केंद्र पर उपस्थित होना है सुबह 8-9 के बीच में.

कोई जल्दी नहीं थी इसलिए मैं आराम से उठा, नित्यकर्म से निवृत्त होकर, नहाकर तैयार हुआ. खादी का अरारोठ से माड़ी दिया हुआ कड़कड़ाता कुर्ता, जींस धारण किया. पूजा-पाठ किया, मस्तक पर लंबा सा चंदन का तिलक धारण किया और निकल गया केंद्र के लिए. बीच में रास्ते में रूककर पान घुलाया और 5-6 पान बाद के लिए बंधवा लिए.

ऑटो किया और पूछते हुए केंद्र तक पहुंच गया. केंद्र के गेट पर पहुंचा तो देखा कि गेट बंद है और बाहर की तरफ कोई नहीं दिखाई दे रहा था. अंदर कोई होगा गेट पर, यह सोचकर मैंने बाहर से गेट खटखटाया.

अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो मैंने दो-तीन बार फिर खटखटाया तो गेट के एक कोने पर बाहर देखने के लिए एक खिड़की की तरह छोटी सी जगह थी. वह खिड़की खुली और अंदर से एक व्यक्ति ने मुंह निकालकर देखा.

मैंने सोचा कि कुछ पूछेगा और इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, उसने मुझे एक बार फिर से गौर से देखा और खिड़की बंद कर दी. मैंने सोचा कि खिड़की बंद करके वह आगे की तरफ से गेट खोलने के लिए गया है.

मैं गेट खुलने की प्रतीक्षा करने लगा लेकिन वो मिनट तक जब गेट नहीं खुला तो मैंने फिर से गेट खटखटाया दो-तीन बार. अंदर से उसी व्यक्ति ने खिड़की खोल कर अपना चेहरा बाहर निकालकर मुझसे हरियाणवी में कहा, “इब के खड़े हो पंडत जी, जे सकूल है आपका मंदिर नहीं”.

अंदर से हमको तो हंसी आई लेकिन मैं गंभीर रूप बनाए रखते हुए मन ही मन सोचा ‘जब ई हमके पंडित समझते हैं त काहे मजा न लेवल जाए’ और मैंने गंभीरता बनाए हुए उसको बोला “भाई साहब मुझे भी यह भली-भांति ज्ञात है कि यह विद्यालय है, देवालय नहीं है और मैं शिक्षक हूं”.

उसने मुझसे कहा “आप मास्टर जी हो? बोलो के काम से यहां आए हो आप?”

मैंने उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा “भाई मैं …… नामक विद्यालय में शिक्षक हूं और मेरे विद्यालय की तरफ से मुझे दर्जा 12 की बोर्ड परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए भेजा गया है.”

उसने खीज कर कहा “मास्टर साहब यहां मैथ और हिस्ट्री की कापियों की जांच होवे है.”

मैंने उससे कहा “भाई मैं इतिहास की ही उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए भेजा गया हूं.”

इतना सुनते ही उसने मुझसे कहा “मास्टर जी आपके पास कोई बोर्ड का लेटर-सेटर है? उसने दिखाइए”

मैंने उससे कहा “भाई विद्यालय वालों ने मुझे कोई ऐसा पत्र नहीं दिया है लेकिन उन्होंने ही मुझे कहा कि मुझको अशोक विहार मेट्रो स्टेशन के समीप सरकारी विद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है और मैं आ गया.”

“मास्टर साहब मैं आपको बिना किसी लेटर के अंदर नहीं जाने दूंगा”, उसने कहा.

मैं सोचने लगा कि ‘अब ए बकलोलवा के कईसे समझांई’. अचानक मेरे रडार कम एंटीना ने काम किया और मैंने विद्यालय फोन लगाया.

उधर से रिशेपशन से फोन जब उठा तो मैंने कहा “Ma’am Anurag Singh from history department this side. I have been sent by the school for the evaluation of examination sheets here at the centre in Ashok Vihar. I haven’t received any letter from the school side regarding the same. I have been confirmed telephonically only. At the centre the guard is not permitting me to enter as I don’t have any letter with me. Kindly ask Principal Ma’am or someone from examination department to speak to the Principal here.”

इतना कहने के बाद मैंने फोन रख दिया और उस व्यक्ति की तरफ देखा तो वह भौचक्का होकर मुझे देख रहा था और अपने सर को खुजला रहा था. मैं अंदर से किसी के आने की प्रतीक्षा करने लगा. उस व्यक्ति को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले और क्या करे.

तब तक अंदर से एक महिला की आवाज आई जो उस व्यक्ति को डांटते हुए कह रही थीं “आपको समझ में नहीं आता है. कोई गेट पर खड़ा है और अंदर आने को कह रहा है और तुम मना कर रहे हो. गेट खोलो.”

उसने गेट खोला तो मैडम ने एक बार मेरी तरफ देखा और उसके बाद उनकी आंखें दांए और बाएं देखने लगीं और मैं मैडम को देख रहा था.

इतने में पीछे से उस व्यक्ति ने कहा “मैडम जी यही मास्टर साहब हैं जो आए हैं और अंदर आने को कह रहे थे.”

मैडम ने मेरी तरफ आंख घुमाई और मुझे दो बार ऊपर से नीचे तक देखा और कहा “हां जी बोलिए.”

मैंने उनसे कहा “मैडम मैं अनुराग सिंह पीजीटी हिस्ट्री ……… विद्यालय में हूं. मैम चूंकि विद्यालय ने मुझे फोन करके सूचित किया था और मुझे कोई पत्र नहीं दिया है तो मैं सीधा यहां आया हूं. आप बोर्ड की तरफ से आई शिक्षकों की सूची में मेरा नाम देख लीजिए.”

वह व्यक्ति बहुत ध्यान से हमारी बातें सुन रहा था फिर मैडम ने कहा “चलिए सर आप अंदर, हम चेक करके आपको बताते हैं.”

मैंने मैडम से कहा “मैडम आपने इन्हें बिना किसी कारण के डांट दिया. इन्होंने अपने कार्य को बहुत ईमानदारी से किया कि मुझे अंदर आने नहीं दिया. गलती दरअसल मेरी है कि मैं बिना किसी पत्र के आ गया और मेरे विद्यालय की है जो उन्होंने मुझे बिना किसी पत्र के भेजा.”

मैं वहां से सीधे मूल्यांकन कक्ष की तरफ पहुंचा और पीछे-पीछे मैडम आ गईं. उन्होंने मेरे नाम को सूची में देखा और फिर कहा कि अनुराग जी आप अपने काम को परीक्षक से समझ लीजिए.

मैं तुरंत आगे बढ़कर मुख्य परीक्षक से काम समझकर अपना काम निपटाने में लग गया. चूंकि वह पहला दिन था इसलिए काम थोड़ा धीरे-धीरे हुआ और लगभग 4 बजे शाम को खत्म हुआ.

मैं विद्यालय से निकला तो वह गार्ड जा चुका था और उसकी जगह कोई और व्यक्ति वहां था.

अगले दिन जब मैं पुनः वहां पहुंचा और गेट खटखटाया तो उसी व्यक्ति ने पहले खिड़की खोल कर अंदर से झांका और मुझे देखते ही गेट खोला.

मैं अंदर घुसा तो उसने मुझसे कहा “पंडत जी राम राम. How are you?”

मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा “राम-राम भाई I am fine. How are you?”

जवाब में वह व्यक्ति मुस्कुराने लगा और मैं अंदर चला गया.

अब रोज यही सिलसिला चला और वह व्यक्ति बहुत घुल-मिल गया. मुझसे रोज आकर चाय पूछता और बाहर से पान भी बंधवा कर ले आता.

करीब 20 दिनों तक यह चलता रहा और आखिरी दिन जब मिला तो मैंने उससे कहा “भाई आपका बहुत बहुत आभार और धन्यवाद. आपने इतने दिनों तक मेरी सेवा की.”

उसने हाथ जोड़ते हुए कहा “पंडत जी मैं क्या कहूं आपसे? उस दिण के लिए मन्ने माफ कर देना. क्या है कि अब सूट बूट में टीचरों को देखने की आदत पड़ गई है या आप ये बोलो कि पहली बार ऐसे टीचर को देखा अपने लाईफ में वो भी पंडत जी प्राइवेट सकूल और इंग्लिश मीडियम के टीचर को इस लिए धोखा हो गया मुझसे पहचानने में. सच बोलूं पंडत जी उस दिण भी आप अगर सूट-बूट में होते और बिणां किसी लेटर के होते तो मैंणे आपको नहीं रोका होता. आपके पहणांवे को ही देख कर मैंणे आपको रोका. माफ कर देना पंडत जी. मुझे आज समझ में आ गया कि आदमी ने उसके वेश-भूषा से नहीं तौलना चाहिए. बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर. अब अगले साल मिलैंगे.”

मैंने भी उससे कहा “भाई मैं शिक्षक हूं किसी ब्रैंड का सेल्समैन नहीं. मेरा काम है बच्चों को पढ़ाना और संस्कार देना जो मैं बहुत ईमानदारी से कर रहा हूं. सूट-बूट वाले कपड़े से मेरा काम कोई निखर नहीं जाएगा. अच्छा धन्यवाद आपका फिर से.”

मैंने उससे हाथ मिलाया और आगे बढ़ने लगा तो पीछे से उसने कहा “अच्छा पंडत जी राम राम. बाय.”

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